Tuesday, 19 June 2018

असल्फा :चल रंग दे


दो दिनों तक कभी तेज, कभी छिटपुट बारिश के बाद आज मौसम कुछ साफ़ है, आज सुबह धूप खिली थी. खिड़की के बाहर देखती हूँ, दूर तक जहाँ तक नजर जा सके. घाटकोपर पहाड़ी की ढलान दिखती है, और दीखते हैं उसी ढलान पे बने कई छोटे-छोटे, सटे-सटे से घर और कुछ घरों की छतों को बारिश से लड़ने की ताकत देते नीले तिरपाल शीट. नजर पड़ती है, कहीं से निकलते धुएँ पर, शायद कोई छोटा कारखाना है! सामने एक मस्जिद और कुछ ही दूरी पर एक मंदिर की दीवार. यह मुंबई के कई बड़े स्लमों में से एक असल्फा स्लम का एक छोटा- सा हिस्सा है, यक़ीनन वह हिस्सा नहीं जिसपर  मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों की नजर पड़ती है और जो इटली के अमाल्फि कोस्ट पर बसे पोसितानो शहर की याद दिलाता है. तंग गलियों, छोटे अँधेरे घरों, नालों और दूर -दूर तक फैली गन्दगी से पहचाने जाने वाले स्लम से बिलकुल अलग जिनकी दीवारों पर इंद्रधनुषी रंग बिखेरे गए हैं. बस्ती की बाहरी दीवारों पर अलग-अलग तरह के डिजाइन बनाए गए हैं. बस्तियों की १७५ दीवारें  ७५० लोगों, ४०० लीटर पेंट और तक़रीबन ६ दिनों की मदद से अब बदरंग नहीं रही हैं.

स्लम के किसी एक विशेष हिस्से का मेकओवर कर इन बस्तियों के प्रति आम लोगों की धारणा बदलने और इन बस्तियों के निवासियों के जीवन में सकारात्मकता के रंग भर सकने में कितनी कामयाबी मिलेगी ? और, आम लोगों की धारणा बदलने से क्या स्लम में रहने वाले लोगों की समस्याएं ख़त्म या कम हो जायेंगी?  तो क्या कुछ लोगों का कहना सही है कि इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य मेट्रो में सफर करने वालों के लिए बस यह एक खुबसूरत नज़ारे की रचना है? क्या सचमुच रंग रोगन से बस्ती को कोई लाभ हुआ है या बस लोगों की जिज्ञासा इन बस्तियों के प्रति बढ़ गयी है? तो क्या यह 'स्लम टूरिज्म ' जिसे कुछ लोग 'पोवर्टी पोर्न' की भी संज्ञा देते हैं, का एक नया गंतव्य बनने वाला है?

स्लम के मेकओवर को अंजाम देने वालों का उद्देश्य बस्ती को नई पहचान दिलाना और फिर इसके बाद इसकी समस्याओं को सामने लाना भी है. आशा है, वे सफल होंगे।

Saturday, 19 May 2018

शादी: एक यादगार दिन या कुछ और


कुछ दिन पहले ही बातों-बातों में मैंने अपनी घरेलू सहायिका से पूछा, " कुछ बचाती हो अपने बच्चे के लिये ?" शादी ३ साल पहले हुई है और लगभग २ साल का बच्चा है उसका। उसने जवाब में कहा,"कहाँ दीदी, खर्चे इतने हैं और ऊपर से कर्ज़ा।" खर्च की बात तो समझ में आ गयी, महंगाई से तो सब परेशान हैं. पर क़र्ज़! उत्सुकतावश मैं थोड़े झिझक के साथ पूछ ही बैठी, " क़र्ज़ क्यों लिया?" "मैंने नहीं लिया, मेरे पति ने लिया था", उसका उत्तर था. मेरे क्यों पूछने पर उसने बताया " शादी थी न हमारी, उसके लिए लिया था, खाना खिलाना, गिफ्ट देना, कपड़े देना, सब करना पड़ता है।" उसकी आवाज में थोड़ा दर्द महसूस किया मैंने। दाम्पत्य जीवन की चुनौतियाँ क्या कम हैं और अगर उसकी शुरूआत एक भारी-भरकम क़र्ज़ के साथ हो, किसी के लिए भी कष्टकारी है. उस एक दिन को यादगार बनाने के नाम पर अभी तक की जमा-पूँजी या कई दफा क़र्ज़ लेकर खर्च कर देना और फिर लम्बे समय तक उसे चुकाते रहने की विवशता को क्या कहेंगे?
इस वार्तालाप के बाद मेरी यह धारणा कि शादियों में दिखावा या जरूरत से ज्यादा पैसे खर्च करने की प्रवृति महज समाज के ऊँचे और मध्यम वर्ग तक ही सीमित है, पूरी तरह से बदल गयी. बाजारवाद कहें या भौतिकवाद, इंसानों की किसी भी गलत परंपरा को शीघ्र अपना लेने की कमजोरी जैसी कई वजहों से यह प्रवृति समाज के हर तबके द्वारा अपना ली गयी है. बमुश्किल हजारों में निपटे जा सकने वाली शादियों के लिए ढेर सारा पैसा व्यर्थ गंवाया जाता है. विडम्बना यह कि, इस तरह पैसे को गंवाकर समाज में हम अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने, दूसरों से बड़ा कहलवाने और अपनी इज्जत बढ़ा लेने का झूठा दम्भ पालने लगते हैं और साथ ही, इसे एक बुराई मानने को भी तैयार नहीं होते हैं. कभी यह सोचने का यत्न नहीं करते कि क्या हमारे द्वारा चुनी गयी दिशा सही है? और -तो-और अपनी मान -मर्यादा के नाम पर अपने बच्चों की शादियों पर ढेर सारे पैसे खर्चकर उन्हें यह अहसास करवाने से भी न चूकते कि देखो हमें तुमसे कितना प्यार है! भले ही बच्चों को अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत खाली हाथ ही क्यों न करना पड़े।

आज प्रिंस हैरी और मेगन मार्केल की शाही शादी 1000 साल पुराने विंडसर किले के सेंट जॉर्ज चैपल में होने वाली है। लम्बे समय से चर्चा में रही इस शादी की राजघराने की अन्य शादियों के पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ देने की संभावना है। समारोह का दुनियाभर में सीधा प्रसारण किया जाएगा। विवाह -बंधन में बंधने जा रहे जोड़े से लेकर दुनियाभर की बड़ी-बड़ी हस्तियों के शिरकत, बटरक्रीम की फ्रॉस्टिंग और ताजे स्प्रिंग फ्लॉवर्स से सजे ४५ लाख रुपये का केक या 6 हजार पाउंड की वेडिंग रिंग, टिगनानेल्लो (Tignanello) वाइन, विंडसर कासल ट्रीट चॉकलेट ट्रफल और शाही दावत की झलकियां पाने के लिए करोड़ों लोग बेसब्री से इंतजार में लगे हैं. दैनिक जागरण में छपी एक खबर के मुताबिक इस शादी की लोकप्रियता को लेकर हाल ही में ब्रिटेन की एक मार्केट रिसर्च फर्म ने एक सर्वे भी किया है। सर्वे में जो सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा था वो था इस शाही शादी में भारतीयों की दिलचस्पी। सर्वे में शामिल कुल भारतीयों में से 54% भारतीयों ने माना कि वे प्रिंस हैरी और मेगन की शादी को लेकर उत्साहित हैं वहीं ब्रिटिश नागरिकों की बात करें तो सर्वे में सिर्फ 34% नागरिकों ने शाही शादी में रुचि दिखाई। जानकारी के मुताबिक, इस सर्वे में 16 से 64 वर्ष के बीच के 28 देशों के करीब 21 हजार लोगों ने हिस्सा लिया था।
भारतीयों की शादियों में दिलचस्पी जगजाहिर है, यहाँ के विवाहों की रौनक, चमक-धमक, संगीत तो विदेशी पर्यटकों को भी लुभाने लगा है. पर सवाल उठने लगा है कि यह फिजूलखर्ची नहीं है? खासकर भारत जैसे गरीब देश जिसमे आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूखे सोने को मजबूर है, शादी-विवाह जैसे आयोजनों में आडंबर और शानो-शौकत पर इस प्रकार के धन, समय और संसाधनं की बर्बादी न्यायसंगत है ? क्या 'बिग फैट वेडिंग' को लेकर सच में हमें गर्व महसूस करना चाहिए?
आश्चर्य इस बात का है कि भारतीय शादियों का कारोबार अब बढ़कर करीब 1.२५ लाख करोड़ का हो गया है और हर वर्ष इसमें २०-३० % का इजाफा भी हो रहा है । यानि हर साल शादियों को और भी भव्य बनाने की होड़ जारी है, एक- दूसरे से ऊपर अपने आप को समझने की होड़ । डेस्टिनेशन वेडिंग, बीच वेडिंग,एडवेंचरस वेडिंग जैसे अंडरवाटर वेडिंग बंजी जंपिंग, मिड एयर वेडिंग, वाइल्ड लाइफ थीम पर शादियां आयोजित की जा रही हैं. हेलीकाप्टर से विदाई और पुष्प वर्षा, आलीशान मंडप, लजीज व्यंजन का इंतज़ाम कर विवाह की मधुर स्मृतियाँ संजोयी जा रही है या फिर कहें कि समाज में हैसियत, रुतबे को दिखाने का नया तरीका इज़ाद किया गया है। एक छोटा-सा पारिवारिक उत्सव दिखावे, शान-शौकत और सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय बन गया है.

विलियम डेलरिम्पल की किताब 'द लास्ट मुग़ल' के पहले अध्याय में वर्णित मिर्ज़ा जवां वख़्त की शादी के जश्न का ब्यौरा भव्य शादियों को लेकर हमारी कमजोरी को दर्शाता है । लाल किले की लाहौरी गेट से रात के दो बजे बारात का निकलना, जमकर की गयी आतिशबाजियां, सजे हाथियों और घोड़ों का काफिला, देखने के लिए उमड़ा लोगों का हुजूम, त्योहारों जैसा समां बाँध रहा था. अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफ़र की पत्नी ज़ीनत महल ने अपने बेटे की शादी में छोटी - से -छोटी चीजों पर ध्यान दिया था चाहे महल की साफ़-सफाई हो या उसके दीपों और झाड़फानूसों से सजावट की बात हो या फिर मेहंदी की रस्म से लेकर लजीज पकवानों , कपडे, आभूषणों, दूल्हे के सेहरे को मोतियों से सजाने की, कोई कसर नहीं छोड़ी गयी थी. पूरे हिन्दुस्तान भर से पाइरोटेक्निशियन को बुलाकर उनके हुनर को परखा गया था। ज़ीनत महल द्वारा इस विवाह को आलिशान बनाये जाने का एक मकसद अपने बेटे के हैसियत में इज़ाफ़ा और साथ ही इस राजवंश में अपनी स्थिति को भी मजबूत करना था ।

सवाल यह उठता है कि क्या यह फिजूलखर्ची को किये बिना इस पवित्र बंधन को यादगार नहीं बनाया जा सकता? शायद संभव है, सादगी से इस पुनीत कार्य को अंजाम देकर कई जोड़ों ने यह साबित किया है कि बिना तामझाम की शादी भी लोगों के लिए यादगार बन सकती है । अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के भिंड में आयोजित दो आईएएस अधिकारियों आशीष वशिष्ठ और सलोनी की शादी हो अथवा सूरत के भरम मारू और दक्षा परमार की शादी या हैदराबाद के निवासी शशि किरण टिक्का और पूर्णिमा दीपिका के परिणय सूत्र में बंधने की खबर, इन तमाम हो-हल्ले के साथ हो रही शादियों के मध्य एक खुशनुमा अहसास जगाती है । कुछ जोड़ों द्वारा शादी के खर्चे होने वाले पैसे को जमा कर हर साल उससे मिलने वाले ब्याज को जरूरतमंद बच्चों पर खर्च करने का लिया जाने वाला संकल्प क्या कम महत्वपूर्ण है? क्या माँ-पिता के द्वारा इसी तरह का निर्णय लिया जाना बच्चों की नजर में उनके कद को ऊँचा करने वाला साबित न होगा? इस कुरीति में भागीदार न बनकर क्या हम एक उदहारण बनाकर समाज के अन्य लोगों को प्रेरित करने का संकल्प नहीं ले सकते? बाहरी तामझाम से प्रभावित न होकर और एक अदृश्य, अनकही प्रतियोगिता में शामिल न होकर मात्र दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद और शुभकामनायें प्रेषित कर हम इस पारिवारिक उत्सव के असल मकसद को फिर से कायम करने का प्रयत्न नहीं कर सकते?

इस फिजूलखर्ची को हमें जल्द से जल्द रोकना होगा वर्ना यह गरीबों को और गरीब कर देने वाला साबित होता जा रहा है, मध्यम वर्ग को कर्ज़ के दलदल में धँसाता जा रहा है और अमीरों को दिखावे की लत से ग्रसित करती यह परंपरा उन्हें और अधिक लालची और रिश्वतखोर बनाता जा रहा है. जितनी जल्दी हो सके कानून बनाकर, सामाजिक तरीके से जागरूकता फैलाकर या कठोर कदम उठाकर इस परंपरा को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। आज का युवा जो हर मुद्दे पर, हर मोर्चे पर सामाजिक बुराइयों को दूर कर देने के कार्य में तत्पर दिखाई देता है, वह इस ढोंग से अपने को दूर न कर सकेगा, यह कहना सही नहीं है.






Sunday, 13 May 2018

हैप्पी मदर्स डे

आज मदर्स डे है। एक माँ के प्यार, समर्पण, त्याग को याद कर परिवार के अन्य सदस्यों की ज़िंदगियों में उनकी अहमियत का अहसास दिलाये जाने का दिन. इन दिवसों को मनाये जाने का एक सकारात्मक साइड इफ़ेक्ट है कि दुनियाभर में एक माँ की भूमिका की कदर की जाने की शुरुआत हुई है, मातृत्व की चुनौतियों को महसूस किया जा रहा है, निम्न दर्ज़े का काम समझेजाने वाले इस काम के प्रति लोगों का नजरिया बदलने लगा है और  साथ ही लोगों को अपनी माँ के प्रति खुलकर अपनी भावनाओं का इज़हार करने का मौका भी मिल रहा है. संदेश भेजकर, उपहार या कार्ड देकर, या बुके देकर इस प्यार से भरे रिश्ते का को और भी प्यारा बनाया जा रहा है. सब रिश्तों से अनमोल माँ-बच्चे के इस रिश्ते को अनोखे ढंग से मनाने के तरीके ढूंढें जा रहे हैं. कोई मौका खोना नहीं चाह रहा अपनी माँ को जता देने का, हाउ मच आई लव यू...
और क्यों न जताया जाए, माँ -बच्चे का रिश्ता होता ही है बहुत प्यारा। जन्म देने से लेकर जीवन के हर कदम पर थामे रहती है, माँ अपने बच्चे का हाथ। कभी प्यार से और कभी सख्ती से एक गुरु या दोस्त बनकर जीवन का पाठ पढाती है,निस्वार्थ। अपने बच्चे और परिवार की ज़िन्दगियों में खुशियाँ भरने के लिए खुद की खुशियों की कुर्बानियां देने से नहीं चुकती। मिस वर्ल्‍ड के फाइनल राउंड में मानुषी छिल्लर से पूछे गए सवाल कि 'किस प्रोफेशन को सबसे ज्यादा सैलेरी मिलनी चाहिए' के जवाब के तौर पर  'एक मां को सबसे ज्यादा इज्जत मिलनी चाहिए और जहां तक सैलरी की बात है, तो इसका मतलब रुपयों से नहीं बल्कि सम्मान और प्यार से है' कहे जाने पर दुनिया भर के लोगों द्वारा पसंद किया जाना हर माँ की बच्चे के जीवन में एक विशेष भूमिका को साबित करता है.
रोते हुए बच्चे को बस माँ की गोद चाहिए होती है शांत होने के लिए. हलकी लगी चोट के दर्द गायब होने के लिए   माँ का केवल वह जादुई स्पर्श या एक हलकी फूँक काफी होती है. किसी प्रतियोगिता में जाने से पहले माँ का अपने बच्चे के ऊपर विश्वास बच्चे के आत्मविश्वास को कम होने नहीं देता। 'चाहे कुछ भो हो जाये, मैं तुम्हारे साथ हूँ' का आभास कराकर बच्चों के हर सुख-दुख के क्षणों में उनके साथ ताउम्र सहारे के रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खड़ी रहती है। कितनी ही बदमाशियों को झेल जाती है और कभी गुस्सा हुई तो मनाने के लिए जरूरी होती है बस थोड़ी सी मिन्नत! बहुत बड़ा दिल होता है माँ का. कहते हैं, भगवान् हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने माँ को बनाया।

इतना प्यार और सम्मान जहाँ रिश्तों को और अधिक मधुर बनाने में मददगार है, वहीँ एक माँ के रूप में एक औरत से और अधिक जिम्मेवार होने की अपेक्षा भी करता  है। बच्चे को जन्म देने से लेकर उसकी परवरिश और अन्य दायित्वों का निर्वहन निसंदेह एक जटिल कार्य है, जिसका नाता बच्चे के व्यक्तित्व के विकास से जुड़ा है. हर इंसान के व्यक्तित्व पर अपनी माँ के व्यक्तित्व का अच्छा -खासा प्रभाव पड़ता है. इसका प्रमाण हमें कई सफल व्यक्तियों की जीवनियों को पढ़कर मिलता है. जीवन के प्रति नजरिया, विषम परिस्थितियों से मुकाबला करने के तरीकों और संतुलित व्यवहार से लेकर बच्चों से जुड़े हर छोटे- बड़े मुद्दों में माँ की भूमिका पहले से ज्यादा बढ़ गयी है. ऐसे में हर वक्त अपने आप को और बेहतर और समझदार इंसान बनाने की कोशिश जारी रख, अपनी एवं अन्य की गलतियों और अनुभवों से सीखने और उसे न दुहराने का वादा खुद से कर इस चुनौती का सामना करने के लिए हर माँ को तैयार रहना होगा। इस जटिल काम का प्रशिक्षण किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं दिया जाता और एक अच्छी औरत होना एक अच्छी माँ होने का लाइसेंस भी नहीं देता.




Friday, 11 May 2018

किताबें और हम


किताबें हमेशा से ही हमारी संस्कृति और इतिहास का अभिन्न हिस्सा रही हैं। भले ही किताबों का स्वरुप कुछ अलग था पर क्ले टैबलेट्स, लौह पत्रों, चर्म पत्र, ताड़ पत्रों, मिट्टी की पटि्टयों, भोजपत्रों,पेपाइरस आदि पर उकेरे चिन्ह या शब्द इस बात का प्रमाण हैं कि हर युग में इंसानों ने अपने विचार,ज्ञान और अनुभवों को लिखकर संरक्षित करने और भावी पीढ़ी तक हस्तांतरण को महत्वपूर्ण माना है.


किताबें हैं क्या ? किसी के लिए ज्ञान का भण्डार, देश-दुनिया के आश्चर्यजनक रहस्यों और महत्वपूर्ण सूचनाओं का संग्रह, किसी की लिए मानसिक तनाव को दूर करने और मनोरंजन का साधन और किसी के लिए अकेलेपन का साथी और एक सच्चा दोस्त। किताबें दुनिया भर की जानकारियाँ अपने पन्नों में समेटे कभी शिक्षक बन जाती है, कभी पिता के रूप में कहानियां कहकर अच्छे -बुरे का भेद करना सिखाती है, वास्तविक दुनिया से हमारा परिचय कराती है और कभी हमारी भावनात्मक और बौद्धिक जरूरतों को पूरा कर एक माता की भी भूमिका निभाती है. दूसरों के विचारों से अवगत करा हमारी कल्पनाशीलता में नए पंख लगाती है, हमारी सोच में विस्तार करती है. निसंदेह मानसिक स्तर पर हमें और अधिक परिपक्व बनाकर एक बेहतर इंसान बनाने का बेहतरीन माध्यम हैं किताबें। फिर क्यों न, किताबों से दोस्ती कर ली जाए ?

अधिक-से-अधिक लोगों को किताबों से जोड़ने और पढ़ने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से २३ अप्रैल को . यूनेस्को(यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन) द्वारा हरेक वर्ष विश्व पुस्तक दिवस दुनिया भर में मनाया जाता है. भारत में भी केन्द्रीय संस्थानों, पुस्तकालयों, विद्यालयों और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों के द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को अध्ययन के प्रति जागरूक करने की दिशा में प्रयास किये जाते हैं. अलग-अलग शहरों में आयोजित किये जाने वाले पुस्तक मेलों का उद्देश्य भी किताबों के प्रति लोगों की रूचि बढ़ाना ही है. हर आयु वर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर लाखों की संख्या में पुस्तकें प्रदर्शन के लिए रखी जाती है। कहानियाँ, कवितायेँ, नाटक, उपन्यास, व्यंग्य, चित्रों वाली किताबें हों अथवा ज्ञान-विज्ञान के अद्भुत संसार से परिचय कराती किताबें, हर विषय पर किताबें लिखी जाती हैं, बस जरूरत है, अपनी पसंद के हिसाब से किसी किताब के चुनने का.

उल्लेखनीय है, किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी इच्छानुसार हर पुस्तक खरीद पाना संभव नहीं है. इस समस्या का आसान- सा समाधान है, पुस्तकालय। पुस्तकालय का सदस्य बन कर वहां संग्रहित पुस्तकों, फ़िल्मों, पत्रपत्रिकाओं, मानचित्र, हस्तलिखित ग्रंथ, ग्रामोफोन रेकार्ड, ई-बुक्स एवं अन्य पठनीय सामग्रियों का लाभ उठाया जा सकता है. पर क्या सचमुच पुस्तक पढ़ने की चाह रखने वालों के लिए हम उनकी इच्छा पूरी कर पाने में सक्षम हैं? गौरतलब है, सूचनाओं को अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँचाने की दिशा में कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ लाइब्रेरी एसोसिएशन एंड इंस्टीच्यूशन द्वारा तय पैमाने के मुताबिक हर ३००० की जनसँख्या पर एक सार्वजानिक पुस्तकालय होनी चाहिए। इस लिहाज से भारत की कुल जनसँख्या के हिसाब से यहाँ तक़रीबन ४ लाख सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता है जबकि लगभग ६०००० ही पुस्तकालयों का होना निराशा जगाता है. विद्यालयों खासकर सरकारी विद्यालयों में पुस्तकालयों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. बहुधा पुस्तकालय जैसी कोई व्यवस्था रहती नहीं हैं, और अगर रहती भी है तो कहीं कोने में पड़ी एक छोटी- सी अलमारी में कुछ किताबें 'पुस्तकें अनमोल धरोहर हैं' की तर्ज़ पर बंद रखी जाती हैं. विडम्बना यह कि मेरी प्रिय पुस्तक, मेरे प्रिय लेखक या पुस्तकालय का महत्व जैसे विषयों पर लेख बच्चे निबंध की किताबों से रट्टा मारकर हर साल परीक्षाओं मे लिख आते हैं. कक्षा में बैठाकर और टेक्स्टबुक रटाकर शिक्षा के असली मकसद को प्राप्त करना असंभव है। किताबें पढ़ने से शब्द ज्ञान और विश्लेषण क्षमता में विस्तार तो होगा ही साथ ही पढ़ने की क्रिया को और भी रोचक बनाया जा सकता है.

किताबों की उपलब्धता हरेक के लिए आसान और सुनिश्चित करने के लिए पुस्तकालयों के निर्माण को हमारी प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा। चुनौती न केवल ज्यादा संख्या में पुस्तकालयों को बनाने की है वरन पुस्तकालयों का अधिक-से-अधिक किताबों और अन्य सामग्रियों से समृद्ध और लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सकने में सक्षम होना भी जरूरी है. इसी मद्देनजर सन १९७२ में भारत के सांस्कृतिक विभाग द्वारा राजा राममोहन रॉय फॉउंडेशन की स्थापना की गयी. इसके अलावा भारत सरकार ने पुस्‍तकालय सेक्‍टर के विकास के लिए लम्‍बी अवधि की योजनाएं और रणनीतियां तैयार करने के लिये सन २०१२ में एक उच्‍च स्‍तरीय समिति 'राष्‍ट्रीय पुस्‍तकालय मिशन'(NML) का भी गठन किया है जिसका उद्देश्‍य राष्‍ट्रीय भारतीय वर्चुअल पुस्‍तकालय की स्‍थापना, मॉडल पुस्‍तकालयों की स्‍थापना, पुस्‍तकालयों का गुणात्‍मक / मात्रात्‍मक सर्वेक्षण तथा क्षमता निर्माण करना है। एशिया के सबसे बड़े साहित्यिक उत्‍सव-जयपुर साहित्‍य उत्‍सव का प्रत्‍येक वर्ष जनवरी माह में जयपुर में आयोजित किया जाना भी पुस्तकों को लेकर लोगों को जागरूक बनाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है. इस सम्बन्ध में पुस्तकालय अधिनियम लागू करना भी उल्लेखनीय है जिसके तहत राज्य सरकार की सभी शिक्षण संस्थानों चाहे सरकारी हो या गैर-सरकारी, प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च-शिक्षा तक के संस्थानों में पुस्तकालय का होना अनिवार्य कर दिया गया है. हालांकि अभी भी भारत के केवल १९ राज्यों में ही पुस्तकालय अधिनियम पारित किया जा सका है और उसपर भी कुछ राज्यों में यह अधिनियम अभी कुछ साल पहले ही लागू किया गया है. आशा है, जल्द-से -जल्द यह व्यवस्था देश के अन्य राज्यों में भी लागू कर दी जायेगी।

बाल किताबों को प्रकाशित करने वाली संस्था, प्रथम बुक्स का 'हर बच्चे के हाथ में किताब' योजना के तहत भारत की विभिन्न भाषाओँ में किताबें प्रकशित कर कम कीमत तक बच्चों तक पहुंचाने की कोशिश सराहनीय है. ' डोनेट अ बुक' या 'मिस्ड कॉल दो और कहानी सुनो ' जैसे कैम्पेन बच्चों में पढ़ने की आदत डालने के मकसद से चलायी गयी है. ऐसे कई एनजीओ हैं जो गांवों में बच्चों को शिक्षित करने के कार्य में लगे हुए हैं और कई पुस्तकालय इन ट्रस्ट व संगठनों द्वारा सुदूर इलाकों में चलाए जा रहे हैं.

कहा जा सकता है, ज्ञान आधारित समाज का निर्माण किया जाना किसी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है और इस लक्ष्य को हासिल करने का अति महत्वपूर्ण साधन है, किताबें।

Monday, 16 April 2018

शिक्षा और परीक्षा

अरसे से शिक्षा के क्षेत्र में कोई अच्छी खबर के इंतज़ार कर रहे कानों में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं से पूर्व प्रश्न पत्र लीक की खबर पड़ना अत्यंत निराशाजनक है। स्कूल की क्लासेस,एक्स्ट्रा क्लासेज, ट्यूशन, क्रैश कोर्स, अपनी इच्छाओं की कुर्बानी देकर दिन -रात एक कर परीक्षा की तैयारी में जुटे रहना  और फिर परीक्षा के रद्द होने की खबर मिलने के बाद छात्र -छात्राओं की 'काटो तो खून नहीं ' जैसी हालत होना स्वाभाविक है। व्यवस्था की विफलता से सीबीएसई बोर्ड की साख पर कई सवाल तो खड़े हो ही रहे हैं, साथ ही वर्तमान परीक्षा-व्यवस्था भी पुनः कठघरे में है. आये दिन उत्तर पुस्तिकाओं के बीच चिपके  १०,२० या ५० रुपये के नोट को लेकर शिक्षकों द्वारा बच्चों के परीक्षा के अंक बढ़ा कर मदद कर देना या बिना पूरी उत्तरपुस्तिका को पढ़े अंदाजन अंक बिठा देने के कारनामे  अथवा सिफारिश, कुछ पैसों के लालच में अथवा जान-पहचान के नाम पर अंक बढ़ा देने की मेहरबानियों की खबरों से लेकर सारे नियम- कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए परीक्षा-केंद्रों पर  धड़ल्ले से होती नक़ल, पर्चों का परीक्षा के पूर्व ही लोगों के हाथों में हाजिर होने जैसी घटनाएँ योग्यता मापने के इस तरीके पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता जताती है. इन घटनाओं पर नकेल कसने की सरकार द्वारा की गयी तमाम कोशिशें भी इन्हे पूरी तरह रोकने में असफल ही साबित हो रही हैं. ऐसे में, सीबीएसई के वरिष्ठ अधिकारी का शिक्षा के क्षेत्र में माफियाओं की जड़े कोल माइनिंग इंडस्ट्री से भी ज्यादा गहरी होने की बात स्वीकारना सरकार द्वारा भविष्य में ऐसी घटनाओं के घटित न होने के आश्वासन पर क्या विश्वास किया जा सकता है? संभव है, हालिया घटित प्रश्नपत्र के लीक का मामला सुलझ भी गया हो, संलिप्त अपराधी पकड़े भी गए हों, पर क्या  भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगा पाना संभव है, जबकि परीक्षा के संचालन का जिम्मा संभाले लोग ही ऐसे कदाचारों में शामिल पाए जाते हैं? 


अब सबसे अहम् सवाल यह है कि क्या वजहें होती हैं, परीक्षा में नक़ल की, प्रश्न पत्र के लीक की ?जाहिर सी बात है, विषय को सीखकर उससे संतुष्टि पाने से ज्यादा परीक्षा में सफल होने और अधिक -से -अधिक अंक हासिल करने की अभिलाषा ही इसके कारण हैं. कागज़ पर लिखे नंबर ही बाकियों से श्रेष्ठ अथवा कमतर समझे जाने  के प्रमाणपत्र बन गए हैं. माता-पिता की ऊँची उम्मीदों पर खरा उतरने का दवाब और साथ ही विद्यालय की साख  जैसे भी कुछ अन्य कारण हैं, जिसके परिणामस्वरूप येन केन प्रकारेण अच्छे नंबर लाने केलिए विद्यार्थी किसी भी हद तक जाने को तैयार होते हैं, चाहे रास्ता अनैतिक और गैरकानूनी ही क्यों न हो.
विडम्बना यह है कि सजा वो भुगतते हैं जो इस व्यवस्था में भागीदार नहीं हो पाते. कम अंक मिलने की स्थिति में, एक-एक अंक से अपने मनपसंद विषयों के न मिलने या कॉलेजों में प्रवेश की जद्दोजहद में बच्चे मानसिक अवसाद के शिकार होते हैं और कभी -कभी आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने पर मजबूर. छोटी उम्र में मात्र एक परीक्षा में मिले अंक का भविष्य का आधार मान लेना क्या हमारी मूर्खता नहीं है? जबकि, ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है जिसमें शुरूआती असफलता के बावजूद लोगों ने जीवन में कामयाबी पाई है, एक मुकाम हासिल किया है. सीखने-सिखाने पर आधारित व्यवस्था से कोसों दूर नंबर की होड़, शिक्षण संस्थानों के झूठे आडम्बर और गलाकांट प्रतिस्पर्धा ही शिक्षा की आधुनिक परिभाषा बन गयी है और भारतीय शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे 'भारतीय परीक्षा व्यवस्था' में तब्दील हो गयी है और साथ में शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट देखी जा रही है, शिक्षा का स्तर बद से बदतर होता जा रहा है।

परीक्षा के दौरान तनावमुक्त और प्रसन्न रहने की जरूरत पर हाल ही में देश के प्रधानमंत्री का बच्चों के साथ संवाद एक अच्छा प्रयास है पर क्या यह ज्यादा उचित न होगा कि हम समस्या की जड़ को समझें और वहीँ से व्यवस्था में सुधार की कोशिश करें. ज्यादा से ज्यादा अंक अर्जित करने की प्रेरणा देने वाली शिक्षा से इतर एक ऐसी प्रणाली के बारे में सोचा जाए जो बच्चों में सीखने की ललक को ताउम्र बरक़रार रख सके. एक अदद नौकरी प्राप्ति की लालसा  पाले एक इंसान की जगह आत्मविश्वास से लबरेज, अपने बलबूते कुछ हासिल करने का हौसला रखने वाला, उद्यमी, चरित्रवान एवं जागरूक व्यक्ति का निर्माण कर सकने में सक्षम हो .
शिक्षण के तरीकों में सुधार, अच्छे शिक्षकों की बहाली और साथ में परीक्षा के तरीकों पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है. सीबीएसई बोर्ड द्वारा बच्चों के मूल्याङ्कन की दृष्टि से शुरू किये गए 'सतत एवं व्यापक मूल्यांकन' (continuous and comprehensive evaluation )पद्धति पर पुनर्विचार कर इस तरह से लागू किये जाने  की जरूरत है जिससे इसके वास्तविक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके. हरेक बच्चे को उसकी गति और क्षमता के हिसाब से ही प्रशिक्षित किये जाने की बात हो या बच्चे की परीक्षा तभी ली जाए जब बच्चा तैयार हो या फिर विद्यालय के भयमुक्त वातावरण की निर्माण की बात हो, जैसे कई उद्देश्यों वाली इस मूल्यांकन पद्धति को  सफलतापूर्वक लागू कर शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाने की परीक्षा अब हमारी है.





Friday, 30 March 2018

शादी और सरनेम



नाम इंसान की पहचान है, इंसान के व्यक्तित्व का हिस्सा। जन्म के समय दिए नाम पर ही टिके रहना या उसे बदलना किसी भी इंसान का व्यक्तिगत निर्णय है. पर, कई देशों में शादी के बाद महिलाओं को अपना सरनेम हटाकर अपने पति का सरनेम लगाना कानूनन जरूरी है. हालांकि, हमारे देश में ऐसी बाध्यता नहीं है परन्तु परंपरागत रूप से शादी के बाद औरतों के सरनेम बदलने की प्रथा रही है। जहां अक्सर लड़कियाँ शादी के बाद इसे सहर्ष या फिर थोड़े दवाब में स्वीकार कर लेती हैं वहीं कुछ महिलायें डबल-बैरल्ड या हाइफ़नेटेड नाम अपनाकर यानी अपने सरनेम के साथ पति का भी सरनेम जोड़कर एक नई पहचान बनाती हैं. परन्तु कई महिलाओं को यह नामांतरण का ख्याल रास नहीं आता. अचानक से शादी के बाद अपने घर-परिवार और जन्म स्थान छोड़ने के साथ -साथ वर्षों से जुड़े नाम और उससे बनी पहचान को बदल देना आसान नहीं होता।

कुछ वर्ष पूर्व शादी डॉट कॉम द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में 24 से 38 वर्ष के बीच 11 हजार 200 अविवाहित महिलाओं से जब उनके विचार मांगे गए तो 40.4 फीसदी ने कहा कि शादी के बाद वे अपना सरनेम नहीं बदलना चाहतीं। सरनेम के बदलने को लेकर यदि विकसित देशों के आंकड़ों पर नजर डालें, 1994 में यूरोबैरोमीटर के एक सर्वे में दावा किया गया था कि 94 प्रतिशत ब्रितानी महिलाएं शादी के बाद अपने पति का नाम अपना लेती हैं. हालाँकि,पिछले दो दशकों में इस आंकड़े में कुछ कमी आई है और वर्ष 2013 में यह 75 प्रतिशत तक पहुँच गया.

स्पष्ट है कि महिलाओं के सामाजिक स्थिति में बदलाव के साथ -साथ यह मुद्दा उतना सरल नहीं रहा. हमारे समाज में शुरू से पितृसत्तात्मक व्यवस्था रही है, जिसके तहत शादी के बाद लड़कियों का अपने माता -पिता और भाई-बहन को छोड़कर अपने पति के साथ ससुराल में बसने और उसी परिवार के एक अंग के रूप में माने जाने का रिवाज रहा है और नाम में किये जाने वाला बदलाव, उसी की एक कड़ी है. शादी के बाद बने नए रिश्तों के साथ खुद को जोड़ने और परिवार का नाम आगे बढ़ाने को लेकर यह जरूरी समझा जाता था.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या आधुनिक समाज में जहाँ स्त्रियों की सोच, दशा में व्यापक परिवर्तन हुये हैं , इस तरह नाम बदलने की परंपरा कायम रखना जरूरी है? परंपरायें तो इंसान की सहूलियत के लिए बनायी जाती है और अगर यह आपसी विवाद का मुद्दा बनने लगे तो क्या किया जाए?

सरनेम बदलने के पक्ष में तर्क दिया जाता है लड़की को शादी के बाद मिली नयी पहचान के लिए यह एक आवश्यक कदम है। कई लोगों का दावा है कि विवाह के बाद पति-पत्नी दोनों को उनके अलग -अलग अस्तित्व के रूप में न देखकर एक पारिवारिक इकाई के रूप में जाना जाता है, ऐसे में दोनों का सरनेम एक होना अनिवार्य है. कुछ औरतों का मानना है कि शादी के बाद पति की पहचान को अपने नाम के साथ जोड़ने से दोनों के बीच बना यह रिश्ता और दृढ होता है। यह पति और ससुराल पक्ष की ओर औरतों का समर्पण भी जाहिर करता हैै. इस सन्दर्भ में पितृसत्तात्मकता जैसे तर्क को यह कहकर ख़ारिज किया जाता है कि विवाह पूर्व लड़कियों को पिता द्वारा प्रदत्त सरनेम भी तो उसी पैतृक समाज का द्योतक है।

कानूनी तौर पर सरनेम न बदलने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है, ढेरों कागजी कार्रवाई का होना मतलब बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना।कई महिलाएं इस वजह से जब तक ज़रूरी न लगे तब तक अपने नाम को बदलने के बारे में नहीं सोचतीं परन्तु वहीं कई औरतें अपने नाम के साथ जुड़ी अपनी भावनाओं और अपनी पहचान को किसी कीमत पर खोने को तैयार नहीं हैं.उन्हें अपने नाम के साथ अपने माँ-बाप से जुड़े होने का अहसास होता है.इन महिलाओं का तर्क है कि, नाम के साथ उनका करियर, उनका काम, अनुभव और उनका व्यक्तित्व जुड़ा होता है, ऐसे में नाम बदलने की सोच अव्यवहारिक है.

महिलाओं के हकों की दिशा में काम करने वालों के अनुसार इस परंपरा को अपना लेने से महिलाओं को पुरुषों से हीन माने जाने के विचार को बल मिलता है. सारे बदलावों के लिए महिलाओं के ही तैयार रहने की उम्मीद क्यों? पारिवारिक ईकाई की जहाँ तक बात है, पत्नी का सरनेम पति भी अपनाकर इस रिश्ते को एक नई पहचान दे सकते हैं.

एक अध्ययन के मुताबिक ऐसी महिलाएं जो शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदलती, पुरुष उनके प्रति नकारात्मक भावना रखते हैं. उन्हें कम आकर्षक और खराब मां मानने के साथ ही आपसी रिश्ते में कम वफादार माना जाता है. हद तो तब हो जाती है जब सरनेम नहीं बदलने के औरतों के निर्णय को ससुराल पक्ष के लोग अपनी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान से जोड़ने लगते हैं और तो और कभी-कभी यह मुद्दा पति- पत्नी के बीच अनबन और तलाक जैसे गंभीर मसले का कारण बन जाता है.

हालांकि कुछ लोग इस मुद्दे को ज्यादा तूल देने के पक्षधर नहीं हैं. उनका तर्क है कि सरनेम से ज्यादा लगाव रखने का कोई कारण नहीं है, सरनेम का महत्व केवल अपनी पहचान को आसान बनाने तक ही रखा जाना उचित है. ज्यादा जरूरी यह है हम सरनेम के वजाय अपने व्यक्तिगत गुणों को अपनी पहचान का आधार बनाने पर बल दें.

कुछ पश्चिमी देशों में पति का स्वेच्छा से अपने सरनेम के स्थान पर अपनी पत्नी का सरनेम लगाने का भी प्रचलन बढ़ा है. कुछ मामूली कारणों मसलन अपना सरनेम पसंद न आना के अलावा समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था और लैंगिक भेदभाव को चुनौती देना भी इसका उद्देश्य है.

आधुनिक समाज में जहाँ समाज में स्त्री-पुरुष समानता को लेकर बहस छिड़ी है, नाम बदलने या न बदलने के निर्णय का अधिकार महिलाओं को दे देना क्या उचित नहीं?
















Friday, 23 March 2018

क्या पूरी होगी आस?


हर शाम लालटेन के शीशे को साफ़ करना, किरोसिन भरना और जलाकर निश्चित स्थान पर रखना, कभी २ दिन कभी ७ दिन या कभी कभी एक पखवाड़े और महीने तक बिजली का इंतज़ार करना, गर्मियों में बिस्तर पर लेटकर घूमने की आस के साथ पंखे को एकटक देखकर या टीवी पर आ रहे किसी फेवरिट कार्यक्रम के बीच में बिजली के गुल हो जाने के उपरांत मन-ही-मन १०८ दफा भगवान का नाम जपना और होली,दशहरा, दीवाली या छठ जैसे कुछ पर्वों को छोड़ साल के अन्य किसी दिन शाम के वक्त बल्ब जलने को किसी उत्सव से कम न सेलिब्रेट करना☺, ऐसी तमाम यादों से सराबोर मेरा मन इस महीने बिहार में गुजारे कुछ दिनों के दौरान वहां तक़रीबन हर रोज २० घंटे की बिजली आपूर्ति को देखकर आश्चर्यचकित हुए बिना न रहा. रही-सही कसर इन्वर्टर और बैटरी पूरी कर दे रहा है। 'हर घर बिजली- लगातार ' मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बिहार के विकास को ध्यान में रखकर किये गए सात निश्चयों में से एक निश्चय है, जिसके तहत बिहार के हरेक घर को बिजली से रोशन करने का वादा उन्होंने जनता से किया है. सौभाग्य योजना के तहत दी गयी जानकारी के मुताबिक बिहार में कुल 123.46 लाख ग्रामीण परिवार में से 58.76 लाख घरों में अबतक बिजली पहुंचाई जा सकी है जबकि 64 लाख से अधिक घर बिजली से अभी भी महरूम हैं. आशा है, नीतीश कुमार इस योजना के लक्ष्य को जल्द ही पूरा करेंगे। पटना से नालंदा जिले की तरफ जाते वक्त रास्ते के कुछ गाँवों में बिजली के खम्भे लगाने का काम होते देखकर तसल्ली हुई कि शायद अब बिहार 'लालटेन युग' से बाहर निकलने के रास्ते पर है!
भारत के अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में दौड़ती सडकों से तुलनीय सड़कें बिहार में देखकर मन में सवाल उठा कि वाकई जनता के 'अच्छे दिन' की शुरूआत तो नहीं है ये ? कई छोटे-छोटे गाँवों के सडकों के माध्यम से बड़े शहरों से जुड़ जाने से लोगों की जीवन -शैली बदली है, व्यापार -व्यवसाय बढे हैं, आने -जाने में लगने वाले समय में बचत ने लोगों के मानसिक स्तर पर प्रभाव डाला है. सडकों पर वाहन रोककर किये जाने वाले लूट-खसोट में भारी कमी आयी है. अगर आंकड़ों की तरफ न भी झांके तब कईयों का काम निपटाकर देर रात तक बिना परवाह किये घर लौटने की हिम्मत करना इस तथ्य की पुष्टि करता है. गुजरे वो दिन जब शाम होने तक घर तक किसी अपने या परिचित के न पहुँचने की खबर पाकर दिल की धड़कनें बढ़ जाया करती थी और तब तक सामान्य न होती जब तक सकुशल पहुँचने की खबर कानों में न पड़ती थी. उस डर और दहशत से छुटकारा जनता के लिए एक बहुत बड़ी राहत कही जाएगी. पर आगे भी, एक चुस्त -दुरुस्त सुरक्षा -व्यवस्था के साथ सरकार को चौकस रहना होगा ताकि वापिस जनता के शांति के साथ जीने के अधिकार में कोई सेंध न लगा सके.

होली बिहार में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है. समय में बदलाव के साथ अब त्योहारों की रौनक पहले जैसी नहीं होती। रंग खेलने से लेकर, पूरी-पुए, दही-बड़े, फ्राइड नमकीन खाने में भी लोग सावधानी बरतते हैं. हाँ, बच्चे हाथ में पिचकारी लिए सुबह से ही रंग-बिरंगी पिचकारी हाथ में लेकर एक -दूसरे पर रंग डालने को आतुर दिखे। पर, एक बड़ा अंतर कुछ बड़ों की होली में साफ़ दिखा। शराब के नशे में धुत लोगों का जत्था गाँव का चक्कर लगाते नहीं दिखा, दूकान की शटर गिराकर ४-५ लोगों के झुण्ड का देशी-विदेशी शराबों के साथ पार्टी करने की भी खबर या शराब के नशे में बेसुध इधर -उधर पटकाये लोगों को घर तक पहुंचाने जैसी खबरें भी अब होली का हिस्सा नहीं बनीं । कुछ मनचले लड़कों की जमात का शराब पीकर तेज गति से गाडी या बाइक चलाने और तत्पश्चात छोटी- बड़ी दुर्घटना की खबर का कानों में न पड़ना शराबबंदी कानून का सख्ती से लागू होने को प्रमाणित करता दिखा. 'शराबबंदी ' कानून के पक्ष और विपक्ष के अपने तर्क हैं, पर इस कानून ने होली और शराब की जुगलबंदी के मिथक को तोड़ने का काम किया है.

पटना में मुख्य सडकों के चारों तरफ कोचिंग क्लासेज की शत प्रतिशत सफलता की गारंटी देते बड़े- बड़े बोर्ड और पोस्टर्स और राजनीतिक दलों के आत्मप्रशंसा जैसे विज्ञापनों के अलावा सामाजिक मुद्दों के प्रति आम जनों के बीच जागरूकता फैलाते पोस्टर्स भी काफी संख्या में दिखे। कोई शिक्षा और स्वच्छता के महत्त्व को बता रहा था तो कोई बाल विवाह और दहेज़ प्रथा की बुराइयों को, कुछ लड़कियों को पढ़ाने के महत्व को. बालिका साईकिल योजना, मुख्यमंत्री पोशाक योजना और प्रोत्साहन योजना, नशाबंदी जैसे प्रावधान और गत २१ जनवरी को दहेज़ और बाल विवाह के विरोध में मानव श्रृंखला का आयोजन, सरकार का विकास के साथ सामाजिक मुद्दों पर भी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे न्याय यात्रा, विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा, प्रवास यात्रा, सेवा यात्रा, संकल्प यात्रा के तहत राज्य के लोगों की शिकायतें सुन चुके हैं और एक बार फिर निश्चय यात्रा की घोषणा कर सात निश्चय से सम्बंधित प्रगति की समीक्षा और जनता की शिकायतों के निपटारे का प्रयास करनेवाले हैं.

यक़ीनन नीतीश कुमार की अगुवाई में सरकार ने विकास की दिशा में सराहनीय कदम उठाये हैं. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद बेशक कुछ परिवर्तन हुए हैं। अब बिहार उपहास का विषय कम, बाकी दुनिया के लिए सुधारों के मद्देनजर कौतूहल का विषय ज्यादा बन गया है. नजरें नीतीश कुमार पर टिकी है. उम्मीदें बहुत हैं, काम भी बहुत करने हैं, सड़क, बिजली से लेकर उद्योग-धंधे लगाकर रोजगार के नए अवसर प्रदान करना, कृषि के विकास की तरफ ध्यान, भू-पुनर्विभाजन, शिक्षा और चिकित्सा के स्तर में सुधार जैसे कई वादे हैं, जिन्हें जल्द -से- जल्द पूरा करने की जिम्मेवारी नीतीश कुमार के कंधे पर है. आजादी मिलने के सत्तर साल बाद भी ३८ में से १७ जिलों में हर १ लाख लोगों पर अधिकतम ३ चिकित्सक का होना WHO द्वारा निर्धारित १:१००० के मापदंड के हिसाब से अत्यंत शर्मनाक है . शिेक्षा के क्षेत्र की भी हालत दयनीय है, विद्यार्थी और शिक्षक का अनुपात जहाँ प्राथमिक शिक्षा में ३०:१ तथा उच्च प्राथमिक वर्ग में ३५:१ निश्चित की गयी है, वहीँ बिहार में क्रमशः यह अनुपात ४३:१ और ९६:१ है.

हालांकि विकास की गति को लेकर जनता खुश नहीं दिखती। शुरूआती वर्षों में जिस तेजी से प्रगति को महसूस किया गया, वह अब नदारद है. आम जनता की तकलीफों और चिंताओं से इतर महज अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने एवं राजनीतिक दलों के वर्ग और जाति जैसे फालतू मुद्दों में उलझ कर विकास और प्रगति को दरकिनार करने का डर बिहार की जनता के जेहन में है.

राजगीर स्थित शांति स्तूप के दर्शन को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से लगाए गए रोपवे सेवा का संचालन को संभालते कर्मचारियों द्वारा एक युवती को निर्धारित रास्ते से पंक्ति में आने के निर्देश दिए जाने के बाद उस महिला का बेवजह उनसे वाद-विवाद करते देख मन विचलित हुआ। जरूरत है, हमें खुद को सुधारने की. जब हम सुधरेंगे, तब बिहार सुधरेगा।