Saturday, 8 November 2014

बाल यौन शोषण: कैसे लगे लगाम


इधर ३-४ महीनों के अंतराल में बैंगलोर में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ घटित यौन शोषण की घटनाओं ने मामले की गंभीरता को उजागर किया है. भारतीय सभ्यता में जहाँ विद्यालयों को मंदिर और शिक्षकों को देवता का दर्जा हासिल है, इस तरह की घटनायें हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है. गौरतलब है, बच्चों को डरा धमकाकर उनका यौन शोषण करना न केवल आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों की समस्या है बल्कि सुख-सुविधाओं से पूरी तरह से सम्पन घरों के बच्चों पर भी खतरा कम नहीं है.
यूनिसेफ और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रलय द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के मुताबिक हर ३ में से २ विद्यालय जाने वाले बच्चे किसी न किसी तरह के शारीरिक और मानसिक शोषण और ४२ % बच्चे यौन शोषण के शिकार पाये गये. यह भी पाया गया कि ७०% बच्चे अपने साथ हुए शोषण का जिक्र किसी से नहीं करते।

बच्चों के शोषण में केवल बाहरी व्यक्ति ही जिम्मेवार नहीं है वरन घरेलू रिश्तेदारों द्वारा भी बच्चों का खुलेआम शोषण किया जाता है। केन्द्र सरकार की ओर से बाल शोषण पर कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार ५३.२२ प्रतिशत बच्चे एक या उससे ज्यादा बार यौन शोषण के शिकार पाये गए , जिनमें ५३ प्रतिशत लड़के और ४७ प्रतिशत लड़कियाँ हैं। २२ प्रतिशत बच्चों ने अपने साथ गम्भीर किस्म और ५१ प्रतिशत ने दूसरे तरह के यौन शोषण की बात स्वीकारी तो ६ प्रतिशत को जबरदस्ती यौनाचार के लिये मारा-पीटा भी गया। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि यौन शोषण करने वालों में ५० प्रतिशत नजदीकी रिश्तेदार या मित्र थे।निश्चिततः यह स्थिति शर्मनाक और चिंताजनक है।

मसला इसलिए भी और गंभीर है कि बच्चों के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न को या तो अनदेखा कर दिया जाता है या फिर अपनी मान- मर्यादा की दुहाई देकर इस मुद्दे को दबा दिया जाता है. और-तो-और अगर किसी बच्चे के साथ किसी तरह की यौन हिंसा हो जाती है तब उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता है जिससे बाल यौन शोषकों का साहस और बढ़ता जाता है और समस्या बढ़ती ही जाती है.

सवाल उठता है, इन मासूमों के साथ हो रहे अत्याचारों के लिए कौन है जिम्मेवार? बेशक हमारा कानून, हमारी सोच,  सामजिक व्यवस्था, मात्र पैसा कमाने की होड़ में चल रही तमाम शिक्षण व्यवस्थाएं और आँखे मूंदे माँ-बाप, सब सवालों के कठघरे में हैं. अब सोचना है कि क्या हम कुछ बदलकर बच्चों को भयरहित एक खुशनुमा माहौल दे सकते हैं जिससे उनकी बचपन की स्मृतियाँ मधुर बने और एक बेहतर भविष्य की नींव डाली जा सके।


* अभिभावकों का दायित्व :
बच्चों की शिक्षा घर से ही शुरू होती है, क्यों न अपने बच्चों को ऐसे ढालने का प्रयत्न किया जाए कि इन घटनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिले.
बड़ों से सवाल -जवाब न करना, उनका हर हाल में आदर करना, शिक्षक को भगवान मानने जैसी पारम्परिक मान्यताओं को त्यागना बुद्धिमानी है.
बच्चोँ को बोलने की आजादी देनी होगी और हमें सुनने की शक्ति बढ़ानी होगी। बच्चों से दोस्ताना व्यवहार और बच्चों पर विश्वास कर समस्या को गंभीर होने से बचाया जा सकता है.
बच्चों को आयु अनुकूल  सेक्स सम्बन्धी शिक्षा देना कारगर हो सकता है, ताकि बच्चे सही और गलत ढंग से अंगों के स्पर्श का अंदाजा लगा सकें. ज्यादा जोर से गले लगाना या अत्यधिक करीब आना अथवा  कोई अजब बात- चीत या अभद्र वीडियो दिखाना सामान्य नहीं है, बच्चों को समझ आ सके.
यह भी बच्चों को बताना होगा कि यह कहीं भी हो सकता है, गुनहगार कोई भी हो सकता है. 
बच्चों को किसी भी आदमी के चरित्र को अपनी बुद्धि से परखने की स्वतंत्र दी जानी चाहिए और हमें उसका आदर भी करना चाहिए.
बेशक माता पिता की अति सतर्कता और जागरूकता बच्चों के यौन शोषण को ख़त्म करने का प्रभावी और कारगर उपाय साबित हो सकता है.


स्कूल या अन्य संस्थाओं का दायित्व :

* विद्यालयों और अन्य बाल संरक्षण संस्थाओं को भी इस दिशा में सख्त और कारगर कदम उठाने होंगे। इन संस्थाओं को एक सर्वमान्य बाल सुरक्षा नीति बनानी होगी जो सारे स्थाई व् अंशकालिक  कर्मचारियों और  सलाहकारों पर एकसमान लागू होगी. इन नीतियों को बच्चों से अवगत कराना संस्था की जिम्मेवारी हो मसलन शिकायत किससे करनी है. शिकायतकर्ताओं का नाम गुप्त रखने की व्यवस्था की जाये ताकि बच्चे अन्य किसी उत्पीड़न से बचें।
* शिक्षकों या अन्य कर्मचारियों की भर्ती के दौरान डिग्री, काबिलियत के अलावा उनके आचरण को भी अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू के रूप में देखना होगा . इसके मद्देनजर उनकी पृष्ठभूमि की जांच अनिवार्य है. इसके उपरांत भी पूरी नजर रखनी जरूरी है.
* समय-समय पर इन संस्थाओं के उच्च पदाधिकारियों का बच्चों से बातचीत एवं दोस्ताना माहौल समस्या को कम करने में सहायक होगा।
* आयु अनुरूप सेक्स शिक्षा देने की भी व्यवस्था की जा सकती है.

*बच्चों के द्वारा किसी भी शिक्षक अथवा शिक्षिका के खिलाफ शिकायत किये जाने की स्थिति में तुरंत पुलिस को सूचित करने की जिम्मेवारी उठानी होगी.
 

सरकार का दायित्व 
भारत में बाल यौन शोषण के खिलाफ एक सख्त कानून की अत्यंत जरुरत महसूस की जा रही थी. इस दृष्टि से  बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012 का प्रारूप, बच्‍चों को यौन उत्‍पीड़न और शोषण से बचाने तथा कानूनी प्रावधानों को मजबूती प्रदान करने के लिए तैयार किया गया।यह अधिनियम हर बच्‍चे को जो 18 वर्ष से कम उम्र का हो, उसे यौन उत्‍पीड़न, यौनाचार और अश्‍लीलता से सुरक्षा प्रदान करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत कठोर दंड का प्रावधान है।

 पोस्को नामक इस कानून को कड़ाई से लागू करना और लोगों को इस कानून के बारे में अवगत कराना सरकार की जिम्मेवारी है. इस कानून के तहत २०१२ में ८,५४१ शिकायतों की तुलना में सन २०१३ में १२,३६३ शिकायतें दर्ज़ की गई. 
* स्थानीय पुलिस को भी बेहद सतर्कता से काम करना होगा। विद्यालयों और अन्य संस्थाओं में सुरक्षा सम्बन्धी इंतजाम किये गए हैं अथवा नहीं, शिक्षकों की भर्ती में आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है या नहीं, समय-समय पर जांच-पड़ताल को अनिवार्य करना होगा।

* किसी मामले की शिकायत  के उपरांत अविलम्ब उपयुक्त कदम उठाये जाना जरूरी है.

* दोषी पाये जाने वालों का एक केंद्रीकृत रिकॉर्ड भी बनाये जाने में कोताही न बरती जाए.

* साथ ही, इस दिशा में लोगों को सचेत करने हेतु समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिये।  टीवी, रेडियो, नुक्कड़ नाटकों का सहारा लिया जा सकता है. 

निश्चित रूप से हम सब एक-दूसरे के सहयोग से बच्चों के लिए एक सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं.

 

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