Thursday 27 November 2014

ऑनर किलिंग

पिछले हफ्ते देश की राजधानी दिल्ली के द्वारका इलाके में भावना यादव  की हत्या का मुद्दा आज लोकसभा में भी  उठा. ऑनर किलिंग को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने और इस विषय पर सरकार और समाज को और गंभीर होने की मांग की गई. २१ वर्षीय भावना की महज अपनी  मर्ज़ी से किसी दूसरी जाति  के लडके के साथ विवाह कर लेने की वजह से जान  ले ली गई । इस हत्या को अंजाम दिया, अपने ही माँ -बाप ने. और तो और उन्हें अपने किये पर शर्मिंदगी भी नहीं।ऐसा पहली बार नहीं हुआ  है, विगत कुछ वर्षों में  कई ऐसी  खबरें पढने को मिली  है.  नितीश कटारा , निरुपमा  पाठक,  आशा सैनी और योगेश , मोनिका  कुलदीप , खुशबू ,दीप्ति, हरप्रीत जैसे लोगों को प्रतिष्ठा और  मान मर्यादा के नाम पर मार दिया गया । इस तरह की हत्याएँ निसंदेह भारतीय  सामजिक व्यवस्था की खामियां  उजागर करती है और कई सवाल खड़े  करती है. क्या लोकलाज और सम्मान के लिए हत्या जैसे जघन्य अपराध करते हाथ नहीं कांपते ? सजा, दण्ड  का  भय भी ऐसा करने से नहीं रोक पाता ? क्या भारतीय समाज में एक वयस्क लड़का-लड़की का खुद अपना जीवनसाथी का चुनाव करना अपराध है ?  क्या अपनी  ज़िन्दगी पर अपना कोई अधिकार नहीं है? और क्या विचार -विमर्श कर मामले को खुशनुमा मोड़ नहीं दिया जा सकता था? इस तरह की हत्याओं को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

बेशक बच्चों और उनके माता-पिता के  बीच संबंधों को लेकर  भी निराशाजनक स्थिति है.  परस्पर प्रेम और विश्वास अपनी मान-मर्यादा के आगे गौण हो जाते हैं . दुखद है, विकास की दिशा में  अग्रसर  इस देश में किसी परंपरा को तोड़ने के एवज में या तो मौत मिलती है अन्यथा अपनी मर्ज़ी को  दरकिनार कर अपने तथाकथित हितैषियों द्वारा चुने गए जीवनसाथी के संग  ज़िन्दगी  बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता है।अपनी मर्ज़ी अपने बच्चों पर थोपने की इस परंपरा से   हर तरह से नुकसान की ही उम्मीद की जा सकती है.
 छोटे-छोटे  शहरों  से लेकर  महानगरों, शिक्षित या अशिक्षित, उच्च से लेकर निम्न आय वर्गीय परिवारों तक में ऐसे  विचार और  हत्यारों के  साथ हमदर्दी  रखने वालों की कमी नहीं है. दुर्भाग्यवश देश की कई पंचायतें भी ऐसी हत्याओं के पक्ष में बयान जारी करती रहती हैं। नतीजतन, यह मामला  देश की कानून व्यवस्था के सामने भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है ।अंदाज़न १००० से अधिक हत्याएं हर साल झूठी  प्रतिष्ठा के नाम पर कर दी  जाती हैं. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार इज्जत के नाम पर दुनिया भर में हर पांचवीं हत्या भारत में होती है. तमाम कोशिशों के बावजूद भी इन पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.


शाइनिंग इंडिया नारे को झुठलाती इन घटनाओं पर लगाम लगाना निहायत जरूरी है.  २१ वीं सदी  में पता नहीं हम अपनी किस संस्कृति को सहेजने में लगे हैं?  अगर सच में हमें अपनी परम्पराओं पर गर्व महसूस करना है तब इन कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। समाज में परिवर्तन होते रहते है। सती प्रथा, बाल -विवाह , छूआछूत जैसी कुरीतियों को मिटाने में हमें कामयाबी  मिली है.  जरूरत है, दकियानूसी विचारों को तिलांजलि देकर हम नई सोच के साथ आगे बढ़ें। युवा पीढ़ी को गुजरे जमाने के तौर-तरीकों से चलने को मजबूर न कर थोड़ी स्वतंत्रता देकर बड़प्पन दिखाएं. अभिभावकों का खुद को बदलना, अपने बच्चों के साथ वक्त बिताना, उनकी बातें सुनना, उनकी तमाम समस्याओं का समाधान करना लाभदायक साबित हो सकता है. सरकार भी इसकी भयावहता को समझते हुए ऑनर किलिंग के मामलों के लिए एक अलग कानून बनाने पर विचार कर रही है. 

Saturday 8 November 2014

बाल यौन शोषण: कैसे लगे लगाम


इधर ३-४ महीनों के अंतराल में बैंगलोर में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ घटित यौन शोषण की घटनाओं ने मामले की गंभीरता को उजागर किया है. भारतीय सभ्यता में जहाँ विद्यालयों को मंदिर और शिक्षकों को देवता का दर्जा हासिल है, इस तरह की घटनायें हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है. गौरतलब है, बच्चों को डरा धमकाकर उनका यौन शोषण करना न केवल आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों की समस्या है बल्कि सुख-सुविधाओं से पूरी तरह से सम्पन घरों के बच्चों पर भी खतरा कम नहीं है.
यूनिसेफ और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रलय द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के मुताबिक हर ३ में से २ विद्यालय जाने वाले बच्चे किसी न किसी तरह के शारीरिक और मानसिक शोषण और ४२ % बच्चे यौन शोषण के शिकार पाये गये. यह भी पाया गया कि ७०% बच्चे अपने साथ हुए शोषण का जिक्र किसी से नहीं करते।

बच्चों के शोषण में केवल बाहरी व्यक्ति ही जिम्मेवार नहीं है वरन घरेलू रिश्तेदारों द्वारा भी बच्चों का खुलेआम शोषण किया जाता है। केन्द्र सरकार की ओर से बाल शोषण पर कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार ५३.२२ प्रतिशत बच्चे एक या उससे ज्यादा बार यौन शोषण के शिकार पाये गए , जिनमें ५३ प्रतिशत लड़के और ४७ प्रतिशत लड़कियाँ हैं। २२ प्रतिशत बच्चों ने अपने साथ गम्भीर किस्म और ५१ प्रतिशत ने दूसरे तरह के यौन शोषण की बात स्वीकारी तो ६ प्रतिशत को जबरदस्ती यौनाचार के लिये मारा-पीटा भी गया। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि यौन शोषण करने वालों में ५० प्रतिशत नजदीकी रिश्तेदार या मित्र थे।निश्चिततः यह स्थिति शर्मनाक और चिंताजनक है।

मसला इसलिए भी और गंभीर है कि बच्चों के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न को या तो अनदेखा कर दिया जाता है या फिर अपनी मान- मर्यादा की दुहाई देकर इस मुद्दे को दबा दिया जाता है. और-तो-और अगर किसी बच्चे के साथ किसी तरह की यौन हिंसा हो जाती है तब उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता है जिससे बाल यौन शोषकों का साहस और बढ़ता जाता है और समस्या बढ़ती ही जाती है.

सवाल उठता है, इन मासूमों के साथ हो रहे अत्याचारों के लिए कौन है जिम्मेवार? बेशक हमारा कानून, हमारी सोच,  सामजिक व्यवस्था, मात्र पैसा कमाने की होड़ में चल रही तमाम शिक्षण व्यवस्थाएं और आँखे मूंदे माँ-बाप, सब सवालों के कठघरे में हैं. अब सोचना है कि क्या हम कुछ बदलकर बच्चों को भयरहित एक खुशनुमा माहौल दे सकते हैं जिससे उनकी बचपन की स्मृतियाँ मधुर बने और एक बेहतर भविष्य की नींव डाली जा सके।


* अभिभावकों का दायित्व :
बच्चों की शिक्षा घर से ही शुरू होती है, क्यों न अपने बच्चों को ऐसे ढालने का प्रयत्न किया जाए कि इन घटनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिले.
बड़ों से सवाल -जवाब न करना, उनका हर हाल में आदर करना, शिक्षक को भगवान मानने जैसी पारम्परिक मान्यताओं को त्यागना बुद्धिमानी है.
बच्चोँ को बोलने की आजादी देनी होगी और हमें सुनने की शक्ति बढ़ानी होगी। बच्चों से दोस्ताना व्यवहार और बच्चों पर विश्वास कर समस्या को गंभीर होने से बचाया जा सकता है.
बच्चों को आयु अनुकूल  सेक्स सम्बन्धी शिक्षा देना कारगर हो सकता है, ताकि बच्चे सही और गलत ढंग से अंगों के स्पर्श का अंदाजा लगा सकें. ज्यादा जोर से गले लगाना या अत्यधिक करीब आना अथवा  कोई अजब बात- चीत या अभद्र वीडियो दिखाना सामान्य नहीं है, बच्चों को समझ आ सके.
यह भी बच्चों को बताना होगा कि यह कहीं भी हो सकता है, गुनहगार कोई भी हो सकता है. 
बच्चों को किसी भी आदमी के चरित्र को अपनी बुद्धि से परखने की स्वतंत्र दी जानी चाहिए और हमें उसका आदर भी करना चाहिए.
बेशक माता पिता की अति सतर्कता और जागरूकता बच्चों के यौन शोषण को ख़त्म करने का प्रभावी और कारगर उपाय साबित हो सकता है.


स्कूल या अन्य संस्थाओं का दायित्व :

* विद्यालयों और अन्य बाल संरक्षण संस्थाओं को भी इस दिशा में सख्त और कारगर कदम उठाने होंगे। इन संस्थाओं को एक सर्वमान्य बाल सुरक्षा नीति बनानी होगी जो सारे स्थाई व् अंशकालिक  कर्मचारियों और  सलाहकारों पर एकसमान लागू होगी. इन नीतियों को बच्चों से अवगत कराना संस्था की जिम्मेवारी हो मसलन शिकायत किससे करनी है. शिकायतकर्ताओं का नाम गुप्त रखने की व्यवस्था की जाये ताकि बच्चे अन्य किसी उत्पीड़न से बचें।
* शिक्षकों या अन्य कर्मचारियों की भर्ती के दौरान डिग्री, काबिलियत के अलावा उनके आचरण को भी अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू के रूप में देखना होगा . इसके मद्देनजर उनकी पृष्ठभूमि की जांच अनिवार्य है. इसके उपरांत भी पूरी नजर रखनी जरूरी है.
* समय-समय पर इन संस्थाओं के उच्च पदाधिकारियों का बच्चों से बातचीत एवं दोस्ताना माहौल समस्या को कम करने में सहायक होगा।
* आयु अनुरूप सेक्स शिक्षा देने की भी व्यवस्था की जा सकती है.

*बच्चों के द्वारा किसी भी शिक्षक अथवा शिक्षिका के खिलाफ शिकायत किये जाने की स्थिति में तुरंत पुलिस को सूचित करने की जिम्मेवारी उठानी होगी.
 

सरकार का दायित्व 
भारत में बाल यौन शोषण के खिलाफ एक सख्त कानून की अत्यंत जरुरत महसूस की जा रही थी. इस दृष्टि से  बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012 का प्रारूप, बच्‍चों को यौन उत्‍पीड़न और शोषण से बचाने तथा कानूनी प्रावधानों को मजबूती प्रदान करने के लिए तैयार किया गया।यह अधिनियम हर बच्‍चे को जो 18 वर्ष से कम उम्र का हो, उसे यौन उत्‍पीड़न, यौनाचार और अश्‍लीलता से सुरक्षा प्रदान करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत कठोर दंड का प्रावधान है।

 पोस्को नामक इस कानून को कड़ाई से लागू करना और लोगों को इस कानून के बारे में अवगत कराना सरकार की जिम्मेवारी है. इस कानून के तहत २०१२ में ८,५४१ शिकायतों की तुलना में सन २०१३ में १२,३६३ शिकायतें दर्ज़ की गई. 
* स्थानीय पुलिस को भी बेहद सतर्कता से काम करना होगा। विद्यालयों और अन्य संस्थाओं में सुरक्षा सम्बन्धी इंतजाम किये गए हैं अथवा नहीं, शिक्षकों की भर्ती में आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है या नहीं, समय-समय पर जांच-पड़ताल को अनिवार्य करना होगा।

* किसी मामले की शिकायत  के उपरांत अविलम्ब उपयुक्त कदम उठाये जाना जरूरी है.

* दोषी पाये जाने वालों का एक केंद्रीकृत रिकॉर्ड भी बनाये जाने में कोताही न बरती जाए.

* साथ ही, इस दिशा में लोगों को सचेत करने हेतु समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिये।  टीवी, रेडियो, नुक्कड़ नाटकों का सहारा लिया जा सकता है. 

निश्चित रूप से हम सब एक-दूसरे के सहयोग से बच्चों के लिए एक सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं.

 

Saturday 1 November 2014

क्या है ऑनलाइन ग्रोसरी शॉपिंग?

ऑनलाइन खरीदारी अब अनोखी बात नहीं है. समय की बचत, विकल्पों की भरमार और प्रतिस्पर्धात्मक कीमतों ने इ-कॉमर्स को आम लोगों के मध्य लोकप्रिय बनाया है. स्मार्ट फ़ोन के गिरते दाम, बेहतर इंटरनेट-कनेक्टिविटी और ऑनलाइन भुगतान को लेकर घटते डर जैसी वजहों से भी ऑनलाइन खरीदारी करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ  है. इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, जूते जैसी चीजों को ऑनलाइन खरीदने वाले ग्राहक अब आटा ,दाल, चावल, नमक, साबुन जैसी रोजमर्रा इस्तेमाल की जाने वाली चीजों की भी खरीदारी ऑनलाइन करने लगे हैं. लोगों की इन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े शहरों यथा मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई, पुणे, कोलकाता, चंडीगढ़ से लेकर त्रिवेंद्रम, कोयंबटूर, इंदौर और जमशेदपुर जैसे शहरों में भी कई ऑनलाइन ग्रॉसरी स्टोर खुले हैं. आरामशॉप.कॉम, एकस्टॉप. कॉम, बिगबास्केट. कॉम, ऐट माय डोर स्टेप. कॉम, मायग्राहक. कॉम, ज़ॉपनाउ. कॉम, ओमार्ट.इन, लोकलबनिया. कॉम, राशनहट. कॉम, टाउनएसेंशियल. कॉम, वेजीबाज़ार. कॉम, फ्रेश एंड डेली और मैंगोशॉपर्स इत्यादि वेबसाइट में जाकर ग्रोसरी शॉपिंग की जा सकती है. 

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ऑनलाइन ग्रॉसरी रिटेल आउटलेट की संख्या भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि कुल इंटरनेट यूजर्स की संख्या विगत वर्ष में 12 करोड़ से 21.3 करोड़ हो गई है.
भारत में ऑनलाइन किराना का बाजार 25-30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। पूरे रिटेल बाजार में खाने और किराने के सामान के बाजार का हिस्सा करीब 300 अरब डॉलर का है।निसंदेह बड़े बाज़ार तक पहुँच और मुनाफे की अपार संभावनाएं भी उद्यमियों को भी किराने के सामान की ऑनलाइन दुकान लगाने के लिए प्रेरित कर रही है. 

ग्राहक को फायदे: 

 हर हफ्ते दूकान अथवा मॉल का चक्कर लगाना, भुगतान और डिलीवरी के लिए कतार में खड़ा होना, लिमिटेड स्टॉक मनपसनद ब्रांड का न मिलना और तमाम अन्य तरह के खर्चे किराने की शॉपिंग को उबाऊ बनाती है और इस स्थिति में  ऑनलाइन स्टोर्स बड़े फायदेमंद  साबित होते हैं. ये  स्टोर्स चौबीसों घंटे  खुले रहते हैं. अपनी सुविधा अनुसार आर्डर  दिया जा सकता है. साथ ही, अपने हिसाब से डिलीवरी स्लॉट का भी चुनाव करने की आजादी  ग्राहक को मिलती है।  लुभावने ऑफर्स और डिस्काउंट ऑनलाइन स्टोर्स का अन्य बड़ा अट्रैक्शन है। मिसाल के लिए मुंबई, बंगलुरु और हैदराबाद में बिजनेस चलाने वाली बिगबास्केट.कॉम अप्रैल में दिए जाने वाले हर पहले ऑर्डर पर 10 प्रतिशत तक डिस्काउंट दे रही है। कुछ स्टोर्स रिवॉर्ड प्वाइंट्स भी देते हैं। 1000 रुपये से ऊपर के ज्यादातर ऑर्डर पर मुफ्त डिलीवरी मिलती है। इन वेबसाइट्स पर मासिक शॉपिंग लिस्ट भी बनाने की सुविधा मिलती है जिससे काफी सहूलियत होती है. इन स्टोर्स की और भी खास बात है कि यहाँ इम्पोर्टेड सामानों की भी खासी रेंज मिल जाती है जो कि  परंपरागत दुकानों में मुश्किल है।   

 कंपनियों के काम करने के तरीके:

विभिन्न कम्पनियों ने अलग-अलग मॉडल को चुना है. कुछ कंपनियों ने अपना भंडारगृह बनाया है, जहां वे अपने प्रॉडक्ट का स्टॉक रखते हैं, जबकि कुछ ऑर्डर मिलने पर थोक खरीदारी करते हुए संबंधित ग्राहक तक माल पहुंचाने का काम करते हैं. कुछ वेबसाइट ग्राहकों का आर्डर ऑनलाइन कार्ट के अलावा फोन पर भी लेने की सुविधा देती हैं। एक बार ऑर्डर दर्ज करवाने के बाद वांछित वस्तुओं को यथासंभव उसी दिन या कुछ घंटों में ग्राहक के दरवाजे तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था कंपनियों द्वारा की जाती है वहीँ, आरामशॉप ने एक अलग ही मॉडल को अपनाया है, जो केवल ऑर्डर लेती है और ग्राहक द्वारा अपने पसंद के चुने हुए किराना दुकान तक ऑर्डर तत्काल पहुंचा देती है. वहां से ग्रॉसरी ग्राहक तक पहुंचा दी जाती है और नकद ले लिया जाता है।इसके लिए आरामशॉप ने कई किराना दुकानों को अपने साथ जोड़ा है. यकीनन, माल की गुणवत्ता या समय पर डिलीवरी जैसे पैमाने पर इनकी पकड़ नहीं रह सकती और पर हाँ, कम निवेश और कम कर्मचारियों से भी काम चलाया जा सकता है।ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए  इस व्यवसाय में लगी कई कंपनियां ऑर्डर देने के कुछ घंटों की तय समय सीमा में सामान नहीं पहुंचने पर ग्राहक को आर्थिक क्षति-पूर्ति करने जैसे कदम भी उठा रही है. ऑनलाइन किराना कंपनियां कई तरीकों से उपभोक्ताओं को आकर्षित करने में लगी है.

* ऑनलाइन बेचने की दिक्कतें:

बेशक ऑनलाइन किराना सामानों का चलन बढ़ रहा है लेकिन ऑनलाइन किराना कंपनियों को कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. जैसे यह व्यवसाय कम मार्जिन पर आधारित है और ज्यादातर कंपनियों का कामकाज एक-दो शहरों तक ही सिमटा हुआ है. दूसरी, हरेक शहर में लोगों की आदतें भी एक सी नहीं होती. उनको समझना और पूरा करना भी भी एक चुनौती है. और तो और जल्दी खराब हो जाने वाले उत्पाद भी ऑनलाइन किराने की दुकान चलाने वालों के लिए एक चुनौती है। उन्नत तकनीक के सॉफ्टवेयर के अलावा स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ मजबूत गठजोड़ और सप्लाई की मजबूत व्यवस्था, भण्डार गृृह और स्टोरेज सुविधा, कुशल वितरण व्यवस्था जैसे ऑफलाइन घटकों को भी नजरअंदाज  नहीं किया जा सकता है।
मार्केट में अपार सम्भावनों को देखते हुए संगठित खुदरा शृंखलाएं भी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी पेशकश करने लगी हैं। फ्यूचर समूह की प्रीमियम फूड शृंखला फूडहॉल के बाद अब रिलायंस इंडस्ट्रीज की खाद्य एवं किराना (फूड ऐंड ग्रोसरी) शृंखला रिलायंस फ्रेश और एमेजॉन भी इस दौड़ में शामिल हो गई है।स्पेंसर्स रिटेल और आदित्य बिड़ला के अलावा अन्य कंपनियों के भी इस कारोबार में आगे बढ़ने के पूरे आसार है.

जाहिर है, उपभोक्ताओं को तो कई विकल्प मिलने वाले हैं वहीँ इस बाजार पर कब्जे के लिए ऑनलाइन कंपनियों में प्रतियोगिता भी बढ़ने वाली है. पर हाँ, रचनात्मक सोच के साथ उत्कृष्ट ग्राहक सेवा देकर ऑनलाइन ग्रोसरी स्टोर बड़ा मुनाफा कमा सकती है.



Monday 27 October 2014

 दास्ताने आजादी: तस्वीरों के जरिये 

 इन दिनों बैंगलोर के नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट में 'विजुअल आर्काइव ऑफ़ कुलवंत रॉय' नामक एक प्रदर्शनी चल रही है जिसमें फोटो जर्नलिस्ट कुलवंत रॉय द्वारा सन १९३० से १९७० के मध्य खींची गयी दुर्लभ तस्वीरों को लगाया गया है। तक़रीबन ३०० तस्वीरों से सजी इस प्रदर्शनी की एक-एक तस्वीर गुलाम भारत की लाचारियों और स्वतंत्र भारत की उम्मीदों को बयां करती है जिसे हमने किताबों और कहानियों में पढ़ा है।
तक़रीबन ५ दशकों की कई खट्टी -मीठी यादों को सहेजे ये तस्वीरें भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है, चाहे वह १९४२ के क्रिप्स मिशन की तस्वीरें हो या शिमला कैबिनट मिशन की या फिर महात्मा गांधी और फ्रंटियर  गांधी की नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में हुई मुलाकात की तस्वीर।भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इन महत्वपूर्ण क्षणों को देखना एक अनोखा अनुभव है. 
विभिन्न रैलियां को सम्बोधित करते गांधी, रेलवे के तीसरे दर्ज़े में यात्रा करते गाँधी,नेहरू और पटेल के साथ मंत्रणा में व्यस्त गांधी और जिन्ना के साथ विचार- विमर्श करते गांधी की तस्वीरें अतीत को जीवंत कर उठी है. 

इन तस्वीरों के माध्यम से स्वतंत्र भारत के समक्ष चुनौतियाँ को भी देखा और महसूस किया जा सकता है। संविधान पर हस्ताक्षर करते प्रमुख नेतागण, पटेल की विभिन्न देसी रियासतों के महाराजाओं से मुलाकात या पाकिस्तान युद्ध के वक्त सीमा पे लड़ते जवानों का हौसला देखना अत्यंत रोमांचक है.

 इन गंभीर मसलों के अलावा कुछ हलके- फुल्के क्षणों को भी कुलवंत रॉय ने उतनी ही खूबसूरती  से अपने कैमरे में कैद किया है यथा बिरला हाउस में लंच के बाद हाथ धोते नेहरू, अपने नाती राजीव गांधी को दुलारते नेहरू, बहन विजय लक्ष्मी पंडित के गले मिल रहे नेहरू या एक क्रिकेट मैच के दौरान बल्ले को थामे नेहरू। राजनीति का पाठ सीखती इंदिरा गांधी की तस्वीरें भी इस प्रदर्शनी  का हिस्सा बनी है.

तस्वीरों के अलावा यहाँ महत्वपूर्ण पोस्टकार्ड, समाचारपत्रों की मौलिक प्रतियाँ भी देखी जा सकती है. हॉल के बीचों-बीच रखे कैमरे को देखना भी सुखद है जो इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों का जरिया बना.

आजादी मिलने के तत्पश्चात कुलवंत रॉय के विदेश भ्रमण की तस्वीरें भी यहाँ लगाई गयी है जिसमें तत्कालीन विश्व की झलकियाँ मिलती है .स्वंतत्रता आंदोलन के अलावा भारत के कई महत्वपूर्ण स्थलों की तस्वीरें भी आकर्षित करती है मसलन अमरनाथ की कठिन यात्रा पर जाते लोग और भाखरा-नांगल बाँध की विशालता।

 इस बेमिसाल फोटो संग्रह को सहेजा और आम जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है, आदित्य आर्या ने जो कुलवंत रॉय के निकट सम्बन्धी भी हैं।
The crates stacked with old photographs were lying in one corner of renowned advertising photographer Aditya Arya’s house for almost 24 years. He finally opened them one day, and he was surprised to find a treasure—numerous photographs that reflected key moments in India’s history of independence. It was unimaginable that a long forgotten photojournalist from the pre-independence period clicked these pictures. This photographer was Arya’s uncle, Kulwant Roy. Roy’s images are a documentation of India during the pre- as well as postindependence eras. He has managed to capture raw emotions and crucial events that emerged from the Indian political movements. One is easily transported into these eras and swayed by the moments frozen into each of these frames. - See more at: http://betterphotography.in/perspectives/great-masters/kulwant-roy/12313/#sthash.AHRQdXPq.dpuf
The crates stacked with old photographs were lying in one corner of renowned advertising photographer Aditya Arya’s house for almost 24 years. He finally opened them one day, and he was surprised to find a treasure—numerous photographs that reflected key moments in India’s history of independence. It was unimaginable that a long forgotten photojournalist from the pre-independence period clicked these pictures. This photographer was Arya’s uncle, Kulwant Roy. Roy’s images are a documentation of India during the pre- as well as postindependence eras. He has managed to capture raw emotions and crucial events that emerged from the Indian political movements. One is easily transported into these eras and swayed by the moments frozen into each of these frames. - See more at: http://betterphotography.in/perspectives/great-masters/kulwant-roy/12313/#sthash.AHRQdXPq.dpuf