Monday, 20 April 2015

नेट न्यूट्रैलिटी

एयरटेल द्वारा जीरो योजना की घोषणा के बाद नेट न्यूट्रैलिटी या नेट तटस्थता पर बहस तेज हो गई है।उपभोक्ताओं को कुछ मोबाइल एप्स तक मुफ्त में पहुंच की सुविधा देने की व्यवस्था वाली एयरटेल-जीरो नामक ओपन मार्केटिंग प्लेटफार्म गत सप्ताह कंपनी ने पेश की थी। इसमें शुल्क का बोझ वेबसाइट चलाने वाली या ऐप बनाने वाली कंपनियों द्वारा उठाने की बात कही गयी है. पर नेट तटस्थता की वकालत करने वाले इस योजना का जमकर विरोध कर रहे है. इनका तर्क है कि किस वेबसाइट को धीमा चलाना है, किसे फास्‍ट या फ्री में एक्‍सेस देना है, इस मनमानी का अधिकार टेलीकॉम कंपनियों को मिला तो इंटरनेट की आजादी ही खतरे में पड़ जाएगी। कुछ टेलीकॉम कंपनियां कुछ वेबसाइटों को फ्री या तेज स्‍पीड देकर बाकी वेबसाइटों का रास्‍ता बंद करना चाहती हैं। इंटरनेट पर हर वेबसाइट को बराबर स्‍पीड और बराबर मौका मिलना चाहिए।

और तो और, उपभोक्ताओं के भी नेट के इस्तेमाल की स्वतंत्रता पर खतरा है. अभी यदि कोई व्यक्ति किसी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से डाटा पैक लेता है तब उसे अपने डेटा के इस्तेमाल के हिसाब से भुगतान करना होता है न की अलग अलग वेबसाइट अथवा ऐप के आधार पर. उसका यह अधिकार है कि वो नेट सर्फ करे या फिर स्काइप, वाइबर पर वॉइस या वीडियो कॉल करे. लेकिन अगर नेट न्यूट्रैलिटी खत्म हुई तो इंटरनेट डाटा के मामले में हमें हर सुविधा के लिए अलग से भुगतान करना पड़ सकता है। इससे कंपनियों को तो फायदा होगा, लेकिन आम जनता के लिए इंटरनेट के काफी महंगे हो जाने की संभावना है । सरल उदाहरण से समझा जा सकता है , जैसे की फोन लगने पर जिस तरह किसी भी नंबर पर कॉल करना ग्राहकों की मर्जी पर निर्भर करता है, उसी तरह इंटरनेट प्लान लेने पर कौन सी साइट देखनी है, इसका निर्णय लेने का अधिकार भी ग्राहकों को ही मिलना चाहिए. टेलिकॉम कंपनियां इसे खत्म करना चाहती हैं.

आम जनता, फिल्म हस्तियों से लेकर कई राजनीतिज्ञों ने मिलकर ट्राइ से मांग की है कि ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को जारी रखा जाए। सवाल है कि क्या सचमुच टेलीकॉम कंपनियां इंटरनेट सेवा देने के नाम पर इंटरनेट पर ही कब्‍जा जमाना चाहती हैं।

हालांकि फ्लिपकार्ट जैसी इ कॉमर्स की अग्रणी कंपनी ने नेट न्युट्रलिटी पर हुए हंगामे को देखते हुए एयरटेल जीरो योजना से अपने को अलग कर लिया है. इसी बीच एयरटेल ने भी अपना पक्ष साफ करने की कोशिश की है. एयरटेल का कहना है कि इस जीरो प्लान को लेकर लोगों में गलतफहमी है और यह योजना नेट न्यूट्रैलिटी की अवधारणा का बिलकुल उल्लंघन नहीं करती। 'जीरो योजना' के तहत :
  1. किसी भी तरह के एप्लिकेशन और कंटेंट को एक टोल-फ्री सर्विस के जरिए उपभोक्ताओं तक  पहुँचाया जाएगा.
  2. ऐसे कस्टमर्स जिनके पास डेटा पैक नहीं है, वह भी जीरो प्लान के तहत आने वाली वेबसाइट्स को बिना किसी डेटा पैक की मदद के फ्री में एक्सेस कर पाएंगे.
  3. कोई भी साइट्स जो टॉल फ्री सर्विस का हिस्सा हों या नहीं उसे ब्लॉक नहीं किया जाएगा. बिना किसी भेद-भाव के कोई भी बेब-पेज एक्सेस करना संभव है. 
  4. यह प्लेटफॉर्म बिना किसी भेद-भाव के हर उन कंपनियों के लिए खुला होगा जो हमारे इस सर्विस से जुड़ना चाहेंगी।
अपने ग्राहकों को भेजे ईमेल में भारती एयरटेल के प्रबंध निदेशक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (भारत व दक्षिण एशिया) गोपाल विट्टल ने लिखा है, ‘हम पूरी तरह नेट निरपेक्षता के पक्ष में हैं।’’ उन्होंने कहा कि यह प्लेटफॉर्म सभी ऐप डेवलपर्स, कंटेंट प्रदाताओं और इंटरनेट साइटों को समानता के आधार पर उपलब्ध है और सभी को समान रेट कार्ड की पेशकश की जा रही है।यह भी कहा है, ‘‘इसमें और टोल-फ्री वॉयस मसलन 1800 में कोई अंतर नहीं है।’’ कंपनी के रूप में हम किसी वेबसाइट को ब्लॉक नहीं करते हैं और न ही उसे अलग रफ्तार की पेशकश करते हैं। हमने ऐसा कभी नहीं किया है और न ही ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि सभी वेबसाइट, कंटेंट या एप्लिकेशन के साथ उसके नेटवर्क पर समान बर्ताव किया जाएगा, बेशक वे टोल-फ्री प्लेटफॉर्म पर हैं या नहीं।

यह विचारणीय मुद्दा है कि क्या सच में जीरो योजना नेट न्यूट्रैलिटी के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या नहीं? साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल बताते हैं कि इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियां अब इंटरनेट पर उपलब्‍ध कॉन्‍टेंट से कमाई के रास्‍ते तलाश रही हैं। यानी इंटरनेट पर आप जो देखते हैं, पढ़ते हैं और खरीदते हैं, उसमें भी इन्‍हें हिस्‍सा चाहिए। दूसरी तरफ वाट्स एप, वाइबर जैसी कंपनियां इंटरनेट के जरिए फ्री मैसेज और कॉल की सुविधा दे रही हैं, इन्हें भी टेलीकॉम कंपनियां बंद कराना चाहती हैं।

नेट न्यूट्रैलिटी के पैरोकारों का दावा है, नई तकनीक ने भारी- भरकम निवेश करने वाली इन टेलिकॉम कम्पनियाँ के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. स्काइप जैसी कम्पनियाँ इनके मुनाफे को कम करने में लगी है, वॉट्सऐप के मुफ्त ऐप ने एसएमएस सेवा को लगभग खत्म ही कर डाला है, इसलिए ऐसी सेवाओं के लिए ज्यादा रेट वसूलने की कोशिश की जारी है , जो उनके कारोबार और राजस्व को नुकसान पहुंचा रही हैं। यदि एयरटेल की जीरो योजना अस्तित्व में आती है तब निश्चित रूप से इंटरनेट के स्वरुप में व्यापक परिवर्तन आएगा। स्वस्थ प्रतियोगिता जाती रहेगी, बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा और भविष्य में नई और छोटी कंपनियों के अस्तित्व में आने के रास्ते बंद होंगे. बेशक खुली और तटस्थ इंटरनेट का कोई विकल्प नही.

यदि कंपनी के मकसद नेक हैं, तब भी कई सवाल हैं जिसके उत्तर देने होंगे-
  • देश के तमाम लोगों जो की इंटरनेट प्रयोग नहीं कर पा रहे थे, उन्हें इंटरनेट से जोड़ने और अभिव्यक्ति की आजादी का अहसास दिलाने के उद्देश्य वाली इस महत्वकांक्षी योजना की शुरुआत करने वाले एयरटेल ने योजना की घोषणा करने से पूर्व ही जनता तक यह बात  क्यों नहीं पहुंचाई?
  • अगर यह प्लान जनता के हित  में भी है तब क्या तब भी इस योजना के लागू होने के बाद इंटरनेट इस्तेमाल करना आम आदमी के लिए उतना ही आसान होगा? मसलन यदि हम किसी ब्लॉग पर जाएँ जो मुफ्त में उपलब्ध है और उस ब्लॉग में एक यू-ट्यूब वीडियो या किसी अन्य साइट का लिंक भी डाला गया है, जिसे देखने के लिए पैसे देने होंगे तब क्या आम इंसान के लिए असमंजस की स्थिति नहीं होगी?
  • आखिरकार एयरटेल का करार कंपनियों  के साथ किन शर्तों पर हुआ है, इसे और विस्तार से बताना होगा।  जैसे अगर यह टोल फ्री नंबर जैसी ही व्यवस्था है, तब इसके लिए कितनी कीमत चुकानी होगी? 
  • किसी स्टार्ट अप कंपनी के लिए इस योजना  में शामिल होना क्या आसान होगा ?  
  • अब सवाल यह भी है की क्या केवल टोल फ्री नंबर के वजह से ही घर घर तक मोबाइल पहुंचा है ? यदि सच में इंटरनेट से जुड़ने वाले लोगों की संख्या में इजाफा करना मकसद है, तब क्या इंटरनेट की दरों में कमी लाना ज्यादा  सरल उपाय नहीं है?
  • इस साल के अंत तक वेबसाइट को बंद कर केवल ऐप से ही बिक्री किये जाने की संभावना की फ्लिपकार्ट द्वारा आज की गयी घोषणा क्या मात्र संयोग है?
कुछ लोगों ने निस्वार्थ भाव से कड़ी मेहनत करके मानवता के कल्याण के उद्देश्य से इंटरनेट की आधारशिला रखी थी. महज कुछ निवेश कर, स्पेक्ट्रम खरीद लेने से इंटरनेट पर इन टेलीकॉम कंपनियों का अधिकार होना निराशाजनक है. अर्थव्यवस्था के अन्य निहायत जरूरी संसाधनों जैसे ही इंटरनेट जैसे मूल्यवान संसाधन का कुछ टेलीकॉम कंपनियों का संरक्षक बन जाना कहीं से उचित प्रतीत नहीं होता .

नेट न्यूट्रैलिटी पर विवाद कोई नई बात नहीं है. कई देशों में इस सम्बन्ध में कड़े कानून बनाये गए हैं. अमेरिका, चिली, नीदरलैंड और ब्राजील जैसे देश पहले ही ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ अपना चुके हैं, जबकि भारत में कोई कानून नहीं है। मुद्दे को समझने के लिए एक कमिटी का गठन किया जा चुका है जिसकी सिफारिशें मई महीने के दूसरे हफ्ते तक आनी है.  इतना तो तय है कि मेक इन इंडिया का नारा लगाने वाली वर्तमान सरकार को सोच समझ कर कदम उठाना होगा क्यूंकि यह हमारे और सबसे बढ़कर हमारे देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा सकता है.

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