Saturday, 27 January 2018

साउथ मुंबई की वाकिंग ट्रिप


 साउथ मुंबई की वाकिंग ट्रिप 

गेटवे ऑफ़ इंडिया, टाउन हॉल, टेलीग्राफ ऑफिस,सिद्धि विनायक मंदिर, राजाभाई क्लॉक टावर , मणि भवन, अगस्त क्रांति मैदान, हाजी अली दरगाह, माउंट मैरी चर्च, मरीन ड्राइव, फिल्मसिटी, ग्लोबल विपासना पगोडा आदि मुंबई में कई  ऐसी जगहें हैं, जिसे देखने भारी संख्या में लोग दूर -दूर से पहुंचते हैं.  पर, यहाँ के बाजारों की भीड़-भाड़, चहल -पहल और शोर-गुल को देखे बिना मुंबई को समझना मुश्किल है. बस, मुंबई के इस महत्वपूर्ण हिस्से को देखने की योजना हमने भी बना डाली और एक ट्रैवल एजेंसी की मदद से निकल पड़े उन गलियों और बाजारों को छानने। कई विकल्पों में से हमने क्रॉफर्ड मार्केट, झवेरी बाजार, मंगलदास मार्केट, फ्लॉवर्स मार्केट और पिंजरापोल गोशाला वाली वाकिंग ट्रिप का चुनाव किया। हाँ, २६ जनवरी  की वजह से काफी दुकानें बंद मिली और गाइड के कहेनुसार वह भीड़ नहीं दिखी जो अमूमन यहाँ रहती है. यह हमारे लिए राहत की बात भी थी और अफसोस की भी। उस नज़ारे को देखने से हम चूक गए जो यहाँ को खास बनाती है. बहरहाल, उस दिन की भीड़ देखकर अन्य सामान्य दिनों की व्यस्तता के बारे में अंदाजा लग गया! शादी और अन्य त्योहारों के वक्त की भीड़-भाड़ की कल्पनामात्र से ही घबराहट होने लगी! 

इस ट्रिप में हमारे साथ थीं, दो कनाडा से आई महिलायें और दो ऑस्ट्रेलियाई महिलायें। रीगल  सिनेमा के सामने से शुरू हुआ हमारा सफर. पहला पड़ाव, क्राफर्ड मार्किट तक हमें टैक्सी से ले जाया  गया. रास्ते में जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट और सी एस टी देखने को मिला।  गाइड ने हमें बताया कि वी टी स्टेशन, जिसका नाम बदलकर अब सी एस टी कर दिया गया है , के बाहर महारानी विक्टोरिया  की प्रतिमा स्थापित थी जिसे वापिस लंदन भेज दिया गया है जो अब वहां किसी संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है.

अब हम पहुंचे, क्रॉफर्ड मार्केट। विशेष रूप से फलों,सब्जियों, मांस-मछली, ड्राई फ्रूट, मसालों के होलसेल और रिटेल बाजार  के तौर पर जाने जाने वाले इस मार्केट में  प्लास्टिक के सामान, कपडे, खिलौनों की भी दुकानें  दिखीं। दुकानों के दिखाने के क्रम में गाइड ने बारगेन यानि मोलजोल करने की कला के बारे में हमें विस्तार से बताया☺.  क्रॉफर्ड मार्किट का नामकरण मुंबई शहर के पहले  म्युनिसिपल कमिश्नर 'आर्थर क्रॉफर्ड' के नाम पर किया गया था जिसे सन १९९५ में शिवसेना द्वारा नामों के बदलने के राज्यव्यापी अभियान के तहत महात्मा ज्योतिबा फूले  कर दिया गया है. हालांकि लोगों की जुबान पर अभी भी यही नाम चढ़ा है. कई बातें १८६९ में निर्मित क्राफर्ड मार्केट को विशेष बनाती है जैसे मार्केट में अवस्थित एक फाउंटेन जो प्रसिद्ध कलाकार जॉन लॉकवुड किपलिंग और  प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग  ( द  जंगल बुक के लेखक)के पिता द्वारा निर्मित है।  हालांकि, फाउंटेन बहुत अच्छी हालत में नहीं दिखा, जाहिर है इसके रख- रखाव पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया गया है. इसके अलावा यह जानकर भी हैरत हुई कि भारत में विद्युतीकरण के आगाज के लिए भी इसी बाजार को चुना गया था. जी हाँ, सन  १८८२ में भारत की यही इमारत सर्वप्रथम बिजली से रौशन हुई.

इसके बाद हमने रूख किया मंगलदास मार्केट यानि फैब्रिक मार्केट की तरफ. परन्तु छुट्टी की वजह से अधिकतर दुकानें  बंद मिली। कपड़ों की विभिन्न किस्मों की सस्ते दामों में उपलब्धता के लिए विख्यात यह बाज़ार लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है. हम तो चूक गए, फिर कभी..

हाँ , झवेरी बाज़ार की तरफ जाने वाली सड़क के दोनों तरफ बैठकर दूकान लगाने वाले विक्रेता ग्राहकों के साथ व्यस्त  दिखे. खरीदने वालों की भी अच्छी खासी भीड़ दिखी. गाइड ने बताया कि दुकानदारों की कमाई अच्छी -खासी है और ये टैक्स भी भरते हैं।  सब कुछ प्रशासन की मंजूरी से है, शायद मुंबई की इस अनूठी वाइब को कायम रख लेने की कवायद का हिस्सा है ये । मॉल की नयी नवेली संस्कृति को झूठलाती इस मार्किट की चहल पहल थोड़ी अचंभित ही करती है.

झवेरी बाजार हमारा अगला पड़ाव था. यह बाजार जैसा नाम से ही विदित है, सोने चांदी एवं हीरों  के आभूषणों के लिए मशहूर है.  इसके अलावा इमिटेशन जूलरी और रत्नों और कीमती पत्थरों की भी खरीददारी यहाँ से की जा सकती है.  इस बाजार की महत्ता इस आंकड़ें से मापी जा सकती है कि भारत में हो रहे सोने के कुल कारोबार के ६५ प्रतिशत कारोबार के लिए यहाँ अवस्थित सैंकड़ों दुकानें ही जिम्मेदार हैं.  हर कुछ अंतराल पर  हमें गुजराती समाज की व्यापार कुशलता  के बारे में गाइड के माध्यम से जानकारी मिलती रही☺ बात सही भी है, प्रत्यक्षं  किं प्रमाणम।

इसके बाद हमने जामा मस्जिद और मुम्बा आई मंदिर को बाहर से देखा. . सड़क के एक छोर पर मस्जिद और दूसरे छोर पर मंदिर भारत के सांप्रदायिक विविधता को दर्शाता दिखा. ब्रिटिश शासकों ने शहर के विस्तार के मद्देनजर  वी टी स्टेशन के पास से हटाकर मुम्बा आई मंदिर को झवेरी बाजार के पास पुनर्स्थापित किया.  मुंबई के मूल निवासी, कोली समाज की आराध्य देवी हैं, मुम्बा माता। मुंबई शहर का नामकरण भी इन्हीं देवी के नाम पर किया गया है. मंदिर में प्रतिदिन छह बार आरती होती है। मंगलवार के शुभ माने जाने के कारण श्रद्धालुुओं की काफी भीड़ रहती है. मन्नत माँगने के लिए लोग यहाँ रखे लकड़ी पर सिक्कों को कीलों से ठोंकते हैं.

फ्लावर्स मार्किट हमारा अगला पड़ाव था. यूँ कहिये एक पतली सी गली. दोनों तरफ फूलों  से सजे स्टॉल और  लकड़ी की तख्तों पर बैठकर माला गूंथते लोग दिखे. फूलों की कई किस्मों के अलावा पूजा में प्रयुक्त होने वाले अन्य सामानों को भी यहाँ से ख़रीदा जा सकता है यथा तुलसी, आम के पत्ते, दूब, उपले आदि. हालाँकि दादर का फ्लावर मार्केट मुंबई की सबसे बड़ी फ्लावर मंडी है। पर, सुबह के वक्त इस बाजार में भी काफी रौनक रहती है.
फूलों की गली होते हुए हम पहुंचे हमारे अंतिम पड़ाव पर, पिंजरापोाल  गौशाला। हिन्दू धर्म में, गोसेवा की महत्ता से  सभी परिचित हैं. सड़कों पर खुले में विचरती और कचरा खाती गायों से इतर अच्छी तरह से देखभाल पा रही इन गायों को देखना सुखद अहसास रहा. सभी ने बड़े प्यार से गायों को चारा खिलाया।  कुछ लोग कबूतरों को दाना खिलाते भी दिखे. यहाँ की ३५० गायों की देखभाल के लिए चंदा देनेवालों की कमी नहीं।

मुंबई के इस हिस्से को देखकर शहर के अलग रूप से वाकिफ होना अच्छी अनुभूति रही. महज २ घंटे का यह ट्रिप  इस महानगर से संबंधित कई ऐतिहासिक और वर्तमान के व्यापारिक गतिविधियों के बारे में ज्ञानवर्धन करने वाला  साबित हुआ. 

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