Friday, 23 March 2018

क्या पूरी होगी आस?


हर शाम लालटेन के शीशे को साफ़ करना, किरोसिन भरना और जलाकर निश्चित स्थान पर रखना, कभी २ दिन कभी ७ दिन या कभी कभी एक पखवाड़े और महीने तक बिजली का इंतज़ार करना, गर्मियों में बिस्तर पर लेटकर घूमने की आस के साथ पंखे को एकटक देखकर या टीवी पर आ रहे किसी फेवरिट कार्यक्रम के बीच में बिजली के गुल हो जाने के उपरांत मन-ही-मन १०८ दफा भगवान का नाम जपना और होली,दशहरा, दीवाली या छठ जैसे कुछ पर्वों को छोड़ साल के अन्य किसी दिन शाम के वक्त बल्ब जलने को किसी उत्सव से कम न सेलिब्रेट करना☺, ऐसी तमाम यादों से सराबोर मेरा मन इस महीने बिहार में गुजारे कुछ दिनों के दौरान वहां तक़रीबन हर रोज २० घंटे की बिजली आपूर्ति को देखकर आश्चर्यचकित हुए बिना न रहा. रही-सही कसर इन्वर्टर और बैटरी पूरी कर दे रहा है। 'हर घर बिजली- लगातार ' मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बिहार के विकास को ध्यान में रखकर किये गए सात निश्चयों में से एक निश्चय है, जिसके तहत बिहार के हरेक घर को बिजली से रोशन करने का वादा उन्होंने जनता से किया है. सौभाग्य योजना के तहत दी गयी जानकारी के मुताबिक बिहार में कुल 123.46 लाख ग्रामीण परिवार में से 58.76 लाख घरों में अबतक बिजली पहुंचाई जा सकी है जबकि 64 लाख से अधिक घर बिजली से अभी भी महरूम हैं. आशा है, नीतीश कुमार इस योजना के लक्ष्य को जल्द ही पूरा करेंगे। पटना से नालंदा जिले की तरफ जाते वक्त रास्ते के कुछ गाँवों में बिजली के खम्भे लगाने का काम होते देखकर तसल्ली हुई कि शायद अब बिहार 'लालटेन युग' से बाहर निकलने के रास्ते पर है!
भारत के अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में दौड़ती सडकों से तुलनीय सड़कें बिहार में देखकर मन में सवाल उठा कि वाकई जनता के 'अच्छे दिन' की शुरूआत तो नहीं है ये ? कई छोटे-छोटे गाँवों के सडकों के माध्यम से बड़े शहरों से जुड़ जाने से लोगों की जीवन -शैली बदली है, व्यापार -व्यवसाय बढे हैं, आने -जाने में लगने वाले समय में बचत ने लोगों के मानसिक स्तर पर प्रभाव डाला है. सडकों पर वाहन रोककर किये जाने वाले लूट-खसोट में भारी कमी आयी है. अगर आंकड़ों की तरफ न भी झांके तब कईयों का काम निपटाकर देर रात तक बिना परवाह किये घर लौटने की हिम्मत करना इस तथ्य की पुष्टि करता है. गुजरे वो दिन जब शाम होने तक घर तक किसी अपने या परिचित के न पहुँचने की खबर पाकर दिल की धड़कनें बढ़ जाया करती थी और तब तक सामान्य न होती जब तक सकुशल पहुँचने की खबर कानों में न पड़ती थी. उस डर और दहशत से छुटकारा जनता के लिए एक बहुत बड़ी राहत कही जाएगी. पर आगे भी, एक चुस्त -दुरुस्त सुरक्षा -व्यवस्था के साथ सरकार को चौकस रहना होगा ताकि वापिस जनता के शांति के साथ जीने के अधिकार में कोई सेंध न लगा सके.

होली बिहार में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है. समय में बदलाव के साथ अब त्योहारों की रौनक पहले जैसी नहीं होती। रंग खेलने से लेकर, पूरी-पुए, दही-बड़े, फ्राइड नमकीन खाने में भी लोग सावधानी बरतते हैं. हाँ, बच्चे हाथ में पिचकारी लिए सुबह से ही रंग-बिरंगी पिचकारी हाथ में लेकर एक -दूसरे पर रंग डालने को आतुर दिखे। पर, एक बड़ा अंतर कुछ बड़ों की होली में साफ़ दिखा। शराब के नशे में धुत लोगों का जत्था गाँव का चक्कर लगाते नहीं दिखा, दूकान की शटर गिराकर ४-५ लोगों के झुण्ड का देशी-विदेशी शराबों के साथ पार्टी करने की भी खबर या शराब के नशे में बेसुध इधर -उधर पटकाये लोगों को घर तक पहुंचाने जैसी खबरें भी अब होली का हिस्सा नहीं बनीं । कुछ मनचले लड़कों की जमात का शराब पीकर तेज गति से गाडी या बाइक चलाने और तत्पश्चात छोटी- बड़ी दुर्घटना की खबर का कानों में न पड़ना शराबबंदी कानून का सख्ती से लागू होने को प्रमाणित करता दिखा. 'शराबबंदी ' कानून के पक्ष और विपक्ष के अपने तर्क हैं, पर इस कानून ने होली और शराब की जुगलबंदी के मिथक को तोड़ने का काम किया है.

पटना में मुख्य सडकों के चारों तरफ कोचिंग क्लासेज की शत प्रतिशत सफलता की गारंटी देते बड़े- बड़े बोर्ड और पोस्टर्स और राजनीतिक दलों के आत्मप्रशंसा जैसे विज्ञापनों के अलावा सामाजिक मुद्दों के प्रति आम जनों के बीच जागरूकता फैलाते पोस्टर्स भी काफी संख्या में दिखे। कोई शिक्षा और स्वच्छता के महत्त्व को बता रहा था तो कोई बाल विवाह और दहेज़ प्रथा की बुराइयों को, कुछ लड़कियों को पढ़ाने के महत्व को. बालिका साईकिल योजना, मुख्यमंत्री पोशाक योजना और प्रोत्साहन योजना, नशाबंदी जैसे प्रावधान और गत २१ जनवरी को दहेज़ और बाल विवाह के विरोध में मानव श्रृंखला का आयोजन, सरकार का विकास के साथ सामाजिक मुद्दों पर भी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे न्याय यात्रा, विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा, प्रवास यात्रा, सेवा यात्रा, संकल्प यात्रा के तहत राज्य के लोगों की शिकायतें सुन चुके हैं और एक बार फिर निश्चय यात्रा की घोषणा कर सात निश्चय से सम्बंधित प्रगति की समीक्षा और जनता की शिकायतों के निपटारे का प्रयास करनेवाले हैं.

यक़ीनन नीतीश कुमार की अगुवाई में सरकार ने विकास की दिशा में सराहनीय कदम उठाये हैं. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद बेशक कुछ परिवर्तन हुए हैं। अब बिहार उपहास का विषय कम, बाकी दुनिया के लिए सुधारों के मद्देनजर कौतूहल का विषय ज्यादा बन गया है. नजरें नीतीश कुमार पर टिकी है. उम्मीदें बहुत हैं, काम भी बहुत करने हैं, सड़क, बिजली से लेकर उद्योग-धंधे लगाकर रोजगार के नए अवसर प्रदान करना, कृषि के विकास की तरफ ध्यान, भू-पुनर्विभाजन, शिक्षा और चिकित्सा के स्तर में सुधार जैसे कई वादे हैं, जिन्हें जल्द -से- जल्द पूरा करने की जिम्मेवारी नीतीश कुमार के कंधे पर है. आजादी मिलने के सत्तर साल बाद भी ३८ में से १७ जिलों में हर १ लाख लोगों पर अधिकतम ३ चिकित्सक का होना WHO द्वारा निर्धारित १:१००० के मापदंड के हिसाब से अत्यंत शर्मनाक है . शिेक्षा के क्षेत्र की भी हालत दयनीय है, विद्यार्थी और शिक्षक का अनुपात जहाँ प्राथमिक शिक्षा में ३०:१ तथा उच्च प्राथमिक वर्ग में ३५:१ निश्चित की गयी है, वहीँ बिहार में क्रमशः यह अनुपात ४३:१ और ९६:१ है.

हालांकि विकास की गति को लेकर जनता खुश नहीं दिखती। शुरूआती वर्षों में जिस तेजी से प्रगति को महसूस किया गया, वह अब नदारद है. आम जनता की तकलीफों और चिंताओं से इतर महज अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने एवं राजनीतिक दलों के वर्ग और जाति जैसे फालतू मुद्दों में उलझ कर विकास और प्रगति को दरकिनार करने का डर बिहार की जनता के जेहन में है.

राजगीर स्थित शांति स्तूप के दर्शन को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से लगाए गए रोपवे सेवा का संचालन को संभालते कर्मचारियों द्वारा एक युवती को निर्धारित रास्ते से पंक्ति में आने के निर्देश दिए जाने के बाद उस महिला का बेवजह उनसे वाद-विवाद करते देख मन विचलित हुआ। जरूरत है, हमें खुद को सुधारने की. जब हम सुधरेंगे, तब बिहार सुधरेगा।

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