Monday, 16 April 2018

शिक्षा और परीक्षा

अरसे से शिक्षा के क्षेत्र में कोई अच्छी खबर के इंतज़ार कर रहे कानों में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं से पूर्व प्रश्न पत्र लीक की खबर पड़ना अत्यंत निराशाजनक है। स्कूल की क्लासेस,एक्स्ट्रा क्लासेज, ट्यूशन, क्रैश कोर्स, अपनी इच्छाओं की कुर्बानी देकर दिन -रात एक कर परीक्षा की तैयारी में जुटे रहना  और फिर परीक्षा के रद्द होने की खबर मिलने के बाद छात्र -छात्राओं की 'काटो तो खून नहीं ' जैसी हालत होना स्वाभाविक है। व्यवस्था की विफलता से सीबीएसई बोर्ड की साख पर कई सवाल तो खड़े हो ही रहे हैं, साथ ही वर्तमान परीक्षा-व्यवस्था भी पुनः कठघरे में है. आये दिन उत्तर पुस्तिकाओं के बीच चिपके  १०,२० या ५० रुपये के नोट को लेकर शिक्षकों द्वारा बच्चों के परीक्षा के अंक बढ़ा कर मदद कर देना या बिना पूरी उत्तरपुस्तिका को पढ़े अंदाजन अंक बिठा देने के कारनामे  अथवा सिफारिश, कुछ पैसों के लालच में अथवा जान-पहचान के नाम पर अंक बढ़ा देने की मेहरबानियों की खबरों से लेकर सारे नियम- कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए परीक्षा-केंद्रों पर  धड़ल्ले से होती नक़ल, पर्चों का परीक्षा के पूर्व ही लोगों के हाथों में हाजिर होने जैसी घटनाएँ योग्यता मापने के इस तरीके पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता जताती है. इन घटनाओं पर नकेल कसने की सरकार द्वारा की गयी तमाम कोशिशें भी इन्हे पूरी तरह रोकने में असफल ही साबित हो रही हैं. ऐसे में, सीबीएसई के वरिष्ठ अधिकारी का शिक्षा के क्षेत्र में माफियाओं की जड़े कोल माइनिंग इंडस्ट्री से भी ज्यादा गहरी होने की बात स्वीकारना सरकार द्वारा भविष्य में ऐसी घटनाओं के घटित न होने के आश्वासन पर क्या विश्वास किया जा सकता है? संभव है, हालिया घटित प्रश्नपत्र के लीक का मामला सुलझ भी गया हो, संलिप्त अपराधी पकड़े भी गए हों, पर क्या  भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगा पाना संभव है, जबकि परीक्षा के संचालन का जिम्मा संभाले लोग ही ऐसे कदाचारों में शामिल पाए जाते हैं? 


अब सबसे अहम् सवाल यह है कि क्या वजहें होती हैं, परीक्षा में नक़ल की, प्रश्न पत्र के लीक की ?जाहिर सी बात है, विषय को सीखकर उससे संतुष्टि पाने से ज्यादा परीक्षा में सफल होने और अधिक -से -अधिक अंक हासिल करने की अभिलाषा ही इसके कारण हैं. कागज़ पर लिखे नंबर ही बाकियों से श्रेष्ठ अथवा कमतर समझे जाने  के प्रमाणपत्र बन गए हैं. माता-पिता की ऊँची उम्मीदों पर खरा उतरने का दवाब और साथ ही विद्यालय की साख  जैसे भी कुछ अन्य कारण हैं, जिसके परिणामस्वरूप येन केन प्रकारेण अच्छे नंबर लाने केलिए विद्यार्थी किसी भी हद तक जाने को तैयार होते हैं, चाहे रास्ता अनैतिक और गैरकानूनी ही क्यों न हो.
विडम्बना यह है कि सजा वो भुगतते हैं जो इस व्यवस्था में भागीदार नहीं हो पाते. कम अंक मिलने की स्थिति में, एक-एक अंक से अपने मनपसंद विषयों के न मिलने या कॉलेजों में प्रवेश की जद्दोजहद में बच्चे मानसिक अवसाद के शिकार होते हैं और कभी -कभी आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने पर मजबूर. छोटी उम्र में मात्र एक परीक्षा में मिले अंक का भविष्य का आधार मान लेना क्या हमारी मूर्खता नहीं है? जबकि, ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है जिसमें शुरूआती असफलता के बावजूद लोगों ने जीवन में कामयाबी पाई है, एक मुकाम हासिल किया है. सीखने-सिखाने पर आधारित व्यवस्था से कोसों दूर नंबर की होड़, शिक्षण संस्थानों के झूठे आडम्बर और गलाकांट प्रतिस्पर्धा ही शिक्षा की आधुनिक परिभाषा बन गयी है और भारतीय शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे 'भारतीय परीक्षा व्यवस्था' में तब्दील हो गयी है और साथ में शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट देखी जा रही है, शिक्षा का स्तर बद से बदतर होता जा रहा है।

परीक्षा के दौरान तनावमुक्त और प्रसन्न रहने की जरूरत पर हाल ही में देश के प्रधानमंत्री का बच्चों के साथ संवाद एक अच्छा प्रयास है पर क्या यह ज्यादा उचित न होगा कि हम समस्या की जड़ को समझें और वहीँ से व्यवस्था में सुधार की कोशिश करें. ज्यादा से ज्यादा अंक अर्जित करने की प्रेरणा देने वाली शिक्षा से इतर एक ऐसी प्रणाली के बारे में सोचा जाए जो बच्चों में सीखने की ललक को ताउम्र बरक़रार रख सके. एक अदद नौकरी प्राप्ति की लालसा  पाले एक इंसान की जगह आत्मविश्वास से लबरेज, अपने बलबूते कुछ हासिल करने का हौसला रखने वाला, उद्यमी, चरित्रवान एवं जागरूक व्यक्ति का निर्माण कर सकने में सक्षम हो .
शिक्षण के तरीकों में सुधार, अच्छे शिक्षकों की बहाली और साथ में परीक्षा के तरीकों पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है. सीबीएसई बोर्ड द्वारा बच्चों के मूल्याङ्कन की दृष्टि से शुरू किये गए 'सतत एवं व्यापक मूल्यांकन' (continuous and comprehensive evaluation )पद्धति पर पुनर्विचार कर इस तरह से लागू किये जाने  की जरूरत है जिससे इसके वास्तविक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके. हरेक बच्चे को उसकी गति और क्षमता के हिसाब से ही प्रशिक्षित किये जाने की बात हो या बच्चे की परीक्षा तभी ली जाए जब बच्चा तैयार हो या फिर विद्यालय के भयमुक्त वातावरण की निर्माण की बात हो, जैसे कई उद्देश्यों वाली इस मूल्यांकन पद्धति को  सफलतापूर्वक लागू कर शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाने की परीक्षा अब हमारी है.





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