Thursday, 2 April 2020

कोरोना, लॉकडाउन और हम



अचानक से घोषित हुए लॉकडाउन की वजह से कई लोगों को महीने के अंत में मिलने वाले भुगतान को भी ले पाने का समय नहीं मिल पाया। मोहम्मद मेरे घर में नारियल पानी रोज़ाना पहुंचाता है, महीने के अंत में पेमेंट ले जाता है। २-३ दिन पहले उसका फ़ोन आया मैडम नीचे आपके गेट पर खड़ा हूँ, आप इस महीने का पेमेंट कर दीजिये। ठीक है, मैं नीचे आती हूँ। नीचे आकर पैसे दूर से थमाते हुए मैंने कहा, लॉकडाउन खत्म होते ही आप नारियल देना शुरू कर सकते हैं। उसका जवाब था, ये खत्म होगा तो पहले १० दिन के लिए गांव जाऊँगा। अभी नहीं जा पाया, सब बंद हो गया है। क्यों जायेंगे गाँव? अभी तो जाकर आये थे कुछ दिन पहले, मैंने कहा। उसका जवाब था, माँ -पापा वीडियो कॉल करता है, बहुत रोता है, कहता है यहाँ आ जाओ, जो होगा यहीं साथ में होगा।
मैंने पूछा, कुछ हुआ आपको यहाँ, आपके माँ -पापा भी ठीक है, घर में रहिये कुछ नहीं होगा। उसने भी कहा, हाँ बस टॉयलेट के लिए निकालता हूँ, बाकी समय अपने कमरे में ही रहता हूँ। वह तो पैसे लेकर चला गया और मेरे सामने ट्रेन स्टेशनों पर लोगों की लम्बी कतारों, बसों की छतों पर लदकर जान हथेली पर लेकर , मिल्क और आयल टैंकर के अंदर किसी तरह छिपकर या फिर धूप में पैदल चलते अपने परिवारों के साथ इस मुश्किल समय में किसी तरह अपने गाँव पहुँचाने को आतुर लोगों की तस्वीरें उभरने लगी। भूखमरी के अलावा कईअन्य कारण रहे लोगों के मन में लॉकडाउन के बीच में अपने गाँव जल्द से जल्द पहुँच पाने के निर्णय लेने के पीछे। हालांकि सरकार ने लॉकडाउन की सफलता के मद्देनजर इस समस्या पर तुरंत कार्यवाही की और लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई।
सवाल है कि क्या हमें इसका अंदाजा न था? पर क्या कोई अन्य उपाय था सख्ती से अपनाये गए लॉकडाउन के अलावा ? यह सत्य है कि इस आकस्मिक आई आपदा को लेकर कोई भी देश तैयार न था, हालांकि देशों द्वारा कई वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों की चेतावनियों का नजरअंदाज किये जाने से भी इंकार नहीं किया जा सकता है है. उदाहरण के तौर पर बिल गेट्स द्वारा दिया गया TED टॉक, जिसमें यही मुद्दा उठाया गया था।खैर, कोरोना वायरस चीन से निकलकर दुनिया के अधिकतर देशों में फैल चुका है. अमेरिका,स्पेन, इटली, यूके, फ्रांस, जर्मनी जैसे अतिविकसित स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देश भी संक्रमण रोक पाने और संक्रमित लोगों को बचा पाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे हैं।
आइये, देखते हैं इस महामारी पर काबू पाने के लिए देशों द्वारा किन रणनीतियों पर विचार किया गया। पहला मॉडल है, डू नथिंग। दूसरे को मिटिगेशन और तीसरे मॉडल को सप्रेशन यानि दमन विधि कहते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है डू नथिंग का मतलब है, आम जन को कुछ एहतियात बरतने के दिशानिर्देशों के अलावा कोई खास सख्त कदम न उठाना। जहाँ 'हर्ड इम्युनिटी' का तर्क इससे जुड़ा है अर्थात जनसंख्या के एक निश्चित अनुपात के संक्रमण के पश्चात वायरस संक्रमण फैलाने में विफल होंगे और इस तरह से हम वायरस के ऊपर अपनी जीत हासिल करेंगे वहीँ ज्यादा मात्रा में संक्रमण फैलने से स्वास्थ्य-सुविधाओं पर पड़ने वाला बोझ या फिर वायरस के म्यूटेशन की अवधारणा की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। साथ ही,कोलैटरल डैमेज भी इस मॉडल का एक नकारात्मक पक्ष है.अस्पतालों में भीड़ और चिकित्सकों की कमी की वजह से कोरोना वायरस से संक्रमण के अलावा अन्य रोगों से पीड़ित मरीजों की हालत बिगड़ने की संभावना . साथ ही, इस वायरस में म्यूटेशन अन्य इन्फ्लुएंजा वायरसों की तुलना में कम देखा जा रहा है, परन्तु नगण्य नहीं। इस तरह से इम्युनिटी को लेकर निश्चिन्त होना बेवकूफी भी साबित हो सकती है। एक बार संक्रमित हुए लोगों के पुनः इसी वायरस के नए स्ट्रेन से बीमार हुए जाने को नकारा नहीं जा सकता। शुरुआत में अपनाई गयी इस रणनीति के बुरे परिणामों की वजह से कुछ देशों को दूसरी रणनीति पर विचार करने पर मजबूर किया. संक्षेप में, अनियंत्रित कोरोना वायरस का एकमात्र अर्थ महसूस किया गया, स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरी तरीके से ढह जाना और बढ़ी मृत्यु- दर ।
अगली दोनों रणनीतियों का मकसद है, मृत्यु दर को कम- से -कम रख पाना।
मिटिगेशन के अंतर्गत यह माना जाता है कि हालांकि वायरस को फैलने से रोकना संभव नहीं है, परन्तु कुछ तरीकों से संक्रमण के सबसे ऊँचे स्तर तक पहुँचने से रोका जा सकता है ताकि हेल्थ केयर सिस्टम इसे बेहतर तरह से निपटने में कामयाब हो. रास्ता है, सोशल डिस्टन्सिंग को लेकर थोड़े सख्त कदम उठाये जाएँ।
तीसरी विधि है, सप्रेशन यानि दमन विधि।
इसका ध्येय कई कठोर कदम उठाकर महामारी को पूरे तरीके से नियंत्रण में ले लेना है। तत्पश्चात, धीरे धीरे सबकुछ सामान्य करने की प्रक्रिया शुरू की जाती है, एक -एक करके।
इससे मृत्यु- दर को बढ़ने से रोका जा सकना संभव हो सकता है। लोगों के बाहर न निकलने से संक्रमण तेजी से नहीं फैलता, स्वस्थ्य सुविधाओं पर एकाएक बोझ नहीं पड़ता जिससे ज्यादा- से -ज्यादा लोगों की जान बचाना संभव है।
हेवी सोशल डिस्टेंसिंग का आदेश, जो हम भारत में देख रहे हैं, इसी रणनीति का हिस्सा है। कुछ अति जरूरी सुविधाओं को छोड़कर सब कुछ बंद करने का निर्णय! स्कूल-कॉलेज, दफ्तर बंद, जहाँ संभव है वर्क फ्रॉम होम की सुविधा देने का आग्रह, किसी से अनावश्यक मिलने -जुलने पर पाबंदी, सब्जियों-फलों और अनाजों के मिलने के निर्धारित समय तय कर दिया जाना आदि।

हमारे देश की स्वस्थ्य सुविधाओं की हालत किसी से छिपी नहीं है, इतने बड़े देश में महज ३५००० के करीब सरकारी अस्पताल, डॉक्टर एवं अन्य मेडिकल स्टाफों की कमी , उँगलियों पर गिने जाने वाले ICUs और वेंटिलेटर इत्यादि सामान्य दिनों में ही हमारी जरूरतों को पूरा कर पाने में अक्षम हैं तो इस महामारी के फैलने और इन सुविधाओं की बदौलत हम यह लड़ाई कैसे जीत पाएंगे? ऐसी दशा में, सरकार द्वारा लॉकडाउन किये जाने का निर्णय सोच समझकर उठाया गया कदम है।
कुछ दिनों की मिली मोहलत भी हमें कई जानें बचाने में मददगार साबित हो सकती है. जहाँ एक तरफ लॉकडाउन से संक्रमित लोगों की संख्या के कम रहने की उम्मीद है वहीँ लोगों को इस बीमारी को लेकर जागरूक बनाया जाना संभव है. अस्पतालों में जरूरी सामानों मसलन मास्क, PPE s (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट), ECMO s ब्लड ऑक्सीजन मशीन और वेंटीलेटर्स जुगाड़ किया जा सकना संभव होगा। इस बीच स्वेच्छा से इस आपदा को निपटने को तैयार को तैयार वालंटियर्स को प्रशिक्षण देकर महामारी पर काबू पाने सकने में भी उनका योगदान लिया जा सकता है। इस समस्या की बेहतर समझ हासिल की जा सकती है, उठाये गए कदमों और उससे होने लाभों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता और उसकी सीख लेकर भविष्य की रणनीतियां तय की जा सकती है। वायरस के बारे में दुनिया भर में रिसर्च किये जा रहे हैं, हर दिन हमें एक नयी जानकारी हासिल हो रही है, उससे भी इस विषाणु के बारे में हमारी समझ बढ़ेगी, वैक्सीन निकला जाने की भी आशा है. टेस्ट करने के तरीकों में बदलाव हो रहे हैं मसलन बाइनरी सर्च तकनीक अपनाकर ज्यादा से ज्यादा लोगों समय में किया जा सकने में सफल हो सकतेहैं. तब तक हमें इस महामारी को नियंत्रण में रखना है. क्या यह उचित होगा कि डू नथिंग अथवा मिटिगेशन स्ट्रेटेजी अपनाकर लाखों लोगों को मरने दें?
निश्चित रूप से सप्रेशन स्ट्रेटेजी के फायदे हैं, पर सवाल है कि कब तक? क्या कीमत चुकानी पड़ेगी?
सोशल डिस्टेंसिंग के क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? क्या लोग लम्बे समय तक इसे स्वीकार कर पाएंगे?अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा? क्या इस विधि से समस्या का समाधान पूर्णतः संभव है? क्या समस्या को बस हम थोड़ा स्थगित तो नहीं कर रहे? क्या ऐसा संभव है कि एक बार सख्त कदमों को हटाए जाने के उपरांत
पुनः समस्या हमारे सामने होगी और लाखों लोग संक्रमण का शिकार होंगे?
समस्या बहुत कठिन है । बेशक हमें जितना अधिक समय मिलेगा हम इस समस्या के साथ मुकाबला करने में उतने ही अच्छे से तैयार हो सकेंगे। लॉकडाउन के बाद निर्णय लिया जा सकेगा कि किन जगहों पर आक्रामक कदम उठाये जाएँ और कहाँ लॉकडाउन में ढीलापन लाया जा सकता है?

संक्रमण फैलाने की दर को कम से कम रखे जाने की दिशा में ज्यादा -से- ज्यादा लोगों को टेस्ट करना और ट्रेसिंग ऑपरेशन मतलब संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आये लोगों को क्वारन्टिन किया जाना अत्यंत आवश्यक है।

चीन में बीमारी के फैलने के ३-४ महीने बाद धीरे -धीरे जिंदगी के पटरी पर आने, वैज्ञानिकों द्वारा वैक्सीन बना पाने के करीब पहुँचने की खबरों के साथ साथ हर दिन दुनिया भर में और अधिक लोगों के संक्रमित होने, मरने की नकारात्मक खबरें भी हैं. जरूरत है, हम इस लॉकडाउन को सफल बनाने में सरकार का सहयोग करें। कुछ बातों जैसे खांसते और छींकते वक्त टिश्यू का इस्तेमाल, बिना हाथ धोये अपने नाक और मुँह को न छूना, किसी से भी हाथ न मिलाना, या फिर संक्रमित व्यक्ति और साथ- साथ ज्यादा लोगों के संपर्क में आने से बचना, पर्सनल हाइजीन के अलावा पर्यावरण को भी स्वच्छ रखने की दिशा में कदम उठाना आदि का ख्याल रखें।

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