Saturday, 3 November 2018

डिकॉय इफ़ेक्ट :क्या आपका निर्णय 'आपका' है ?



अगर आपने हाल ही में कुछ ख़रीदा है जैसे टीवी, फ्रीज़, ओवन, फ़ोन, पेन ड्राइव  या फिर किसी समाचार पत्र अथवा मैगज़ीन की सदस्यता ? खूब रिसर्च कर, जांच परख कर, कहें तो ठोक बजाकर अपने निर्णय  भले किया हो पर पर जरा सम्भलिये, क्या आपके द्वारा लिया गया निर्णय वाकई आप ही का है ? यह क्या सवाल है? पुनः सवाल को दुहरा देती हूँ. क्या सच में आपका निर्णय आपका ही है ? झटका लगा न ?
कहीं आप 'डिकॉय एफेक्ट ' के चक्कर में तो न पड़  गए ? ये क्या है? इसे एसिमेट्रिक डोमिनेन्स इफ़ेक्ट भी कहा जाता है, ऐसी तकनीक जिसे  उत्पाद कंपनियों द्वारा किसी विशेष सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। और मजेदार बात ये कि इसके चक्कर में हम पड भी जाते हैं और  हमें तनिक अहसास भी नहीं होता है। ख़ास बात यह कि, यह महज सामानों से ही नहीं जुड़ा है, वरन हमारे द्वारा लिए गए जीवन के कई छोटे-बड़े निर्णयों  से जुड़ा मुद्दा है. मसलन आप किसे पसंद करते हैं, किसे वोट देते हैं, किस रेस्तराँ में खाना खाने जा रहे हैं या पॉपकॉर्न का कितना बड़ा डब्बा खरीद रहे हैं इत्यादि.


एक साधारण से परीक्षण पर नजर डालते हैं जिसके केंद्र में है, स्लाइम मोल्ड, एक तरह का बैक्टीरिया ,एक रोचक और अत्यंत सूक्ष्म जीव। थोड़ा और जानकारी के लिए बता दें, यह एककोशिकीय जीव होता है और कई बार अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर कई हजार ऐसे जीव संगठित होकर प्लाज्मोडियम का निर्माण करते हैं जिसे हम आसानी से देख भी सकते है. इन नन्हे जीवों के बारे में एक मजेदार बात यह है कि अन्य जीवों की तरह ये भी निर्णय लेने में सक्षम हैं. सुनकर भले ही अविश्वसनीय लगे पर इन दिमागविहीन जीवों द्वारा लिए गए निर्णय साधारण नहीं वरन सोचे -समझे भी होते है. हाँ, इनकी दुनिया सीमित है, तो निसंदेह निर्णय लेने की भी सीमा है,  जैसे उनकी तरफ जाय जो हमें पसंद है मसलन भोजन और उन वस्तुओं से दूरी बनाये जाए जो हमें नापसंद है यथा प्रकाश। अब बात परीक्षण की:
एक पेट्री डिश लेकर उसके एक तरफ ५ ग्राम कुछ खाद्य पदार्थ या भोजन रखते है और साथ में उस क्षेत्र को प्रकाशित कर देते हैं और उसी पेट्री डिश की दूसरी तरफ थोड़ा कम भोजन की मात्रा ३ग्राम रखते हैं जहाँ अँधेरा है. अब पेट्री डिश के बींचो- बीच स्लाइम मोल्ड के समूह को रख देते हैं। स्पष्ट है, स्लाइम मोल्ड के पास दो विकल्प हैं, एक जहाँ भोजन की मात्रा अधिक है पर जहाँ रौशनी है और दूसरा, खाना काम है मगर जहाँ अँधेरा है. निर्णय मुश्किल है. अब प्रश्न है, स्लाइम मोल्ड पेट्री डिश के किस तरफ आकर्षित होंगे? परीक्षण में देखा गया कि दोनों विकल्पों को  ५०-५० % समय तरजीह दी गयी. यानी आधे समय ३-डार्क की तरफ और आधे समय ५-लाइट की तरफ स्लाइम मोल्ड जाते दिखे.  है न आश्चर्यजनक !

अब  इस परीक्षण को थोड़ा और रोचक बनाते हैं, पेट्री डिश में अब एक अँधेरे क्षेत्र में १ग्राम  भोजन रख कर तीसरा विकल्प जोड़ देते हैं.  स्लाइम मोल्ड अब क्या निर्णय लेंगे? कह सकते हैं, इस तीसरे विकल्प का तो स्लाइम मोल्ड द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिये और निर्णय में कोई फर्क नहीं आना चाहिए। पर क्या ऐसा है? नहीं, परीक्षण में देखा गया कि निरर्थक से लगने वाले इस  विकल्प के यहाँ जोड़ देने से स्लाइम मोल्ड पहले विकल्प (५ लाइट) की जगह  दूसरे विकल्प  (३ डार्क) को ज्यादा तरजीह देने लगते हैं. जहाँ दोनों विकल्प  पहली स्थिति में एक समान तरज़ीह पा रहे थे वहीँ दूसरी स्थिति मतलब तीसरे विकल्प जोड़ देने के बाद, दूसरे विकल्प की तरफ तीन गुना ज्यादा दफा स्लाइम मोल्ड आकर्षित हुए. इसका मतलब क्या कि बिलकुल बेतुके से दिखने वाले किसी विकल्प को जोड़कर स्लाइम मोल्ड द्वारा लिए गए निर्णय को अपने हिसाब से तोडा मरोड़ा जा सकता है? जी हाँ, ऐसा संभव है. और हाँ, नीलकण्ठों, मधुमक्खियों और हम्मिंगबर्ड्स के साथ किये गए परीक्षणों में भी यही पाया गया.

अब आई बात समझ में! तो क्या, इंसानों द्वारा लिए गए निर्णयों को भी किसी एक विशेष विकल्प की तरफ मोड़ा जा सकता है? जी हाँ, हम इंसान भी ऐसे ही विकल्पों के चक्कर में फँसकर कई बार ऐसे ही विवेकहीन निर्णय लेने पर मजबूर किये जाते हैं. इसे एसिमेट्रिक डोमिनेन्स इफ़ेक्ट या डिकॉय इफ़ेक्ट की संज्ञा दी जाती है.

डिकॉय इफ़ेक्ट को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. हम सब सामान्यतः चीजों को कैसे पसंद करते हैं, उपलब्ध विकल्पों से तुलना करके, विकल्पों को एक दूसरे के साथ नापजोख कर और यहीं हम इसके चपेट में आ जाते हैं. एक ऐसे विकल्प का निर्माण कंपनियों द्वारा पेश किया जाता है जो कि तुलनात्मक रूप से तीनों विकल्पों से निम्नतम श्रेणी का है पर किसी एक विकल्प को किसी पैमाने पर अपने से श्रेष्ठ बना देने में सक्षम। यहीं मानव मस्तिष्क गच्चा खा जाता है और तुच्छ होते हुए भी वह विकल्प हमारे निर्णय को किसी एक विशेष विकल्प तक झुकाने में कामयाब हो जाता है.


डैन एरियल की किताब प्रेडिक्टेबली इरेशनल में दिए गए उदाहरण के द्वारा कोशिश करते हैं. कल्पना करिये, द इकोनॉमिस्ट पत्रिका की वार्षिक सदस्यता लेने के लिए ग्राहकों को दो विकल्प दिए गए हैं-


• केवल डिजिटल संस्करण $59 के भुगतान पर

• केवल प्रिंट संस्करण $125 के भुगतान पर


अपनी जरूरतों और पसंद के आधार पर ग्राहक इनमे से कोई भी विकल्प को चुनने के लिए स्वतंत्र है. जब लेखक ने अपने विद्यार्थियों को इनमे से एक विकल्प को चुनने को कहा तब ६८% विद्यार्थियों ने पहले विकल्प को चुना और ३२ % ने दूसरे विकल्प को. मतलब पहला विकल्प ज्यादा लोकप्रिय पाया गया.


अब इस परीक्षण में पत्रिका द्वारा शामिल किये गए तीसरे विकल्प को जोड़ दिया तब विद्यार्थियों को तीन विकल्प मिले:

• केवल डिजिटल संस्करण $59 के भुगतान पर

• केवल प्रिंट संस्करण $125 के भुगतान पर

• प्रिंट और डिजिटल संस्करण $125 के भुगतान पर


अब चीजें कैसे बदली, देखते हैं. जहाँ ६८ % लोगों ने पहले विकल्प को चुना था, अब उनकी संख्या घटकर १६ % रह गयी, दूसरे विकल्प को किसी ने पूछा तक नहीं और ८४ % लोगों ने तीसरे विकल्प में अपनी दिलचस्पी दिखाई. हमारे दिमाग ने उसे यूँ समझा, हालाँकि पहले दो विकल्प एक ही तरह से एक दूसरे से बढ़िया हैं और जो तीसरा कॉम्बो डील है, एक तो वह दोनों अन्य विकल्पों की तुलना में बढ़िया है वहीँ दूसरे विकल्प जितने ही दाम में उपलब्ध है यानी अन्य दोनों विकल्पों से बेहतर है. क्या इस निर्णय को वाकई बढ़िया निर्णय कहा जा सकता है?


अब निम्न दो उत्पादों पर नजर डालते हैं:

A) Hard Drive with 500 GB for $150.

B) Hard Drive with 300 GB for $100.

अगर आपको ज्यादा हार्ड ड्राइव स्पेस चाहिए तो पहले को खरीद सकते हैं और यदि आप ज्यादा पैसा नहीं लगाना चाहते तब दूसरे को. अब अगर यहाँ एक तीसरा विकल्प लाया जाय जो ऐसा है

C) Hard Drive with 400 GB for $170.

तब आप क्या करेंगे? देखा जाता है की ऐसी स्थिति में ऑपशन A चुनने वालों की संख्या में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हो जाती है. चलिए अगर कंपनी को विकल्प B की तरफ लोगों को आकर्षित करवाना है तो क्या कोई एक विकल्प और ढूँढा जा सकता है? सोचिये !


आइंदा अगर कोई सामान खरीदते वक्त प्रदत्त विकल्पों में से कोई एक विकल्प आपको हास्यास्पद लगे तो सावधान हो जाइये, हो सकता है उत्पादक मूर्खतावश ऐसा न कर रहे हों. ज्यादा संभावना है कि वह हमारे 'साइकोलॉजिकल बग ' का फायदा उठाकर अपने विशेष सामान की बिक्री बढ़ा रहे हों.


कई गणितज्ञों ने इस अवधारणा को बोरडा काउंट पद्धति से विकल्पों को पसंद के आधार पर अंक आबंटित कर समझाने की कोशिश की है. स्लाइम मोल्ड के परीक्षण को इस तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. मान लेते हैं, जो विकल्प पसंद के क्रम में सबसे ऊपर है उसे २ अंक, द्वितीय स्थान पर रखे जाने वाले को १ अंक और तीसरे अर्थात सबसे नीचे रखे जाने वाले को 0 अंक दिए जाएंगे।


स्लाइम मोल्ड के साथ किये गए परीक्षण के पहले केस जिसमें दो विकल्पों, ५ लाइट और ३ डार्क से शुरू करते हैं। ।मान लेते हैं कि प्लास्मोडियम के ५०% स्लाइम मोल्ड (फ़ूड लविंग ) अधिक भोजन को तरजीह देते हैं और ५०% (लाईट हेटिंग) अँधेरे को. और आगे मान लें कि ५लाईट वाले विकल्प को ५०% स्लाइम मोल्ड से २-२ अंक मिलते हैं और बाकी स्लाइम मोल्ड से 0 अंक. इस तरह दूसरे विकल्प को भी ५० % स्लाइम मोल्ड से २-२ अंक मिलेंगे और बचे स्लाइम मोल्ड 0 अंक देंगे । ऐसी स्थिति में पहले विकल्प को मिलेंगे

२*0 . 5 +०*0 . 5 यानि १ और दूसरे विकल्प को भी मिलेंगे 0 *0. 5+२*0 . 5 यानि दोनों को १ -१ पॉइंट मिलते हैं।



अब दूसरे केस में, जहाँ तीसरा विकल्प १- डार्क भी जुड़ गया है वहां अंकों का बंटवारा थोड़ा अलग होगा। देखते हैं: ५ लाइट को जस का तस आधे स्लाइम मोल्ड से २ -२ अंक मिलेंगे और लाइट हेटिंग मोल्ड देंगे 0. तब कुल अंक हो गए 1.


३ -डार्क को फुड लविंग जो कि ५०% हैं, वो दूसरे स्थान पर रखेंगे और अंक मिलेगा १ और साथ ही, लाइट हेटिंग जो कि कुल स्लाइम मोल्ड के ५०% हैं, तीसरे विकल्प के जुड़ जाने के बाद इस ५०% समूह के २५% या तो पहले स्थान पर रखेंगे अथवा दूसरे स्थान पर. इस तरह ३-डार्क के कुल अंक होंगे 1 *५०%+२*२५%+१*२५% यानि की कुल अंक 1. २५


१ डार्क के विकल्प को फ़ूड लविंग द्वारा तीसरे स्थान पर रखने और लाइट हेटिंग बैक्टीरिया के समूह (५०%)द्वारा या तो पहले स्थान पर रखने अथवा दूसरे स्थान पर रखने की स्थिति में कुल अंक मिलेंगे:


0 *0. 5 +१ *0. 2 5 +२*0. २५ यानि कुल 0. 75


अर्थात तीसरे विकल्प के आ जाने से ३-डार्क वाला विकल्प ज्यादा लोकप्रिय बन गया! है न ये ब्यूटी ऑफ़ डिकॉय इफ़ेक्ट।

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