Thursday, 23 August 2018

बाल कहानी: द डे द क्रेयॉन्स क्विट

बाल कहानी: द डे द क्रेयॉन्स क्विट

कहानियां सुनने-सुनाने का इतिहास बहुत ही पुराना है. बस ज़िक्र हो कहानियों की और मन कल्पना के अथाह सागर में डुबकी लगाने को तत्पर हो जाता है. खासकर बच्चों की बात करें, उनकी आँखों में आई चमक को देखकर कहानियों के महत्व को समझा जा सकता है. कहानियों अपने विभिन्न पात्रों चाहे चाँद -सितारे हों या उमड़ते -घुमड़ते बादल, गुड्डे -गुड़िया या नन्ही चिड़िया, पेड़ या पर्वत, कोमल से खरगोश या गर्जन करते शेर,राजा-रानी या परियां और चुड़ैल, के माध्यम से जहाँ बच्चों को अचरज से भर देती हैं वहीँ उनकी कल्पनाशीलता को नए आयाम देती हैं. कहना गलत न होगा, एक अच्छी कहानी के द्वारा बच्चे के मन के उड़ान का अंदाजा लगाना असंभव है. कहानियां बच्चों की कल्पनाशीलता को तो बढ़ाती ही है साथ ही भाषा एवं व्याकरण का ज्ञान, देश- दुनिया की कई जानकारियां, मानव जीवन के जरूरी पहलूओं से परिचय भी कराती है। निसंदेह,कहानियां बच्चों का मनोरंजन कर ख़ुशी भी देती हैं, कुल मिलाकर इसे एक अत्यंत जरूरी सार्थक गतिविधि कहा जा सकता है. और, माता-पिता, शिक्षक और अभिभावकों द्वारा बच्चों का बचपन में ही किताबों से दोस्ती कराया जाना और पढ़ने की आदत डलवाना एक अनुपम उपहार साबित होता है.

पर यहाँ कई सवाल खड़े होते हैं जैसे किताबें कैसी हों, बच्चों की रूचि कैसे जगाई जाए? सबसे महत्वपूर्ण है, बाल साहित्य का बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध होना और साथ ही हरेक बच्चे के पसंद के हिसाब की किताबें चुनने की व्यवस्था का होना। हर बच्चे की पसंद अलग-अलग होती है, किसी को परीकथाएं पसंद आती हैं, किसी को साहसिक कारनामे से जुड़े किस्से या किसी को साइंस फिक्शन. जरूरी है, बच्चों की अभिरूचि, आस-पास के परिवेश, जरूरतें,समझ के स्तर ,उनकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखकर कहानियां और कवितायेँ पढ़ने को दी जाएँ, खूबसूरत चित्रों के साथ प्रकाशित कहानियां उनमे पढ़ने के उत्साह को और बढ़ा देती है. इस बात को न भूला जाए की बच्चे बड़ों से भिन्न होते हैं. बाल साहित्य के क्षेत्र में काम करने वालों का यह भी मानना है कि बालसाहित्य के नाम पर नीति, धर्म, अध्यात्म आदि को केंद्र में रखकर छापे जा रहे ‘उपदेशक साहित्य’ के अलावा बच्चों की रुचि, मनोरंजन एवं उपयोगिता को केंद्र में रखकर बाल साहित्य की रचना ज्यादा जरूरी है ताकि इनके माध्यम से बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ- साथ भविष्य की चुनातियों से निपटने के लिए तैयार भी किया जा सके. एक अच्छा बाल साहित्य उसे ही समझा जा सकता है जिसमें मात्र सीख की ही बात न हो वरन बच्चों की भागीदारी भी महसूस की जाए, बच्चों को जवाबदेही की प्रक्रिया से जोड़ा जाए. ऐसा साहित्य जो केवल राजा-रानी, परियों, सुन्दर वन तक ही सीमित न होकर जिंदगी की पेचीदगियों से रूबरू कराये और विचारने की समझ विकसित करने में उनकी मदद करे. बच्चों के कोमल मन जैसी अवधारणा के आड़ में दुनिया की जटिलताओं से परिचय नहीं कराने और उनसे दूर ले जाने से से बेहतर यह नहीं की उन्हें इन विषयों की जानकारी देकर उनसे निपटने में उनकी मदद की जाए । इस तर्ज़ पर कि गन्दगी न देखने से गन्दगी खत्म नहीं हो जाती, गन्दगी खत्म करनी है तब हमें गन्दगी से जूझना होता है.

चलिए आज बात करते हैं कथाकार ड्रियू डेवॉल्ट और चित्रकार ऑलिवर जेफर्स की जोड़ी द्वारा बच्चों के लिए रचित एक मनोरंजक कहानी 'द डे द क्रेयॉन्स क्विट' की. खूबसूरत चित्रों से सजी एक छोटे बच्चे डंकन और रंग भरने वाले क्रेयॉन की समस्याओं की कहानी! ड्रियू डे वॉल्ट की २०१३ में प्रकाशित जहाँ यह पहली पुस्तक थी वहीँ इस कहानी में चित्रों से जान डालने वाले ऑलिवर जेफर्स उस समय तक बाल साहित्य के क्षेत्र में अच्छा मुकाम पा चुके थे. उनकी पहली ही किताब 'हाउ टू कैच अ स्टार' बच्चों का मनोरंजन करने में काफी सफल रही थी। इसके अलावा लॉस्ट एंड फाउंड, द इनक्रेडिबल बुक ईटिंग बॉय और स्टक भी खूब चर्चा में रही है. खासकर उनके द्वारा बनाये गए बच्चों की तरह बनाये गए चित्रों और हस्तलिखित स्टाइल से लिखी गयी कहानियों को लोगों ने खूब सराहा.

यह किताब भी उसी अंदाज में लिखी गयी है. शायद, बच्चों के लिए कहानी से खुद को जोड़ना स्वाभाविक और आसान बन जाता है. बड़े और छोटे लेटर्स को मिलाकर लिखने में की जाने वाली गलतियां इस कहानी में देखने को मिलती है और एक सुखद अहसास कराती है! कहानी है एक बच्चे डंकन की और असंतुष्ट क्रेयॉन्स की! पात्रों के रूप में क्रेयॉन का चुना जाना निश्चित रूप से अचंभित करता है, पर साथ में कहानी पात्रों के चयन से रोचक भी बन जाती है. सरल भाषा शैली इसे और भी मनोरंजक बनाती है. जैसा की ऊपर लिखा है, चित्रों ने कहानी में जान दाल दी है. क्रेयॉन के हाथ में प्लाकार्ड{घोषणापत्र) और उस पर लिखा उनका सन्देश 'we are not happy' आपको खुलकर हसने पर मजबूर करता है.

कहते है, एक असंभव सी कल्पना और फंतासी की रचना बच्चों को वास्तविकता से भरी कहानियों के मुकाबले अधिक मनोरंजन करने में सफल होती हैं. इस दृष्टि से लेखक यहाँ सफल दिखाई देते हैं.

कहानी शुरू होती है डंकन को मिले हरेक रंगों के क्रेयॉन द्वारा लिखे गए पत्रों से. हर क्रेयॉन ने पत्र के माध्यम से अपनी समस्याएं डंकन को बताई है. मसलन, लाल रंग की समस्या यह है कि पूरे साल तो काम में लगा ही रहता है और छुट्टियों में भी सांता और वैलेंटाइन को रंग-रंग कर थक चुका है, वहीँ बीज की शिकायत यह है कि उसे काम ही नहीं मिलता, भूरे रंग को भालू, घोड़े और पप्पी मिल जाते हैं और उसके पास आता है गेंहूं और गेंहू में रंग भरने में किस बच्चे को मजा आता है आदि ? पीले और नारंगी रंग के मध्य विवाद को सुनकर आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं वहीँ सफ़ेद रंग के केवल बर्फ और बिल्लियों को ही रंग सकने के तर्क को सुनकर हतप्रभ! क्या हल निकालेगा डंकन सबको खुश करने का? समस्या का समाधान है, डंकन द्वारा लिया गया एक बोल्ड निर्णय, एक कलात्मक अंत.
शिकायतों का पुलिंदा होते हुए भी कहानी बोझिल नहीं होती, कह सकते हैं की लेखक ने ह्यूमर को एक -एक पंक्ति में बचाकर रखा है. लेखन शैली में दोहराव नहीं है, हरेक पत्र को पढ़ने में उतना ही मजा आता है जितना पहले पत्र को पढ़ने में. चित्रों के माध्यम से हरेक क्रेयॉन के अलहदा व्यक्तित्व ,मनोभावों यथा गुस्सा, दुःख, थकान आदि को बखूबी दर्शाया गया है.

सबसे खास बात इस कहानी की, आप अपने बच्चों को देख सकते हैं एक अलग ही कल्पना करते, उनके बनाये रंगीन चित्रों से दीवारों को सजाते ..तैयार हैं आप☺

Friday, 27 July 2018

कुछ ख्याल: मुंबई के कुछ उपनगरों से गुजरते हुए

छोटी -छोटी बूँदें मूसलाधार बारिश में तब्दील होकर मुंबई में हरेक साल नए कीर्तिमान बनाती है। कई अप्रिय घटनाएं मन को व्यथित करती हैं, वहीँ हमें सोचने पर मजबूर भी कि क्या इन मुसीबतों का हल नहीं ? प्रकृति के इस कहर के जिम्मेवार हम ही हैं और इनका समाधान हमें ही ढूंढना होगा। 

ऐसी ही लगातार होती बारिश के भय ने हमारे पिछले कुछ वीकेंड्स में घूमने जाने की योजना पर भी पानी फेर दिया।प्रकृति की रहमदिली ही कहिये, पिछले रविवार मौसम ने हमारा साथ दिया और हम निकल पड़े मुंबई की एक छोटी सैर पर. घूमने की जगहों की एक लम्बी सूची में से हमने इंडोर जगह घूमने को ही प्राथमिकता दी, और चुना मुंबई के एक उपनगर भायखला (Byculla )स्थित डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय को। खुशकिस्मती हमारी कि हमने एक ही परिसर में अवस्थित होने के कारण और प्रकृति की दया से संग्रहालय से ही सटे वीरमाता जीजाबाई उद्यान और ज़ू के भी दर्शन किये।एक तरफ जहाँ मुंबई की पुरानी कला-संस्कृति को जानने का मौका मिला वहीँ दूसरी तरफ प्रकृति को थोड़ा करीब से देखने का अवसर।

भायखला जाने के लिए हमें ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पकड़नी थी, ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे यानि EEH, मुंबई के दक्षिणी और उत्तरी भाग को जोड़ती२३.५५ किमी लम्बी सड़क। छत्रपति शिवजी टर्मिनस से ठाणे तक दौड़ती और मुंबई के पूर्वी उपनगरों को एक-एक कर छूते हुए, रोजाना लाखों की संख्या में लोगों को अपने मुक़ाम तक पहुँचाती यह सड़क ।और, इस सड़क के समानान्तर दौड़ती है मुंबई की लाइफ लाइन 'लोकल ट्रेन' की सेंट्रल लाइन। मुंबई के पूर्वी सबर्ब को 'ईस्ट' और 'वेस्ट' में विभाजित करते हुए। मसलन घाटकोपर ईस्ट, घाटकोपर वेस्ट और दादर ईस्ट, दादर वेस्ट इत्यादि।

यात्रा शुरू हो चुकी थी। योजनानुसार, घाटकोपर से ईस्टर्न एक्सप्रेस लेकर कई पूर्वी उपनगरों को लांघकर भायखला पहुँचना था। रविवार को अपेक्षा के अनुरूप सड़क पर गाड़ियों की संख्या कम ही थी. सबसे बड़ा फायदा यह कि पहुँचने और लौटने के समय का अनुमान लगा पाना संभव है. सबसे पहले पहुंचे घाटकोपर, हाँ वही मुंबई का पूर्वी सबर्ब घाटकोपर जो पिछले महीने एकचार्टर्ड प्लेन के एक निर्माणाधीन इमारत से टकराने की हृदय विदारक घटना, की वजह से समाचारों में था । एक घनी आबादी वाला मुंबई का उपनगर ,जहाँ से मेट्रो रेल पकड़कर मुंबई के पश्चिमी सबर्ब वर्सोवा तक जाया जा सकता है. हाँ, मुंबई के पूर्वी हिस्से को पश्चिमी हिस्से से जोड़ने वाली मुंबई की पहली मेट्रो लाइन का एक मुख्य स्टेशन घाटकोपर।

ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर हम चल रहे हैं, सड़क के दोनों ओर यातायात सम्बन्धी हिदायतें देते बोर्ड दीखते हैं, हमारी ही सुरक्षा के लिए हमें सावधान करते निर्देश। स्पीड लिमिट का एक एक बोर्ड जिस पर एक लाल रेखाओं से बने एक वृत्त के मध्य ४० लिखा है, पर सड़क पर हवा से बातें करती गाड़ियों को देखकर आगे लगे बोर्ड पर नजर ठहरती है और याद आती है २ दिन पहले ही बच्चों के क्लासेज के सन्दर्भ में बातचीत के दौरान किसी की कही हुई बात, आई लव रूल्स, सीरियसली! मैं सोचने लगती हूँ, डू वी ???

घाटकोपर छूटा और पहुंचे वडाला । हरेक उपनगर अपने आप में भरा पूरा एक शहर। ट्रैफिक लाइट पर दीखती हैं, ग्रीन लाइट होने के इंतज़ार में खड़ी गाड़ियों में बैठे लोगों को फूल की मालाएँ बेचने की कोशिश करती घस्त्रियां और बच्चे। ध्यान में वो साडी चीजें एक के बाद एक आने लगती है, जो यूँ ही ट्रैफिक लाइट पर ख़रीदे हैं मैंने, छोटे-बड़े खिलौने, बेन १० का बबल गन, डस्टिंग क्लॉथ, भूने मूंगफली और चने, मच्छर मारने की रैकेट, किताबें, फूल, झंडे, पेंसिल, पेन, और अभी हाल में मिटटी का तवा... और अन्य काफी रंग- बिरंगी चीजें बिकते देखा है... मेह्नत की कमाई भीख माँगने से बेहतर है। वहीँ सवाल यह भी उठता है की क्या ट्रैफिक के परिचालन और दुर्घटनों के मद्देनजर हमें इन सामानों को न खरीदकर इसे हतोत्साहित करना चाहिए? बत्ती हरी हो चुकी थी और पुनः गाड़ी रफ़्तार पकड़ने लगी. थोड़ी ही दूर आगे सुमननगर के बोर्ड के नीचे एक औरत फूलों की माला को हाथों में लिए खड़ी दिखी, ट्रैफिक के पुनः रुकने का इंतज़ार में.

वडाला कब गुजरा और सायन पहुंचे, अंदाज लगाना मुश्किल । सब एक दूसरे में समाये हुए.. सायन (शीव)यानि सरहद या सीमा। जैसा की नाम से ही अनुमान लगाया जा सकता है, १८वीं शताब्दी में मुंबई में प्रवेश करने वालों पर यहीं निर्मित किले से नजर रखी जाती थी। यह पहाड़ी अपनी ऊँचाई के कारण सामुद्री यातायात पर नज़र रखने के लिए महत्वपूर्ण था भले अब वहाँ समुद्र का अता पता नहीं चलता। आज इस इतिहास को समझने के लिए पुराने नक़्शे खंगालने होंगे जब आज का मुंबई शहर ७ -अलग-अलग द्वीपों में वितरित था, २२ पहाड़ियों से घिरा हुआ. सायन से कोलाबा (मुंबई का दक्षिणी भाग) तक पूर्वी और समुद्रतट के किनारे-किनारे पश्चिमी हिल रेंज के होने को विश्वास करना मुश्किल।
आगे पहुंचे दादर, मुंबई का पहला प्लांड सबर्ब। सिद्धिविनायक मंदिर, शिवाजी पार्क, हिन्दू कॉलोनी, पारसी कॉलोनी, मराठी फिल्मों की नामचीन हस्तियों का बसेरा, एक और पूर्वी सबर्ब। सड़क के दोनों तरफ छोटी-बड़ी, दुकानों की भारी संख्या इशारा करती कि कितने लोगों की पनाहगार है, यह सबर्ब। दादर का अर्थ है, 'सीढ़ी'. यक़ीनन मुंबई के प्रमुख द्वीप को अन्य द्वीपों से जोड़ने वाला कड़ी... मुंबई के 'कॉटन मिल युग' के समय कई प्रसिद्द कॉटन मिल मसलन बॉम्बे डाईंग, गोल्ड मुहर मिल, कोहिनूर मिल, रूबी मिल और टाटा मिल यहीं स्थापित किये गए थे. और अगर खाने की बात की जाए तब यह जानना बड़ा ही रोचक है कि विश्व प्रसिद्ध 'वड़ा पाव' ने सर्वप्रथम यहीं दादर स्टेशन पे ही लोगों को अपना दीवाना बनाया।

अब बात परेल की, हमारा अगला पड़ाव। पुनः कहना जरूरी नहीं कि दुकानों के ऊपर लगे बोर्ड से ही यह जानना संभव हुआ कि हम किसी और सबर्ब में प्रवेश कर चुके हैं। मूलतः कपड़ा मिलों का केंद्र रहे इस इलाके में मिलों के बंद होने के बाद दक्षिण मुंबई के कई व्यावसायिक केंद्र यहाँ स्थापित हुए, कई कॉर्पोरेट दफ्तर खुल गए. बायीं-दायीं नज़ारे घुमाने भर से ही इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. पिछले वर्ष की मुंबई में एल्फ़िंस्टन और परेल के लोकल रेलवे स्टेशनों को जोड़ने वाले पुल पर मची भगदड़ की घटना इशारा करती है कि हमें इस सबर्ब में अचानक बढ़ी भीड़ की सुरक्षा के इंतेज़ाम के बारे में गहराई से पड़ताल करनी चाहिए।


बस कुछ ही देर में हम पहुंचे भायखला स्थित अपने गंतव्य जीवाजी उद्यान के परिसर में, सबसे मजेदार बात, यहाँ पेंगुइन देखे जा सकते हैं.. है न अनोखी बात। पेंगुइन और मुंबई में ? है न यह मायानगरी !

Tuesday, 19 June 2018

असल्फा :चल रंग दे


दो दिनों तक कभी तेज, कभी छिटपुट बारिश के बाद आज मौसम कुछ साफ़ है, आज सुबह धूप खिली थी. खिड़की के बाहर देखती हूँ, दूर तक जहाँ तक नजर जा सके. घाटकोपर पहाड़ी की ढलान दिखती है, और दीखते हैं उसी ढलान पे बने कई छोटे-छोटे, सटे-सटे से घर और कुछ घरों की छतों को बारिश से लड़ने की ताकत देते नीले तिरपाल शीट. नजर पड़ती है, कहीं से निकलते धुएँ पर, शायद कोई छोटा कारखाना है! सामने एक मस्जिद और कुछ ही दूरी पर एक मंदिर की दीवार. यह मुंबई के कई बड़े स्लमों में से एक असल्फा स्लम का एक छोटा- सा हिस्सा है, यक़ीनन वह हिस्सा नहीं जिसपर  मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों की नजर पड़ती है और जो इटली के अमाल्फि कोस्ट पर बसे पोसितानो शहर की याद दिलाता है. तंग गलियों, छोटे अँधेरे घरों, नालों और दूर -दूर तक फैली गन्दगी से पहचाने जाने वाले स्लम से बिलकुल अलग जिनकी दीवारों पर इंद्रधनुषी रंग बिखेरे गए हैं. बस्ती की बाहरी दीवारों पर अलग-अलग तरह के डिजाइन बनाए गए हैं. बस्तियों की १७५ दीवारें  ७५० लोगों, ४०० लीटर पेंट और तक़रीबन ६ दिनों की मदद से अब बदरंग नहीं रही हैं.

स्लम के किसी एक विशेष हिस्से का मेकओवर कर इन बस्तियों के प्रति आम लोगों की धारणा बदलने और इन बस्तियों के निवासियों के जीवन में सकारात्मकता के रंग भर सकने में कितनी कामयाबी मिलेगी ? और, आम लोगों की धारणा बदलने से क्या स्लम में रहने वाले लोगों की समस्याएं ख़त्म या कम हो जायेंगी?  तो क्या कुछ लोगों का कहना सही है कि इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य मेट्रो में सफर करने वालों के लिए बस यह एक खुबसूरत नज़ारे की रचना है? क्या सचमुच रंग रोगन से बस्ती को कोई लाभ हुआ है या बस लोगों की जिज्ञासा इन बस्तियों के प्रति बढ़ गयी है? तो क्या यह 'स्लम टूरिज्म ' जिसे कुछ लोग 'पोवर्टी पोर्न' की भी संज्ञा देते हैं, का एक नया गंतव्य बनने वाला है?

स्लम के मेकओवर को अंजाम देने वालों का उद्देश्य बस्ती को नई पहचान दिलाना और फिर इसके बाद इसकी समस्याओं को सामने लाना भी है. आशा है, वे सफल होंगे।

Saturday, 19 May 2018

शादी: एक यादगार दिन या कुछ और


कुछ दिन पहले ही बातों-बातों में मैंने अपनी घरेलू सहायिका से पूछा, " कुछ बचाती हो अपने बच्चे के लिये ?" शादी ३ साल पहले हुई है और लगभग २ साल का बच्चा है उसका। उसने जवाब में कहा,"कहाँ दीदी, खर्चे इतने हैं और ऊपर से कर्ज़ा।" खर्च की बात तो समझ में आ गयी, महंगाई से तो सब परेशान हैं. पर क़र्ज़! उत्सुकतावश मैं थोड़े झिझक के साथ पूछ ही बैठी, " क़र्ज़ क्यों लिया?" "मैंने नहीं लिया, मेरे पति ने लिया था", उसका उत्तर था. मेरे क्यों पूछने पर उसने बताया " शादी थी न हमारी, उसके लिए लिया था, खाना खिलाना, गिफ्ट देना, कपड़े देना, सब करना पड़ता है।" उसकी आवाज में थोड़ा दर्द महसूस किया मैंने। दाम्पत्य जीवन की चुनौतियाँ क्या कम हैं और अगर उसकी शुरूआत एक भारी-भरकम क़र्ज़ के साथ हो, किसी के लिए भी कष्टकारी है. उस एक दिन को यादगार बनाने के नाम पर अभी तक की जमा-पूँजी या कई दफा क़र्ज़ लेकर खर्च कर देना और फिर लम्बे समय तक उसे चुकाते रहने की विवशता को क्या कहेंगे?
इस वार्तालाप के बाद मेरी यह धारणा कि शादियों में दिखावा या जरूरत से ज्यादा पैसे खर्च करने की प्रवृति महज समाज के ऊँचे और मध्यम वर्ग तक ही सीमित है, पूरी तरह से बदल गयी. बाजारवाद कहें या भौतिकवाद, इंसानों की किसी भी गलत परंपरा को शीघ्र अपना लेने की कमजोरी जैसी कई वजहों से यह प्रवृति समाज के हर तबके द्वारा अपना ली गयी है. बमुश्किल हजारों में निपटे जा सकने वाली शादियों के लिए ढेर सारा पैसा व्यर्थ गंवाया जाता है. विडम्बना यह कि, इस तरह पैसे को गंवाकर समाज में हम अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने, दूसरों से बड़ा कहलवाने और अपनी इज्जत बढ़ा लेने का झूठा दम्भ पालने लगते हैं और साथ ही, इसे एक बुराई मानने को भी तैयार नहीं होते हैं. कभी यह सोचने का यत्न नहीं करते कि क्या हमारे द्वारा चुनी गयी दिशा सही है? और -तो-और अपनी मान -मर्यादा के नाम पर अपने बच्चों की शादियों पर ढेर सारे पैसे खर्चकर उन्हें यह अहसास करवाने से भी न चूकते कि देखो हमें तुमसे कितना प्यार है! भले ही बच्चों को अपने गृहस्थ जीवन की शुरुआत खाली हाथ ही क्यों न करना पड़े।

आज प्रिंस हैरी और मेगन मार्केल की शाही शादी 1000 साल पुराने विंडसर किले के सेंट जॉर्ज चैपल में होने वाली है। लम्बे समय से चर्चा में रही इस शादी की राजघराने की अन्य शादियों के पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ देने की संभावना है। समारोह का दुनियाभर में सीधा प्रसारण किया जाएगा। विवाह -बंधन में बंधने जा रहे जोड़े से लेकर दुनियाभर की बड़ी-बड़ी हस्तियों के शिरकत, बटरक्रीम की फ्रॉस्टिंग और ताजे स्प्रिंग फ्लॉवर्स से सजे ४५ लाख रुपये का केक या 6 हजार पाउंड की वेडिंग रिंग, टिगनानेल्लो (Tignanello) वाइन, विंडसर कासल ट्रीट चॉकलेट ट्रफल और शाही दावत की झलकियां पाने के लिए करोड़ों लोग बेसब्री से इंतजार में लगे हैं. दैनिक जागरण में छपी एक खबर के मुताबिक इस शादी की लोकप्रियता को लेकर हाल ही में ब्रिटेन की एक मार्केट रिसर्च फर्म ने एक सर्वे भी किया है। सर्वे में जो सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा था वो था इस शाही शादी में भारतीयों की दिलचस्पी। सर्वे में शामिल कुल भारतीयों में से 54% भारतीयों ने माना कि वे प्रिंस हैरी और मेगन की शादी को लेकर उत्साहित हैं वहीं ब्रिटिश नागरिकों की बात करें तो सर्वे में सिर्फ 34% नागरिकों ने शाही शादी में रुचि दिखाई। जानकारी के मुताबिक, इस सर्वे में 16 से 64 वर्ष के बीच के 28 देशों के करीब 21 हजार लोगों ने हिस्सा लिया था।
भारतीयों की शादियों में दिलचस्पी जगजाहिर है, यहाँ के विवाहों की रौनक, चमक-धमक, संगीत तो विदेशी पर्यटकों को भी लुभाने लगा है. पर सवाल उठने लगा है कि यह फिजूलखर्ची नहीं है? खासकर भारत जैसे गरीब देश जिसमे आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूखे सोने को मजबूर है, शादी-विवाह जैसे आयोजनों में आडंबर और शानो-शौकत पर इस प्रकार के धन, समय और संसाधनं की बर्बादी न्यायसंगत है ? क्या 'बिग फैट वेडिंग' को लेकर सच में हमें गर्व महसूस करना चाहिए?
आश्चर्य इस बात का है कि भारतीय शादियों का कारोबार अब बढ़कर करीब 1.२५ लाख करोड़ का हो गया है और हर वर्ष इसमें २०-३० % का इजाफा भी हो रहा है । यानि हर साल शादियों को और भी भव्य बनाने की होड़ जारी है, एक- दूसरे से ऊपर अपने आप को समझने की होड़ । डेस्टिनेशन वेडिंग, बीच वेडिंग,एडवेंचरस वेडिंग जैसे अंडरवाटर वेडिंग बंजी जंपिंग, मिड एयर वेडिंग, वाइल्ड लाइफ थीम पर शादियां आयोजित की जा रही हैं. हेलीकाप्टर से विदाई और पुष्प वर्षा, आलीशान मंडप, लजीज व्यंजन का इंतज़ाम कर विवाह की मधुर स्मृतियाँ संजोयी जा रही है या फिर कहें कि समाज में हैसियत, रुतबे को दिखाने का नया तरीका इज़ाद किया गया है। एक छोटा-सा पारिवारिक उत्सव दिखावे, शान-शौकत और सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय बन गया है.

विलियम डेलरिम्पल की किताब 'द लास्ट मुग़ल' के पहले अध्याय में वर्णित मिर्ज़ा जवां वख़्त की शादी के जश्न का ब्यौरा भव्य शादियों को लेकर हमारी कमजोरी को दर्शाता है । लाल किले की लाहौरी गेट से रात के दो बजे बारात का निकलना, जमकर की गयी आतिशबाजियां, सजे हाथियों और घोड़ों का काफिला, देखने के लिए उमड़ा लोगों का हुजूम, त्योहारों जैसा समां बाँध रहा था. अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफ़र की पत्नी ज़ीनत महल ने अपने बेटे की शादी में छोटी - से -छोटी चीजों पर ध्यान दिया था चाहे महल की साफ़-सफाई हो या उसके दीपों और झाड़फानूसों से सजावट की बात हो या फिर मेहंदी की रस्म से लेकर लजीज पकवानों , कपडे, आभूषणों, दूल्हे के सेहरे को मोतियों से सजाने की, कोई कसर नहीं छोड़ी गयी थी. पूरे हिन्दुस्तान भर से पाइरोटेक्निशियन को बुलाकर उनके हुनर को परखा गया था। ज़ीनत महल द्वारा इस विवाह को आलिशान बनाये जाने का एक मकसद अपने बेटे के हैसियत में इज़ाफ़ा और साथ ही इस राजवंश में अपनी स्थिति को भी मजबूत करना था ।

सवाल यह उठता है कि क्या यह फिजूलखर्ची को किये बिना इस पवित्र बंधन को यादगार नहीं बनाया जा सकता? शायद संभव है, सादगी से इस पुनीत कार्य को अंजाम देकर कई जोड़ों ने यह साबित किया है कि बिना तामझाम की शादी भी लोगों के लिए यादगार बन सकती है । अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के भिंड में आयोजित दो आईएएस अधिकारियों आशीष वशिष्ठ और सलोनी की शादी हो अथवा सूरत के भरम मारू और दक्षा परमार की शादी या हैदराबाद के निवासी शशि किरण टिक्का और पूर्णिमा दीपिका के परिणय सूत्र में बंधने की खबर, इन तमाम हो-हल्ले के साथ हो रही शादियों के मध्य एक खुशनुमा अहसास जगाती है । कुछ जोड़ों द्वारा शादी के खर्चे होने वाले पैसे को जमा कर हर साल उससे मिलने वाले ब्याज को जरूरतमंद बच्चों पर खर्च करने का लिया जाने वाला संकल्प क्या कम महत्वपूर्ण है? क्या माँ-पिता के द्वारा इसी तरह का निर्णय लिया जाना बच्चों की नजर में उनके कद को ऊँचा करने वाला साबित न होगा? इस कुरीति में भागीदार न बनकर क्या हम एक उदहारण बनाकर समाज के अन्य लोगों को प्रेरित करने का संकल्प नहीं ले सकते? बाहरी तामझाम से प्रभावित न होकर और एक अदृश्य, अनकही प्रतियोगिता में शामिल न होकर मात्र दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद और शुभकामनायें प्रेषित कर हम इस पारिवारिक उत्सव के असल मकसद को फिर से कायम करने का प्रयत्न नहीं कर सकते?

इस फिजूलखर्ची को हमें जल्द से जल्द रोकना होगा वर्ना यह गरीबों को और गरीब कर देने वाला साबित होता जा रहा है, मध्यम वर्ग को कर्ज़ के दलदल में धँसाता जा रहा है और अमीरों को दिखावे की लत से ग्रसित करती यह परंपरा उन्हें और अधिक लालची और रिश्वतखोर बनाता जा रहा है. जितनी जल्दी हो सके कानून बनाकर, सामाजिक तरीके से जागरूकता फैलाकर या कठोर कदम उठाकर इस परंपरा को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। आज का युवा जो हर मुद्दे पर, हर मोर्चे पर सामाजिक बुराइयों को दूर कर देने के कार्य में तत्पर दिखाई देता है, वह इस ढोंग से अपने को दूर न कर सकेगा, यह कहना सही नहीं है.






Sunday, 13 May 2018

हैप्पी मदर्स डे

आज मदर्स डे है। एक माँ के प्यार, समर्पण, त्याग को याद कर परिवार के अन्य सदस्यों की ज़िंदगियों में उनकी अहमियत का अहसास दिलाये जाने का दिन. इन दिवसों को मनाये जाने का एक सकारात्मक साइड इफ़ेक्ट है कि दुनियाभर में एक माँ की भूमिका की कदर की जाने की शुरुआत हुई है, मातृत्व की चुनौतियों को महसूस किया जा रहा है, निम्न दर्ज़े का काम समझेजाने वाले इस काम के प्रति लोगों का नजरिया बदलने लगा है और  साथ ही लोगों को अपनी माँ के प्रति खुलकर अपनी भावनाओं का इज़हार करने का मौका भी मिल रहा है. संदेश भेजकर, उपहार या कार्ड देकर, या बुके देकर इस प्यार से भरे रिश्ते का को और भी प्यारा बनाया जा रहा है. सब रिश्तों से अनमोल माँ-बच्चे के इस रिश्ते को अनोखे ढंग से मनाने के तरीके ढूंढें जा रहे हैं. कोई मौका खोना नहीं चाह रहा अपनी माँ को जता देने का, हाउ मच आई लव यू...
और क्यों न जताया जाए, माँ -बच्चे का रिश्ता होता ही है बहुत प्यारा। जन्म देने से लेकर जीवन के हर कदम पर थामे रहती है, माँ अपने बच्चे का हाथ। कभी प्यार से और कभी सख्ती से एक गुरु या दोस्त बनकर जीवन का पाठ पढाती है,निस्वार्थ। अपने बच्चे और परिवार की ज़िन्दगियों में खुशियाँ भरने के लिए खुद की खुशियों की कुर्बानियां देने से नहीं चुकती। मिस वर्ल्‍ड के फाइनल राउंड में मानुषी छिल्लर से पूछे गए सवाल कि 'किस प्रोफेशन को सबसे ज्यादा सैलेरी मिलनी चाहिए' के जवाब के तौर पर  'एक मां को सबसे ज्यादा इज्जत मिलनी चाहिए और जहां तक सैलरी की बात है, तो इसका मतलब रुपयों से नहीं बल्कि सम्मान और प्यार से है' कहे जाने पर दुनिया भर के लोगों द्वारा पसंद किया जाना हर माँ की बच्चे के जीवन में एक विशेष भूमिका को साबित करता है.
रोते हुए बच्चे को बस माँ की गोद चाहिए होती है शांत होने के लिए. हलकी लगी चोट के दर्द गायब होने के लिए   माँ का केवल वह जादुई स्पर्श या एक हलकी फूँक काफी होती है. किसी प्रतियोगिता में जाने से पहले माँ का अपने बच्चे के ऊपर विश्वास बच्चे के आत्मविश्वास को कम होने नहीं देता। 'चाहे कुछ भो हो जाये, मैं तुम्हारे साथ हूँ' का आभास कराकर बच्चों के हर सुख-दुख के क्षणों में उनके साथ ताउम्र सहारे के रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खड़ी रहती है। कितनी ही बदमाशियों को झेल जाती है और कभी गुस्सा हुई तो मनाने के लिए जरूरी होती है बस थोड़ी सी मिन्नत! बहुत बड़ा दिल होता है माँ का. कहते हैं, भगवान् हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने माँ को बनाया।

इतना प्यार और सम्मान जहाँ रिश्तों को और अधिक मधुर बनाने में मददगार है, वहीँ एक माँ के रूप में एक औरत से और अधिक जिम्मेवार होने की अपेक्षा भी करता  है। बच्चे को जन्म देने से लेकर उसकी परवरिश और अन्य दायित्वों का निर्वहन निसंदेह एक जटिल कार्य है, जिसका नाता बच्चे के व्यक्तित्व के विकास से जुड़ा है. हर इंसान के व्यक्तित्व पर अपनी माँ के व्यक्तित्व का अच्छा -खासा प्रभाव पड़ता है. इसका प्रमाण हमें कई सफल व्यक्तियों की जीवनियों को पढ़कर मिलता है. जीवन के प्रति नजरिया, विषम परिस्थितियों से मुकाबला करने के तरीकों और संतुलित व्यवहार से लेकर बच्चों से जुड़े हर छोटे- बड़े मुद्दों में माँ की भूमिका पहले से ज्यादा बढ़ गयी है. ऐसे में हर वक्त अपने आप को और बेहतर और समझदार इंसान बनाने की कोशिश जारी रख, अपनी एवं अन्य की गलतियों और अनुभवों से सीखने और उसे न दुहराने का वादा खुद से कर इस चुनौती का सामना करने के लिए हर माँ को तैयार रहना होगा। इस जटिल काम का प्रशिक्षण किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं दिया जाता और एक अच्छी औरत होना एक अच्छी माँ होने का लाइसेंस भी नहीं देता.




Friday, 11 May 2018

किताबें और हम


किताबें हमेशा से ही हमारी संस्कृति और इतिहास का अभिन्न हिस्सा रही हैं। भले ही किताबों का स्वरुप कुछ अलग था पर क्ले टैबलेट्स, लौह पत्रों, चर्म पत्र, ताड़ पत्रों, मिट्टी की पटि्टयों, भोजपत्रों,पेपाइरस आदि पर उकेरे चिन्ह या शब्द इस बात का प्रमाण हैं कि हर युग में इंसानों ने अपने विचार,ज्ञान और अनुभवों को लिखकर संरक्षित करने और भावी पीढ़ी तक हस्तांतरण को महत्वपूर्ण माना है.


किताबें हैं क्या ? किसी के लिए ज्ञान का भण्डार, देश-दुनिया के आश्चर्यजनक रहस्यों और महत्वपूर्ण सूचनाओं का संग्रह, किसी की लिए मानसिक तनाव को दूर करने और मनोरंजन का साधन और किसी के लिए अकेलेपन का साथी और एक सच्चा दोस्त। किताबें दुनिया भर की जानकारियाँ अपने पन्नों में समेटे कभी शिक्षक बन जाती है, कभी पिता के रूप में कहानियां कहकर अच्छे -बुरे का भेद करना सिखाती है, वास्तविक दुनिया से हमारा परिचय कराती है और कभी हमारी भावनात्मक और बौद्धिक जरूरतों को पूरा कर एक माता की भी भूमिका निभाती है. दूसरों के विचारों से अवगत करा हमारी कल्पनाशीलता में नए पंख लगाती है, हमारी सोच में विस्तार करती है. निसंदेह मानसिक स्तर पर हमें और अधिक परिपक्व बनाकर एक बेहतर इंसान बनाने का बेहतरीन माध्यम हैं किताबें। फिर क्यों न, किताबों से दोस्ती कर ली जाए ?

अधिक-से-अधिक लोगों को किताबों से जोड़ने और पढ़ने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से २३ अप्रैल को . यूनेस्को(यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल, साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गनाइजेशन) द्वारा हरेक वर्ष विश्व पुस्तक दिवस दुनिया भर में मनाया जाता है. भारत में भी केन्द्रीय संस्थानों, पुस्तकालयों, विद्यालयों और दूसरे शैक्षणिक संस्थानों के द्वारा विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को अध्ययन के प्रति जागरूक करने की दिशा में प्रयास किये जाते हैं. अलग-अलग शहरों में आयोजित किये जाने वाले पुस्तक मेलों का उद्देश्य भी किताबों के प्रति लोगों की रूचि बढ़ाना ही है. हर आयु वर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर लाखों की संख्या में पुस्तकें प्रदर्शन के लिए रखी जाती है। कहानियाँ, कवितायेँ, नाटक, उपन्यास, व्यंग्य, चित्रों वाली किताबें हों अथवा ज्ञान-विज्ञान के अद्भुत संसार से परिचय कराती किताबें, हर विषय पर किताबें लिखी जाती हैं, बस जरूरत है, अपनी पसंद के हिसाब से किसी किताब के चुनने का.

उल्लेखनीय है, किसी भी व्यक्ति के लिए अपनी इच्छानुसार हर पुस्तक खरीद पाना संभव नहीं है. इस समस्या का आसान- सा समाधान है, पुस्तकालय। पुस्तकालय का सदस्य बन कर वहां संग्रहित पुस्तकों, फ़िल्मों, पत्रपत्रिकाओं, मानचित्र, हस्तलिखित ग्रंथ, ग्रामोफोन रेकार्ड, ई-बुक्स एवं अन्य पठनीय सामग्रियों का लाभ उठाया जा सकता है. पर क्या सचमुच पुस्तक पढ़ने की चाह रखने वालों के लिए हम उनकी इच्छा पूरी कर पाने में सक्षम हैं? गौरतलब है, सूचनाओं को अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँचाने की दिशा में कार्यरत अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ लाइब्रेरी एसोसिएशन एंड इंस्टीच्यूशन द्वारा तय पैमाने के मुताबिक हर ३००० की जनसँख्या पर एक सार्वजानिक पुस्तकालय होनी चाहिए। इस लिहाज से भारत की कुल जनसँख्या के हिसाब से यहाँ तक़रीबन ४ लाख सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता है जबकि लगभग ६०००० ही पुस्तकालयों का होना निराशा जगाता है. विद्यालयों खासकर सरकारी विद्यालयों में पुस्तकालयों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. बहुधा पुस्तकालय जैसी कोई व्यवस्था रहती नहीं हैं, और अगर रहती भी है तो कहीं कोने में पड़ी एक छोटी- सी अलमारी में कुछ किताबें 'पुस्तकें अनमोल धरोहर हैं' की तर्ज़ पर बंद रखी जाती हैं. विडम्बना यह कि मेरी प्रिय पुस्तक, मेरे प्रिय लेखक या पुस्तकालय का महत्व जैसे विषयों पर लेख बच्चे निबंध की किताबों से रट्टा मारकर हर साल परीक्षाओं मे लिख आते हैं. कक्षा में बैठाकर और टेक्स्टबुक रटाकर शिक्षा के असली मकसद को प्राप्त करना असंभव है। किताबें पढ़ने से शब्द ज्ञान और विश्लेषण क्षमता में विस्तार तो होगा ही साथ ही पढ़ने की क्रिया को और भी रोचक बनाया जा सकता है.

किताबों की उपलब्धता हरेक के लिए आसान और सुनिश्चित करने के लिए पुस्तकालयों के निर्माण को हमारी प्राथमिकताओं में शामिल करना होगा। चुनौती न केवल ज्यादा संख्या में पुस्तकालयों को बनाने की है वरन पुस्तकालयों का अधिक-से-अधिक किताबों और अन्य सामग्रियों से समृद्ध और लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सकने में सक्षम होना भी जरूरी है. इसी मद्देनजर सन १९७२ में भारत के सांस्कृतिक विभाग द्वारा राजा राममोहन रॉय फॉउंडेशन की स्थापना की गयी. इसके अलावा भारत सरकार ने पुस्‍तकालय सेक्‍टर के विकास के लिए लम्‍बी अवधि की योजनाएं और रणनीतियां तैयार करने के लिये सन २०१२ में एक उच्‍च स्‍तरीय समिति 'राष्‍ट्रीय पुस्‍तकालय मिशन'(NML) का भी गठन किया है जिसका उद्देश्‍य राष्‍ट्रीय भारतीय वर्चुअल पुस्‍तकालय की स्‍थापना, मॉडल पुस्‍तकालयों की स्‍थापना, पुस्‍तकालयों का गुणात्‍मक / मात्रात्‍मक सर्वेक्षण तथा क्षमता निर्माण करना है। एशिया के सबसे बड़े साहित्यिक उत्‍सव-जयपुर साहित्‍य उत्‍सव का प्रत्‍येक वर्ष जनवरी माह में जयपुर में आयोजित किया जाना भी पुस्तकों को लेकर लोगों को जागरूक बनाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है. इस सम्बन्ध में पुस्तकालय अधिनियम लागू करना भी उल्लेखनीय है जिसके तहत राज्य सरकार की सभी शिक्षण संस्थानों चाहे सरकारी हो या गैर-सरकारी, प्राथमिक विद्यालय से लेकर उच्च-शिक्षा तक के संस्थानों में पुस्तकालय का होना अनिवार्य कर दिया गया है. हालांकि अभी भी भारत के केवल १९ राज्यों में ही पुस्तकालय अधिनियम पारित किया जा सका है और उसपर भी कुछ राज्यों में यह अधिनियम अभी कुछ साल पहले ही लागू किया गया है. आशा है, जल्द-से -जल्द यह व्यवस्था देश के अन्य राज्यों में भी लागू कर दी जायेगी।

बाल किताबों को प्रकाशित करने वाली संस्था, प्रथम बुक्स का 'हर बच्चे के हाथ में किताब' योजना के तहत भारत की विभिन्न भाषाओँ में किताबें प्रकशित कर कम कीमत तक बच्चों तक पहुंचाने की कोशिश सराहनीय है. ' डोनेट अ बुक' या 'मिस्ड कॉल दो और कहानी सुनो ' जैसे कैम्पेन बच्चों में पढ़ने की आदत डालने के मकसद से चलायी गयी है. ऐसे कई एनजीओ हैं जो गांवों में बच्चों को शिक्षित करने के कार्य में लगे हुए हैं और कई पुस्तकालय इन ट्रस्ट व संगठनों द्वारा सुदूर इलाकों में चलाए जा रहे हैं.

कहा जा सकता है, ज्ञान आधारित समाज का निर्माण किया जाना किसी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है और इस लक्ष्य को हासिल करने का अति महत्वपूर्ण साधन है, किताबें।

Monday, 16 April 2018

शिक्षा और परीक्षा

अरसे से शिक्षा के क्षेत्र में कोई अच्छी खबर के इंतज़ार कर रहे कानों में सीबीएसई बोर्ड की परीक्षाओं से पूर्व प्रश्न पत्र लीक की खबर पड़ना अत्यंत निराशाजनक है। स्कूल की क्लासेस,एक्स्ट्रा क्लासेज, ट्यूशन, क्रैश कोर्स, अपनी इच्छाओं की कुर्बानी देकर दिन -रात एक कर परीक्षा की तैयारी में जुटे रहना  और फिर परीक्षा के रद्द होने की खबर मिलने के बाद छात्र -छात्राओं की 'काटो तो खून नहीं ' जैसी हालत होना स्वाभाविक है। व्यवस्था की विफलता से सीबीएसई बोर्ड की साख पर कई सवाल तो खड़े हो ही रहे हैं, साथ ही वर्तमान परीक्षा-व्यवस्था भी पुनः कठघरे में है. आये दिन उत्तर पुस्तिकाओं के बीच चिपके  १०,२० या ५० रुपये के नोट को लेकर शिक्षकों द्वारा बच्चों के परीक्षा के अंक बढ़ा कर मदद कर देना या बिना पूरी उत्तरपुस्तिका को पढ़े अंदाजन अंक बिठा देने के कारनामे  अथवा सिफारिश, कुछ पैसों के लालच में अथवा जान-पहचान के नाम पर अंक बढ़ा देने की मेहरबानियों की खबरों से लेकर सारे नियम- कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए परीक्षा-केंद्रों पर  धड़ल्ले से होती नक़ल, पर्चों का परीक्षा के पूर्व ही लोगों के हाथों में हाजिर होने जैसी घटनाएँ योग्यता मापने के इस तरीके पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता जताती है. इन घटनाओं पर नकेल कसने की सरकार द्वारा की गयी तमाम कोशिशें भी इन्हे पूरी तरह रोकने में असफल ही साबित हो रही हैं. ऐसे में, सीबीएसई के वरिष्ठ अधिकारी का शिक्षा के क्षेत्र में माफियाओं की जड़े कोल माइनिंग इंडस्ट्री से भी ज्यादा गहरी होने की बात स्वीकारना सरकार द्वारा भविष्य में ऐसी घटनाओं के घटित न होने के आश्वासन पर क्या विश्वास किया जा सकता है? संभव है, हालिया घटित प्रश्नपत्र के लीक का मामला सुलझ भी गया हो, संलिप्त अपराधी पकड़े भी गए हों, पर क्या  भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगा पाना संभव है, जबकि परीक्षा के संचालन का जिम्मा संभाले लोग ही ऐसे कदाचारों में शामिल पाए जाते हैं? 


अब सबसे अहम् सवाल यह है कि क्या वजहें होती हैं, परीक्षा में नक़ल की, प्रश्न पत्र के लीक की ?जाहिर सी बात है, विषय को सीखकर उससे संतुष्टि पाने से ज्यादा परीक्षा में सफल होने और अधिक -से -अधिक अंक हासिल करने की अभिलाषा ही इसके कारण हैं. कागज़ पर लिखे नंबर ही बाकियों से श्रेष्ठ अथवा कमतर समझे जाने  के प्रमाणपत्र बन गए हैं. माता-पिता की ऊँची उम्मीदों पर खरा उतरने का दवाब और साथ ही विद्यालय की साख  जैसे भी कुछ अन्य कारण हैं, जिसके परिणामस्वरूप येन केन प्रकारेण अच्छे नंबर लाने केलिए विद्यार्थी किसी भी हद तक जाने को तैयार होते हैं, चाहे रास्ता अनैतिक और गैरकानूनी ही क्यों न हो.
विडम्बना यह है कि सजा वो भुगतते हैं जो इस व्यवस्था में भागीदार नहीं हो पाते. कम अंक मिलने की स्थिति में, एक-एक अंक से अपने मनपसंद विषयों के न मिलने या कॉलेजों में प्रवेश की जद्दोजहद में बच्चे मानसिक अवसाद के शिकार होते हैं और कभी -कभी आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठाने पर मजबूर. छोटी उम्र में मात्र एक परीक्षा में मिले अंक का भविष्य का आधार मान लेना क्या हमारी मूर्खता नहीं है? जबकि, ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है जिसमें शुरूआती असफलता के बावजूद लोगों ने जीवन में कामयाबी पाई है, एक मुकाम हासिल किया है. सीखने-सिखाने पर आधारित व्यवस्था से कोसों दूर नंबर की होड़, शिक्षण संस्थानों के झूठे आडम्बर और गलाकांट प्रतिस्पर्धा ही शिक्षा की आधुनिक परिभाषा बन गयी है और भारतीय शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे 'भारतीय परीक्षा व्यवस्था' में तब्दील हो गयी है और साथ में शिक्षा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट देखी जा रही है, शिक्षा का स्तर बद से बदतर होता जा रहा है।

परीक्षा के दौरान तनावमुक्त और प्रसन्न रहने की जरूरत पर हाल ही में देश के प्रधानमंत्री का बच्चों के साथ संवाद एक अच्छा प्रयास है पर क्या यह ज्यादा उचित न होगा कि हम समस्या की जड़ को समझें और वहीँ से व्यवस्था में सुधार की कोशिश करें. ज्यादा से ज्यादा अंक अर्जित करने की प्रेरणा देने वाली शिक्षा से इतर एक ऐसी प्रणाली के बारे में सोचा जाए जो बच्चों में सीखने की ललक को ताउम्र बरक़रार रख सके. एक अदद नौकरी प्राप्ति की लालसा  पाले एक इंसान की जगह आत्मविश्वास से लबरेज, अपने बलबूते कुछ हासिल करने का हौसला रखने वाला, उद्यमी, चरित्रवान एवं जागरूक व्यक्ति का निर्माण कर सकने में सक्षम हो .
शिक्षण के तरीकों में सुधार, अच्छे शिक्षकों की बहाली और साथ में परीक्षा के तरीकों पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है. सीबीएसई बोर्ड द्वारा बच्चों के मूल्याङ्कन की दृष्टि से शुरू किये गए 'सतत एवं व्यापक मूल्यांकन' (continuous and comprehensive evaluation )पद्धति पर पुनर्विचार कर इस तरह से लागू किये जाने  की जरूरत है जिससे इसके वास्तविक उद्देश्यों को पूरा किया जा सके. हरेक बच्चे को उसकी गति और क्षमता के हिसाब से ही प्रशिक्षित किये जाने की बात हो या बच्चे की परीक्षा तभी ली जाए जब बच्चा तैयार हो या फिर विद्यालय के भयमुक्त वातावरण की निर्माण की बात हो, जैसे कई उद्देश्यों वाली इस मूल्यांकन पद्धति को  सफलतापूर्वक लागू कर शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाने की परीक्षा अब हमारी है.