Wednesday, 16 October 2019

बिक्सू : बाल मनोभावों को खूबसूरती से चित्रित करती एक कहानी

 
बिक्सू किताब के बारे में पढ़ते ही मैंने तुरंत ही मंगवाने का निर्णय लिया इसके दो मुख्य वजहें थी पहली, इस किताब के साथ इकतारा संस्था का नाम जुड़ा होना और दूसरी, किताब का छोटानागपुरी बोली में लिखा होना। इकतारा द्वारा प्रकाशित 'चकमक' बाल पत्रिका करीबन दो सालों से मेरे घर आ रही है और इसमें छपे कई आलेख बचकाना न होने की वजह से मुझे आश्चर्यचकित करते रहे हैं बाल साहित्य के नाम पर बच्चों को नासमझ समझ बेसिर-पैर की रचनाओं के विपरीत अर्थपूर्ण रचनायें इस बाल पत्रिका को अन्य मैगज़ीनों से अलग और बेहतर बनाती हैं मेरी जिज्ञासा इस संस्था द्वारा प्रकाशित किताब को लेकर बढ़नी ही थी दूसरी  वजह मेरे स्वयं के बिहार से होने से संबंधित है छोटानागपुरी बोली में किताब? एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ, ऐसी बोली जिसे भूलने के लिए हम कितने जतन करते हैं, उस भाषा में किताब? किताब के अंत में किताब में प्रयुक्त कुछ कठिन शब्दों के अर्थ भी पाठकों की सुविधा के लिए दे दिए गए हैं
 किताब ज़ल्दी ही आ गयी हाथों में  कुछ अंदाज़ा था, क्या है बिक्सू मेंपर, इसे मात्र सामान्य कहानी की किताब नहीं मान सकते मधुबनी शैली में बने बड़े ही ख़ूबसूरत चित्रों से सजा है हर पन्ना और यह इस किताब को लोकप्रिय बनाने के कई कारणों में एक मुख्य कारण निसंदेह है १२१ -पृष्ठों की इस किताब का मुख्य किरदार है, बिक्सूऔर, उसके साथ-साथ और भी कई चीजें हैं, जैसे बिक्सू का छात्रावास है, विद्यालय है, वहां के नियम -कानून हैं, गाँव सेन्हा है, गाँव का इतिहास है, परिवार है, उसके दोस्त हैं, घुड़मुड़िया सर हैं, फादर चोन्हास की बातें हैं, बोर्ड परीक्षा का भूत है, रूमानी ख्याल भी हैं, फुटबॉल है, उसकी गंध है और यादें हैं..... घर - परिवार, गांव-खेत, गलियां -सड़कें  और हॉस्टल के ढेर सारे किस्सों से सजा है बिक्सू ! यादों के साथ हँसता -रोता, प्रशंसा और डांट के मध्य प्यार ढूंढता, नए अनुभवों पर अचंभित होता, छोटे बच्चों पर रौब झाड़ता बिक्सू हमें भी अपनी पुरानी यादों के समंदर में गोते लगाने का एक मौका देता है
ऐसे ही तो एक कहानी याद आई, हाई स्कूल की।  'रामायणी सर ' थे तो भूगोल के शिक्षक पर उनकी कक्षाओं में हम राजाओं, परियों और चुड़ैलों की दुनिया में खोये रहतेपढ़ाने से ज्यादा उन्हें कहानियाँ सुनाने और हमें पढ़ने से ज्यादा उनसे कहानियां सुनने में मज़ा आताकहानियां सुनाने का उनका तरीका था भी लाजवाब हाँ, रामायणी सर नाम दिए जाने का उनका किस्सा 'घुड़मुड़िया सर' के नाम पड़ने जितना रोचक नहीं कह सकते। कारण बस इतना था, रामचरितमानस की चौपाइयों के कंठस्थ कर लिए जाने के कारण वे 'रामायणी सर' के नाम से पुकारे जाते थे। 
ऐसी ही कई छोटी-बड़ी, खट्टी- मीठी, मन के कोने में कहीं दबी यादों से रूबरू होना, बिक्सू को पढ़ना है..
'बिक्सू' किताब विकास कुमार विद्यार्थी द्वारा अपने आवासीय विद्यालय में दाखिले, वहां के माहौल के साथ सामंजस्य , दैनिक क्रियाकलाप आदि का उल्लेख करते हुए लिखे हुए ३५ पृष्ठों के पत्र पर आधारित है उन भावनाओं को एक ग्राफिक नॉवेल के रूप में पाठकों तक पहुंचाया है, उनकी बहन और मीडिया आर्टिस्ट राजकुमारी  और बॉलीवुड के जाने- माने पटकथा लेखक और स्टैंड अप कॉमेडियन वरुण ग्रोवर ने पति-पत्नी की इस जोड़ी ने मधुबनी शैली में बनाये गए चित्रों और खूबसूरत संवादों के माध्यम से बिक्सू के मनोभावों को बखूबी उभारा है
यक़ीनन हम सब किसी-न-किसी बिक्सू को जानते होंगे, या तो खुद गुजरे होंगे या फिर कहानियां सुनी होंगी किसी बच्ची की हॉस्टल से लिखी चिट्ठी पढ़ी होगी जिसमें उसने अपने माता-पिता को टूटे-फूटे शब्दों में लिखा होगा कुछ ऐसा,'  अब मैं आपलोगों को ज्यादा याद नहीं करती। कभी-कभी जब नींद नहीं आने लगती है तब या फिर खाना अच्छा नहीं लगता तब।पर जब कोई एक भी रोता है न हॉस्टल में तब  कुछ और लोग रोने लग जाते हैं और फिर मैं भी बहुत रोती हूँ।' या फिर किसी बच्ची ने 'मम्मी की याद आती है' के जवाब में कहा होगा, "डॉ अंकल  ने मुझे ऐसा इंजेक्शन दिया है जिससे मम्मी की याद नहीं आती" नए माहौल में अपने आप को ढालने के भिन्न -भिन्न तरीके. बिक्सू भी जुगत लगाता है, कभी गांव की यादों से बाहर निकल अपनी ज़िन्दगी को सामान्य तरीके से जीने के लिए या फिर परीक्षा के भूत से छुटकारा पाने के लिए विद्यालय के पहले दिन से लेकर हॉस्टल छोड़ने तक की ज़िन्दगी, ५ वर्षों में एक छोटे और डरे- सहमे बच्चे से किशोरावस्था में पहुँचनाइस यात्रा का  हरेक मोड़ जाना -पहचाना लगता है, उससे स्वयं गुजरे होने के कारण या फिर वर्तमान में गुजरते रहने के कारण, अन्यथा किसी अन्य का उदहारण आँखों के सामने होता है यह कहानी अपनी-सी लगती है.
'याद' भी गजबे चीज है  चाहे अच्छा बात रहे कि बुरा घटना लेकिन बाद में उसका याद भी मीठे लगता है- अंत में लिखी यह पंक्ति से असहमति होती है, यह सोचकर कि कई अपने बचपन की बुरी यादों की गिरफ्त से बाहर निकलने की कोशिश में लगे रहते हैं यादें कभी- कभी गुदगुदाती नहीं,परेशानी का सबब होती हैं खैर, एक हैप्पी नोट पे  कहानी खत्म होती है और बिक्सू अपनी उन यादों को सहेज कर रख लेता है 
एक बच्चे के मनोभावों को उभारना निश्चित रूप से एक बेहद कठिन काम हैबचपन की छोटी-छोटी घटनाओं, खुशियों, तकलीफों का चुनाव और फिर उसे संवादों और चित्रों द्वारा दर्शाना और भी मुश्किल इस लिहाज़ से बिक्सू का हर पन्ना अविश्वसनीय प्रतीत होता है।चाहे दादा-पोते के बीच वार्तालाप हो या फिर स्कूल छोड़ कर जाते वक्त बिक्सू का पेड़ से मिलना! निसंदेह, बच्चों के ख़ुशी और दुख के मायनों को बारीकी से समझने का एक अवसर देता है बिक्सू

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