Wednesday, 5 February 2020

कुछ विज्ञान की बातें: राइबोसोम १



कोशिका, जीन्स, डी एन ए , प्रोटीन, एमिनो एसिड, राइबोसोम इत्यादि शब्दों से विज्ञान से सीधे-सीधे वास्ता न रखने वाले भी अनजान नहीं हैं। इस क्षेत्र में हुई कोई भी खोज़ हमारी ज़िन्दगी को किस कदर प्रभावित कर सकती है, इसका अंदाज़ा यक़ीनन सबको ही है। ऐसा ही एक शब्द 'राइबोसोम ' अभी कुछ वर्षों से चर्चा में है। कोशिकाओं के अंदर प्रोटीन के निर्माण करने वाले राइबोसोम के बारे में हाल के वर्षों में कुछ जानकारियाँ  हासिल हुई हैं । मानव शरीर या यूँ कहें कि किसी भी जीव(बैक्टीरिया, आर्किया और यूकैरियट्स) की आंतरिक संरचना और कार्यप्रणाली को समझ पाने में यह बड़ी सफलता है।
थोड़ा सरल ढंग से इसे यूँ समझा जा सकता है, जैसा कि हमें पता है, प्रोटीन हमारे शरीर के बिल्डिंग बॉक्स या निर्माण घटक है और ये प्रोटीन शरीर में मौजूद २० तरह के एमिनो एसिड के आपसी मेल से बने होते हैं। उदहारण के तौर पर, प्रोटीन को एक वाक्य की तरह समझा जा सकता है और एमिनो एसिड को उस वाक्य में प्रयुक्त अक्षरों की तरह। अब सवाल ये है की ये प्रोटीन बनते कहाँ और कैसे हैं? यहाँ डीएनए की भूमिका समझ में आती है। हमारे शरीर की हर कोशिका में मौजूद DNA में शरीर निर्माण सम्बन्धी निर्देश समाहित हैं। इन निर्देशों के मुताबिक ही, हर एक प्राणी के उसकी जरूरतों के हिसाब से शरीर के अंदर प्रोटीन बनने की अनवरत प्रक्रिया चलती रहती है। भिन्न -भिन्न आकार के और और अलग अलग कार्यों को अंजाम देने वाले प्रोटीन हमारे शरीर के अंदर निरंतर बनते रहते हैं।और, इन प्रोटीन श्रृंखलाओं का स्वतः ही एक आकार धारण कर लेना एक आश्चर्य से कम नहीं लगता ,कभी स्किन टिश्यू में कोलेजन का, हिमोग्लोबिन का या फिर प्रकाश के बोध के लिए रेटिना के अंदर स्थित रोडोप्सीन पिग्मेंट का इत्यादि। ये महज छोटे-छोटे उदहारण हैं, हजारों की संख्या में भिन्न भिन्न तरह की प्रोटीन श्रृंखलाएं हमारे शरीर का हिस्सा हैं।
यह प्रोटीन संश्लेषण नामक प्रक्रिया (एमिनोएसिड से प्रोटीन का निर्माण ) जहाँ घटित हो रही है, उसे ही हम राइबोसोम के नाम से जानते हैं। आकार में केवल 20 नैनो मीटर बड़े ये राइबोसोम शरीर की हर कोशिका में मौजूद है और निरंतर हमारे शरीर में जीनों की कोड भाषा पढ़कर उसके निर्देशों के अनुसार प्रोटीन निर्माण में जुडी है। .राइबोसोम की खोज १९५० के दशक में रोमानिया के वैज्ञानिक जॉर्ज पेलेड ने की थी, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया था। वर्तमान में भी इन अति सूक्ष्म मशीनों पर काफी शोध और अनुसंधान किये जा रहे हैं।
निःसंदेह प्रोटीन बनने की इस प्रक्रिया में कई अन्य तथ्यों का जुड़ाव इसे एक बेहद जटिल प्रक्रिया की श्रेणी में खड़ा करता है, जैसेmRNA या संदेशवाहक RNA, tRNA ट्रांसफर RNA या फिर 30s और 70s इत्यादि। शायद सबको पता भी है, अभी कुछ वर्ष पहले राइबोसोम की संरचना एवं कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी के रूप में हमें एक बड़ी उपलधि हासिल हुई और इसी उपलब्धि के लिए सन २००९ में भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ वेंकी रामकृष्णन, इसराइली महिला वैज्ञानिक अदा योनोथ और अमरीका के थॉमस स्टीज़ को संयुक्त रूप से नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। तीनों वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफ़ी तकनीक का उपयोग कर राइबोसोम्ज़ की कई गुनी बड़ी छवि पेश की और त्रि-आयामी चित्रों के ज़रिए दुनिया को समझाया कि किस तरह राइबोसोम अलग-अलग रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं।यक़ीनन इनकी इस उपलब्धि से भविष्य में और अधिक कारगर प्रतिजैविकों को विकसित करने में मदद मिलेगी। उदाहरणार्थ, आजकल की बहुत-सी एन्टीबायॉटिक दवाईयां  बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया के राइबोसोम को निशाना बना कर उन्हें इस तरह बांध देती हैं कि वे अपना काम कर ही नहीं पाते और वे स्वतः खत्म हो जाते हैं।
राइबोसोम के बारे में विस्तार से अभी हाल ही में नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ वेंकी रामकृष्णन द्वारा मुंबई के टीआईएफआर कैंपस स्थित होमी जहांगीर भाभा सभागार में दिए गए व्याख्यान 'माई एडवेंचर्स इन द राइबोसोम्स' में सुनने को मिला। यहाँ बता दें, TNQ द्वारा डिस्टिंगिशड लेक्चर ऑफ़ लाइफ साइंसेज के १०वीं संस्करण के मुख्य वक्ता के रूप में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक डॉ वेंकी रामकृष्णन आमंत्रित किये गए थे और यह  कार्यक्रम भारत के चार शहरों (बैंगलोर, मुंबई, चेन्नई और नयी दिल्ली ) में आयोजित किया गया था.
अगली पोस्ट में उनके द्वारा दिए गए व्याख्यान के बारे में थोड़ा जानेंगे।

1 comment:

  1. Your writing and knowledge in different fields are inspirational.

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