Friday, 7 February 2020

ज्ञान-विज्ञान और जीवन-दर्शन से सजा व्याख्यान

गतांक  से आगे 
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डॉ वेंकी रामकृष्णन को सुनने आये विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों और आम  लोगों की भीड़ देखकर एक सुखद अहसास हुआ कि केवल राजनीतिज्ञ या बॉलीवुड के नायक-नायिका ही भीड़ खींचने में समर्थ नहीं! तक़रीबन महीने भर पहले से ही लोगों ने उन्हें देखने- सुनने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा रखा था।विषय निश्चित रूप से उतना सरल नहीं था, थोड़ी बहुत समझ इस क्षेत्र की जरूरी थी। हालांकि अपने भाषण को यथासंभव सरल रख और साथ ही राइबोसोम के समानान्तर अपने जीवन से सम्बंधित खट्टे -मीठे अनुभवों आदि का समायोजन कर श्रोताओं को अपने भाषण से जुड़े रहने को मजबूर रखा। विज्ञान और रिसर्च जगत से जुड़े कई पहलूओं जिससे आम आदमी का वास्ता न के बराबर है या फिर इस क्षेत्र में कैरियर बनाने के उत्सुक लोगों के लिए कई महत्पूर्ण जानकीरियां इस भाषण के दौरान मिलीं।

डॉ वेंकी रामकृष्णन की जिंदगी के कुछ महत्वपूर्ण किस्से, राइबोसोम के अनुसंधान और पुरस्कार की संक्षिप्त चर्चा अपने अनूठे अंदाज में कर टीआईएफआर के निदेशक और भारत के जाने-माने स्ट्रिंग थियोरिस्ट डॉ संदीप त्रिवेदी ने श्रोताओं से उनका परिचय कराने की जिम्मेवारी निभाई। साथ ही, उन्होंने मजाकिया अंदाज में यह कहकर कि "शायद कंडेंस्ड मैटर फिजिक्स इतना कठिन हो गया कि  डॉ वेंकी रामकृष्णन इस क्षेत्र को  छोड़ राइबोसोम के अनुसंधान में लग गए," उनके भौतिकी को छोड़ जीव विज्ञान के क्षेत्र में मुड़ने के कारण बताने को बाध्य किया। ज्ञात्वय है, डॉ वेंकी रामकृष्णन ने पी एच डी भौतिकी में की, रिसर्च के लिए उन्होंने जीव विज्ञान विषय को आधार बनाया और नोबेल प्राइज उन्हें रसायन शास्त्र विषय में मिला! निश्चित रूप से यह अजीब-सा संयोग है।और, अपने भाषण के दौरान डॉ वेंकी रामकृष्णन ने इस पर भी चर्चा की।  सबसे पहले, उन्होंने बेहिचक स्वीकार किया उन्हें  फेल्ड फिजिसिस्ट या असफल भौतिकशास्त्री की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
आगे विस्तार से उन्होंने बताया कि उनके भौतिकी छोड़ने के पीछे यह कारण भी महत्वपूर्ण रहा कि  ७० के दशक में भौतिकी के क्षेत्र में कोई खास उपलब्धि नहीं हो रही थी जबकि नेचर, साइंटिफिक अमेरिकन आदि जर्नल्स के लगभग  हर अंक में बायोलॉजी में हो रहे नए नयी खोजों पर लेख छप रहे थे। उन्हें लगा कि यदि वे भौतिकी विषय के साथ बने रहते तो जिंदगी भर उबाऊ गणनानों में ही लगे रहेंगे। जैसे, उन्होंने बताया कि उन दिनों हाइड्रोजन सुपरकंडक्टिविटी की खोज हुई थी और अभी ४० सालों बाद भी कुछ नया हासिल नहीं हो सका है। साथ ही, xkcd.com में छपे एक चर्चित कार्टून का जिक्र कर अलग -अलग विषयों के जानकारों द्वारा अपने-अपने विषय को दूसरे विषयों से सर्वश्रेष्ठ घोषित करने की प्रवृति पर तंज भी कसा और चुटीले अंदाज़ में यह कह कर कि  "स्ट्रिंग थियोरिस्ट वना टू बी मैथेमैटिशियन ", इस क्षेत्र की एक विशेष प्रवृति को उजागर किया।
उन्होंने बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया कि भौतिकशास्त्र में पीएचडी की पढाई के दौरान उनकी एक ही उपलब्धि रही, उनकी अपनी भावी पत्नी से मुलाकात और शादी!

अपने इस निर्णय  के तहत कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में बायोलॉजी पढ़ने तो गए पर राह आसान नहीं थी।  नया विषय, नए नये शब्द समझने की चुनातियाँ थीं, जैसे लैम्ब्डा (Lambda ) जहाँ भौतिकी में तरंगदैर्ध्य है वहीँ जीव विज्ञान में विषाणु! उन्ही दिनों साइंटिफिक अमेरिकन में छपे  राइबोसोम के बारे में आलेख पढ़कर उसकी तरफ आकृष्ट हुए और इस क्षेत्र में ही रिसर्च करने में लग गए.  इस क्रम में, उन्हें बेहतर अवसर को देखते हुए  कई दफ़ा एक स्थान से दूसरे स्थान बसने का निर्णय लेना पड़ा. उन्होंने अपनी पत्नी से मिले हर कदम और निर्णय में सहयोग की भी बात कही,  चाहे अपने ६ महीने के बच्चे के साथ USA से लंदन जाकर बसने की बात हो या फिर आधी तनख्वाह पर किसी रिसर्च में जुड़ने पर हामी भरने की। कई  महान वैज्ञानिकों के साथ काम करने अनुभवों को भी साझा किया। राइबोसोम के इतिहास को बताते हुए प्रसिद्ध बायोलॉजिस्ट फ्रांसिस क्रीक का एक वीडियो भी साझा किया जिसमे वे राइबोसोम को लेकर कुछ भविष्यवाणियां करते दिख रहे थे. उनकी कई अवधारणाएं सही भी हुयी और कई गलत भी। रिसर्च के दिनों से नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने तक अन्य कई वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों से मिले सहयोग की भी चर्चा की और यह भी कहा कि विज्ञान का क्षेत्र बहुआयामी है, अकेले किसी के द्वारा कोई भी खोज कर पाना असंभव है।और, यह भी सही है कि श्रेय गिने-चुने लोगों को ही मिल पाता है। अन्य क्षेत्रों की तरह विज्ञान का क्षेत्र भी  आपसी प्रतिस्पर्धा जैसी बुराइयों से अछूता नहीं। राइबोसोम की संरचना के रिसर्च के क्षेत्र में काम में लगे ४ लैब्स के मध्य आपसी प्रतिस्पर्धा का भी जिक्र किया। पर यह भी कहा, जहाँ प्रतिस्पर्धा थी वहीँ काम करने की प्रेरणा भी।
स्ट्रक्चरल बायोलॉजिस्ट डॉ  रामकृष्णन, प्राथमिक शिक्षण के स्तर  से ही का पुरस्कारों का लालच देने के चलन से खुश नहीं दिखे। उनके अनुसार इससे अधिक महत्व चीजों को समझने और कुछ नया ढूंढने से मिलने वाले आनंद पर दिया जाना चाहिए।

इसी तर्ज़ पर, वैज्ञानिकों के  भी 'प्री नोबेलाइटिस 'बीमारी सरीखा प्रवृति पर भी ध्यान आकृष्ट कराया. नोबेल पुरस्कार की ललक उन्हें मानसकि व्यग्रता से ग्रस्त करती है। इसके अलावा कई वैज्ञानिक पुरस्कार मिलने के उपरांत 'पोस्ट नोबेलाइटिस' के भी शिकार हो जाते हैं।पुरस्कार मिलने के उपरांत कई अन्य असम्बद्ध विषयों जैसे क्लाइमेट चेंज पर अपनी  राय देने से नहीं चुकते। इस बात को उन्होंने कई बार दोहराया कि विजेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह सम्मान उन्हें एक विशेष खोज के लिए  मिला है न कि उनके विशेष होने के लिए।

इन बातों के साथ-साथ कई ग्राफिक्स के माध्यम से उन्होंने राइबोसोम द्वारा डीएनए के रूप में लिखे आनुवंशिक कोड को समझ कर उसे न्यूक्लिक एसिड में परिवर्तित होने (ट्रांसलेशन यानी अनुवाद क्रिया) की प्रक्रिया को समझाया। साथ ही अलग-अलग अमीनों एसिड का एक- दूसरे से जुड़ कर पॉलीपेप्टाइड कड़ियों के निर्माण और m RNAकी सहायता से उन्हें सही-सही क्रमबद्ध करने की प्रक्रिया को भी बताया। राइबोसोम के दो उपभागों 30s और ७०s को भी संक्षेप में समझाया। अपने पूरे भाषण के दौरान वे अपने आप को एक महान वैज्ञानिक साबित करने को आतुर कतई नहीं दिखे जो उन्हें अन्य कई वैज्ञानिकों से अलग श्रेणी में खड़ा करता है।
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर भावी पीढ़ी के लिए कुछ जीवन-दर्शन भी साझा किया। जैसे, विकल्पों को खुले रखिये, अपने ही जिंदगी का उदहारण उन्होंने पेश किया कि कैसे भौतिकी को छोड़ वे जीव विज्ञान पढ़ने पहुंचे । दूसरों से मदद माँगने से बिलकुल न कतराएं,  कई बड़े बड़े वैज्ञानिकों द्वारा बिना हिचकिचाए आसान -से-आसान सवाल पूछते देखने का अपने अनुभव का यहाँ जिक्र किया।
तीसरा, शायद ही कोई हो जो इम्पोस्टर सिंड्रोम (अपने आपको अन्य से कमतर समझना)का शिकार नहीं होता है, खासकर अगर कोई समूह में बाहरी हैं, उस की भाषा, रहन सहन नागरिकता दूसरों से भिन्न है । इससे न  घबराने की सलाह दी।
इसके अलावा उन्होंने सफलता के लिए आवश्यक, जर्मन वैज्ञानिक पॉल एर्लिच द्वारा अक्सर कहे जाने वाले ४G 's  का उल्लेख खास तौर पर किया। ये हैं, GELD(धन ), GESCHICK(कौशल ) GEDULD(जुनून ), और GLUCK(भाग्य )।








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