Sunday, 16 February 2020

नेशनल म्यूजियम ऑफ़ इंडियन सिनेमा


 संग्रहालयों के बारे में तो हम सब जानते हैं। हाँ, वही जगह जहाँ पुरानी वस्तुएं जैसे जीवाश्म, युद्ध में प्रयोग में लिए जाने वाले हथियार या अन्य सामग्रियाँ, गहने, कंकाल, ममी अथवा पुराने सिक्के, बर्तनों, चित्रोँ  आदि  को संजो कर रखा जाता है ताकि आज हम और आगे आने वाली पीढ़ियां पूर्वजों के रहन-सहन के तरीकों और आदतों में हुए बदलावों को देख और समझ सकें।  उदहारण के तौर पर दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय, कोलकाता का भारतीय संग्रहालय, मुंबई का प्रिंस ऑफ़ वेल्स संग्रहालय एवं  हैदराबाद स्थित सालार जंग संग्रहालय, जहाँ प्रदर्शित तमाम तरह की वस्तुओं द्वारा हमारे प्राचीन इतिहास की विस्तृत झलक मिलती है

चलो, अब बात करते हैं, इसी सूची में अभी हाल ही में शामिल हुए 'नेशनल म्यूजियम ऑफ इंडियन सिनेमा' की। फ़िल्म-निर्माण के मुख्य केंद्र 'मुंबई' में भारतीय सिनेमा के एक सदी पुराने इतिहास को समेटे इस संग्रहालय का उद्घाटन गत वर्ष १९ जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया दक्षिणी मुंबई में अवस्थित 'गुलशन महल ' नामक एक ऐतिहासिक इमारत को इस संग्रहालय में परिवर्तित किया गया है कई नई -पुरानी फिल्मों और उसके निर्माण से जुड़ी तकनीकों और विभिन्न कलाकृतियों को संजोये इस संग्रहालय में भारतीय सिनेमा से जुड़े ढेरों जानकारियाँ दर्शकों को मिलती है सन १८९६ में लुमियर ब्रदर्स की ६  शॉर्ट फ़िल्मों का मुंबई के वॉटसन होटल में प्रीमियर द्वारा भारत का सिनेमा से परिचय की कहानी हो या  फिर भारतीय फ़िल्म उद्योग के पितामह दादा साहेब फाल्के द्वारा बनायी गयी पहली मूक फ़िल्म राजा हरिश्चंद्र के साथ भारत में फ़िल्म निर्माण का आगाज़ की बात या फिर इम्पीरियल फिल्म कंपनी द्वारा सन १९३१ में बनी पहली साउंड फिल्म 'आलम आरा' की दास्तान हो, फ़िल्मी दुनिया से जुड़े ये किस्से फ़िल्मों के बारे में हमारी समझ को बढ़ाने में मददग़ार हैं बाबू राव पेंटर द्वारा बनाये गए  'मदर इंडिया' फिल्म का पोस्टर, हिंदी एवं उर्दू में हाथों से लिखे फ़िल्मों के गाने या फिर आरंभिक फ़िल्मों जैसे राजा हरिश्चंद्र और कालिया मर्दन  के  कुछ दृश्यों और ऐसे ही कई अन्य दस्तावेजों को देख पाना रोचक है समय -समय पर फिल्मकारों द्वारा प्रयोग की जाने वाली वाली तकनीकों में हुए बदलावों को भी देखा-समझा जा सकता है उदाहरणार्थ एक समय फ़िल्म निर्माण के लिए अति उपयोगी प्रैक्ज़िनोस्कोप, ज़ोएट्रोप और म्यूटोस्कोप जैसे उपकरण इस संग्रहालय में दर्शनार्थ रखे गये हैं 

महात्मा गांधी की ज़िन्दगी का सिनेमा पर प्रभाव को बताने के दृष्टिकोण से इस अत्याधुनिक संग्रहालय में 'गाँधी और सिनेमा' नाम का एक पृथक हॉल बनाया गया है इसी तरह एक अन्य हॉल चिल्ड्रेन्स फिल्म स्टूडियो है, जो कि बच्चों पर केंद्रित है. साथ ही, भारतीय सिनेमा के १०० वर्षों से अधिक की यात्रा को एक सूत्र में पिरो कर एक कहानी की भांति दर्शकों के समक्ष पेश किया गया है । इस पूरी गाथा को दिखाने के लिये दृश्य, शिल्प, ग्राफिक्स और मल्टीमीडिया की सहायता ली गयी है यक़ीनन यहाँ फिल्म निर्माण के पीछे के विज्ञान, कला और तकनीक के बारे में अहम् जानकारी मिलती है। संक्षेप में, मूक फिल्मों से लेकर पहली बोलती फिल्म, रंगीन फिल्मों के निर्माण और फिर लार्ज फॉर्मेट वाली फिल्मों से लेकर ३ डी फिल्मों तक के सफ़र का अनुभव कराता यह संग्रहालय  निसंकोच फ़िल्म से जुड़े लोगों, विद्यार्थियों और सिनेप्रेमियों के लिए अनोखा उपहार है  



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