Wednesday, 16 October 2019

बिक्सू : बाल मनोभावों को खूबसूरती से चित्रित करती एक कहानी

 
बिक्सू किताब के बारे में पढ़ते ही मैंने तुरंत ही मंगवाने का निर्णय लिया। इसके दो मुख्य वजहें थी। पहली, इस किताब के साथ इकतारा संस्था का नाम जुड़ा होना और दूसरी, किताब का छोटानागपुरी बोली में लिखा होना। इकतारा द्वारा प्रकाशित 'चकमक' बाल पत्रिका करीबन दो सालों से मेरे घर आ रही है और इसमें छपे कई आलेख बचकाना न होने की वजह से मुझे आश्चर्यचकित करते रहे हैं। बाल साहित्य के नाम पर बच्चों को नासमझ समझ बेसिर-पैर की रचनाओं के विपरीत अर्थपूर्ण रचनायें इस बाल पत्रिका को अन्य मैगज़ीनों से अलग और बेहतर बनाती हैं। मेरी जिज्ञासा इस संस्था द्वारा प्रकाशित किताब को लेकर बढ़नी ही थी। दूसरी  वजह मेरे स्वयं के बिहार से होने से संबंधित है। छोटानागपुरी बोली में किताब? एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ, ऐसी बोली जिसे भूलने के लिए हम कितने जतन करते हैं, उस भाषा में किताब? किताब के अंत में किताब में प्रयुक्त कुछ कठिन शब्दों के अर्थ भी पाठकों की सुविधा के लिए दे दिए गए हैं।
 किताब ज़ल्दी ही आ गयी हाथों में।  कुछ अंदाज़ा था, क्या है बिक्सू में।पर, इसे मात्र सामान्य कहानी की किताब नहीं मान सकते । मधुबनी शैली में बने बड़े ही ख़ूबसूरत चित्रों से सजा है हर पन्ना और यह इस किताब को लोकप्रिय बनाने के कई कारणों में एक मुख्य कारण निसंदेह है। १२१ -पृष्ठों की इस किताब का मुख्य किरदार है, बिक्सू।और, उसके साथ-साथ और भी कई चीजें हैं, जैसे बिक्सू का छात्रावास है, विद्यालय है, वहां के नियम -कानून हैं, गाँव सेन्हा है, गाँव का इतिहास है, परिवार है, उसके दोस्त हैं, घुड़मुड़िया सर हैं, फादर चोन्हास की बातें हैं, बोर्ड परीक्षा का भूत है, रूमानी ख्याल भी हैं, फुटबॉल है, उसकी गंध है और यादें हैं..... घर - परिवार, गांव-खेत, गलियां -सड़कें  और हॉस्टल के ढेर सारे किस्सों से सजा है बिक्सू ! यादों के साथ हँसता -रोता, प्रशंसा और डांट के मध्य प्यार ढूंढता, नए अनुभवों पर अचंभित होता, छोटे बच्चों पर रौब झाड़ता बिक्सू हमें भी अपनी पुरानी यादों के समंदर में गोते लगाने का एक मौका देता है।
ऐसे ही तो एक कहानी याद आई, हाई स्कूल की।  'रामायणी सर ' थे तो भूगोल के शिक्षक पर उनकी कक्षाओं में हम राजाओं, परियों और चुड़ैलों की दुनिया में खोये रहते! पढ़ाने से ज्यादा उन्हें कहानियाँ सुनाने और हमें पढ़ने से ज्यादा उनसे कहानियां सुनने में मज़ा आता। कहानियां सुनाने का उनका तरीका था भी लाजवाब। हाँ, रामायणी सर नाम दिए जाने का उनका किस्सा 'घुड़मुड़िया सर' के नाम पड़ने जितना रोचक नहीं कह सकते। कारण बस इतना था, रामचरितमानस की चौपाइयों के कंठस्थ कर लिए जाने के कारण वे 'रामायणी सर' के नाम से पुकारे जाते थे। 
ऐसी ही कई छोटी-बड़ी, खट्टी- मीठी, मन के कोने में कहीं दबी यादों से रूबरू होना, बिक्सू को पढ़ना है..
'बिक्सू' किताब विकास कुमार विद्यार्थी द्वारा अपने आवासीय विद्यालय में दाखिले, वहां के माहौल के साथ सामंजस्य , दैनिक क्रियाकलाप आदि का उल्लेख करते हुए लिखे हुए ३५ पृष्ठों के पत्र पर आधारित है। उन भावनाओं को एक ग्राफिक नॉवेल के रूप में पाठकों तक पहुंचाया है, उनकी बहन और मीडिया आर्टिस्ट राजकुमारी  और बॉलीवुड के जाने- माने पटकथा लेखक और स्टैंड अप कॉमेडियन वरुण ग्रोवर ने। पति-पत्नी की इस जोड़ी ने मधुबनी शैली में बनाये गए चित्रों और खूबसूरत संवादों के माध्यम से बिक्सू के मनोभावों को बखूबी उभारा है।
यक़ीनन हम सब किसी-न-किसी बिक्सू को जानते होंगे, या तो खुद गुजरे होंगे या फिर कहानियां सुनी होंगी। किसी बच्ची की हॉस्टल से लिखी चिट्ठी पढ़ी होगी जिसमें उसने अपने माता-पिता को टूटे-फूटे शब्दों में लिखा होगा कुछ ऐसा,'  अब मैं आपलोगों को ज्यादा याद नहीं करती। कभी-कभी जब नींद नहीं आने लगती है तब या फिर खाना अच्छा नहीं लगता तब।पर जब कोई एक भी रोता है न हॉस्टल में तब  कुछ और लोग रोने लग जाते हैं और फिर मैं भी बहुत रोती हूँ।' या फिर किसी बच्ची ने 'मम्मी की याद आती है' के जवाब में कहा होगा, "डॉ अंकल  ने मुझे ऐसा इंजेक्शन दिया है जिससे मम्मी की याद नहीं आती।" नए माहौल में अपने आप को ढालने के भिन्न -भिन्न तरीके. बिक्सू भी जुगत लगाता है, कभी गांव की यादों से बाहर निकल अपनी ज़िन्दगी को सामान्य तरीके से जीने के लिए या फिर परीक्षा के भूत से छुटकारा पाने के लिए। विद्यालय के पहले दिन से लेकर हॉस्टल छोड़ने तक की ज़िन्दगी, ५ वर्षों में एक छोटे और डरे- सहमे बच्चे से किशोरावस्था में पहुँचना,  इस यात्रा का  हरेक मोड़ जाना -पहचाना लगता है, उससे स्वयं गुजरे होने के कारण या फिर वर्तमान में गुजरते रहने के कारण, अन्यथा किसी अन्य का उदहारण आँखों के सामने होता है। यह कहानी अपनी-सी लगती है. . 
'याद' भी गजबे चीज है  चाहे अच्छा बात रहे कि बुरा घटना लेकिन बाद में उसका याद भी मीठे लगता है- अंत में लिखी यह पंक्ति से असहमति होती है, यह सोचकर कि कई अपने बचपन की बुरी यादों की गिरफ्त से बाहर निकलने की कोशिश में लगे रहते हैं। यादें कभी- कभी गुदगुदाती नहीं,परेशानी का सबब होती हैं। खैर, एक हैप्पी नोट पे  कहानी खत्म होती है और बिक्सू अपनी उन यादों को सहेज कर रख लेता है। 
एक बच्चे के मनोभावों को उभारना निश्चित रूप से एक बेहद कठिन काम है। बचपन की छोटी-छोटी घटनाओं, खुशियों, तकलीफों का चुनाव और फिर उसे संवादों और चित्रों द्वारा दर्शाना और भी मुश्किल। इस लिहाज़ से बिक्सू का हर पन्ना अविश्वसनीय प्रतीत होता है।चाहे दादा-पोते के बीच वार्तालाप हो या फिर स्कूल छोड़ कर जाते वक्त बिक्सू का पेड़ से मिलना! निसंदेह, बच्चों के ख़ुशी और दुख के मायनों को बारीकी से समझने का एक अवसर देता है बिक्सू।

Wednesday, 30 January 2019

वीकेंड ट्रिप :काशिद बीच



मुंबई से १२६ किमी दूर महाराष्ट्र के उत्तरी कोंकण क्षेत्र में अरब सागर के किनारे अवस्थित है एक छोटा सा गांव, काशिद। तक़रीबन १२०० जनसँख्या वाला यह गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता की बदौलत एक साल में इससे कहीं ज्यादा संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर खींचता होगा! इसके साफ़-सुथरे समुद्र तट, अरब सागर का फैलाव, पहाड़ियां और यहाँ मौजूद ऐतिहासिक मंदिरों और अवशेषों के बीच खासकर मुंबई और पुणे से पर्यटक सुकून का पल बिताने पहुँचते हैं. खासकर ऐसी स्थिति में जब समय की बाध्यता हो और ज्यादा भीड़-भाड़ वाली जगह जाने से बचना चाहते हों. कहने वाले इसे 'पुअर मैन्स 'गोवा भी कहते हैं, हर बजट के होटल्स और सस्ते दाम में खाने-पीने के सामानों की उपलब्धता को देखकर सही भी है. पर, यहाँ सागर के नीले स्वच्छ पानी का स्पर्श करने , चमकते सफ़ेद रेत पर खाली पैर चलने, लहरों के उतावलेपन और सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने के बाद काशिद यात्रा का निर्णय बिलकुल निराश नहीं करता। सरल शब्दों में, मात्र एक वीकेंड में ही बीच का लुत्फ़ उठाकर, बिलकुल रिफ्रेश होकर अपने काम पर लौट सकते हैं और गोवा की तरह जेब पर भारी भी नही, है न आम के आम गुठलियों के भी दाम☺

अरब सागर के 530 किमी लम्बे समुद्रतट के होने के कारण ही पर्यटकों के लिए इस राज्य में बीच के कई विकल्प उपलब्ध हैं. परन्तु दुर्भाग्यवश, जब ज्यादातर समुद्र तट हम इंसानों की बदौलत गन्दगी और कूड़े का पर्याय बन चुके हैं, ऐसे में काशिद बीच की स्वच्छता देखना एक अच्छा अनुभव रहा. यूँ ही इसे कोंकण क्षेत्र के एक बेहतरीन बीच में शुमार नहीं किया जाता!

मुंबई से काशिद सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है अथवा मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया से उपलब्ध फेरी के माध्यम से समुद्र मार्ग से अलीबाग पहुंचकर भी टैक्सी अथवा बस के द्वारा काशिद तक की यात्रा की जा सकती है . यात्रा के दरम्यान यदि तत्कालीन सडकों के निर्माण-कार्य को अगर अनदेखा करें, तब सड़क के दोनों तरफ की हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता के मद्देनजर यात्रा काफी सुखद लगती है . हाइवे की तरह सड़कें चौड़ी तो नहीं, परन्तु बुरी नहीं.

रस्ते भर कई मनभावन प्राकृतिक नजारे देखने को मिलते हैं. हरे भरे खेत हों या उड़ते पंक्षियोँ का झुण्ड या फिर अरब सागर में समाहित होती छोटी-छोटी नदियों का विस्मरणीय दृश्य ! बीच के समीप पहुंचते ही सागर तट के किनारे पंक्तिबद्ध कसुअरिना के वृक्ष, समुद्र तट की तरफ रूख करते लोगों के छोटे- बड़े झुण्ड दिखाई देने लगते हैं जो आये हैं सुकून के दो पल गुजारने अपनों के साथ. सामने ही दिखाई देता है, क्रिस्टल की तरह साफ़ नीले पानी और सफ़ेद चमकीले रेत से निर्मित एक सुरम्य दृश्य! समंदर के पानी में भींगते लोग, रेत के घरोंदे बनाते जोड़े, या फिर समन्दर के किनारे-किनारे चहलकदमी करते कोई अकेला या एक- दूसरे के हाथ पकड़े जोड़े, ख़ुशी में चीखते-भागते बच्चे और उनको पकड़ने को दौड़ते माता-पिता और  रेत पर उकेरे शब्द 'आई लव यू तृप्ति'!

कई लोगों का कहना है कि सागर तट पर वे 'ऑप्टिमिस्टिक बेस्ट' की स्थिति में होते हैं, क्या यह सबके लिये उतनी ही सही है? बीच पर मौजूद हर इंसान के चेहरे पर फैली मुस्कराहट क्या इस तथ्य को सही सिद्ध करती है?

४-५ किलोमीटर में फैला है यह समुद्र तट, बीच- बीच में पानी से अठखेलियां करते लोग, चाहे तो कोई एक छोटे से भाग को अपना प्राइवेट बीच बना लें! छोटे-छोटे पत्थर दूर पानी में फेंकने का खेल खेलना अथवा पतले सपाट से पत्थर का पानी में फ़ेंक ३-४ बार पानी में गिरते और ऊपर उछलते दूर तक जाते देखना क्या मजेदार है???

बैठ -बैठे सागर की अथाह गहराई को मापने की कोशिश या कभी ऊपर फैले नीले आसमाँ की ऊंचाई मापना, सहसा अहसास होता है, प्रकृति के समक्ष हम कितने बौने हैं?

अन्य समुद्री तटों की तुलना में भले यह एक शांत बीच लगे, पर यहाँ भी पर्यटकों के लिए बीच सम्बन्धी गतिविधियों का अच्छा खासा इंतजाम है. मसलन, सागर के किनारे घुड़सवारी, अकेले अथवा पूरे परिवार के साथ हॉर्सकार्ट पर या फिर ATV राइड को रेत पर ज़ूम कर निकालने की ख्वाहिश भी पूरी कर सकते हैं . पैरासेलिंग, जेट स्की, बनाना राइड जैसी गतिविधियों से भी यह बीच अछूता नहीं।

अगर बस तमन्ना हैमक पर लेटकर अलसाने की हो, बीच पर पर्यटकों के लिए यह भी सुविधा है।  साथ में पकोड़े, मैगी और नारियल पानी भी उपलब्ध है ! शैक के ही एक कोने में बनाये गए हैं चेंजिंग रूम जहाँ नहाने का पानी भी उपलब्ध है । और हाँ, अगर नहाने की इच्छा है पर अतिरिक्त कपडे नहीं है, तो बीच किनारे लगे बाजार से खरीददारी भी की जा सकती है।
रेत की ठंढक ,लहरों का शोर, चमकते रेत, ऊपर खुला आकाश और दहकता सूरज, पीछे शांत खड़ी पहाड़ी! एक रिलैक्सिंग वीकेंड ट्रिप के लिए और क्या चाहिए?




Wednesday, 5 December 2018

डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय, नवरत्न प्रदर्शनी :एक अनोखा अनुभव


भारत की आर्थिक राजधानी है, मुंबई। भारत की सबसे अधिक आबादी वाला यह शहर विभिन्न समाजों और संस्कृतियों के मिश्रण और बहुभाषी तथा बहुआयामी जीवन शैली के लिए भी जाना जाता है। और भारत ही क्या, वैश्विक आर्थिक स्तर पर धाक जमा लेने की वजह से ही सन २००८ में इस महानगर को 'अल्फा वर्ल्ड सिटी' का भी दर्ज़ा मिल गया है।मूल रूप से सात अलग -अलग द्वीपों में बंटा यह नगर पांच शताब्दियों के लम्बे समय में एक विशाल औद्योगिक शहर में परिवर्तित हो गया है। इस परिवर्तन की प्रक्रिया को थोड़ा और बारीकी से समझने की चाहत अगर आप में है, तब आप रूख कर सकते हैं मुंबई के भायखला स्थित 'डॉ भाऊ  दाजी लाड संग्रहालय' की तरफ। भारत के श्रेष्ठ संग्रहालयों में शामिल इस संग्रहालय में भारतीय इतिहास और विशेषतः १९वीं और २०वीं शताब्दी के मुंबई की जीवन शैली की जानकारी बखूबी मिलती है। इस संग्रहालय की स्थापना सन १८७२ में हुई थी और तब उसे 'विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय' नाम से जाना जाता था परन्तु सन १९७५ में इस संग्रहालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मुंबई के एक प्रमुख चिकित्सक, इतिहासकार और समाज सेवक के नाम पर 'डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय' कर दिया गया. यह संग्रहालय वर्षों से मुंबई की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और संभाल कर रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विशेष रूप से वर्ष २००८ में संग्रहालय के नवीनीकरण के बाद विभिन्न तरह की प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं का नियमित आयोजन इस संग्रहालय को आम लोगों के मध्य लोकप्रिय बनाने में मददगार साबित हुआ है और यह कहना गलत नहीं होगा कि यह स्थान मुंबई के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों की सूची में शामिल हो गया है। संग्रहालय ने लगातार अपने संग्रह को बढ़ाने की दिशा में भी काम किया है. गूगल की सहायता से संग्रहालय के वर्चुअल टूर की भी व्यवस्था की गई है।


पैलेडियन डिज़ाइन में बनी यह दोमंजिला इमारत जितनी बाहर से आकर्षित करती है, उतनी ही भव्य अंदर से भी है। चमकते टर्न्सटाइल से होकर एक बड़े हॉल में प्रवेश करते ही दिखाई देते हैं,सुन्दर-से अलंकृत खम्भे, छत पर स्टैंन्सिल से बनी डिज़ाइन और सबसे अहम कांच के बड़े-बड़े डब्बे में बंद कई तरह की खूबसूरत कलाकृतियां मसलन चांदी और मिट्टी के बर्तन, हाथी दांत से बनी कलाकृतियां और उनपर की गई नक्काशी, लाख से बने सामान या फिर पेंटिंग और पुराने हथियार। सीढ़ियों पर लगे रंगीन मिन्टन टाइल्स पर नजर ठिठक ही जाती है और कुछ सीढ़ियां चढ़ते ही सामने दिखाई देती है डॉ भाऊ दाजी लाड जी की एक बड़ी तस्वीर।

बढती जरूरतों और तकनीकी प्रगति के साथ नौकाओं के बदलते स्वरुप, कपड़ा मिलों, विभिन्न आवास परिसरों, पारम्परिक उद्योगों और अलग -अलग वेशभूषाओं की जानकारियाँ देते मॉडल को पहली मंजिल पर देखा जा सकता है. जैसे मुंबई के मालाबार हिल्स स्थित 'टावर ऑफ़ साइलेंस' का संग्रहालय में प्रदर्शित डायोरामा और लिखित विवरण पारसी समुदाय द्वारा अंतिम संस्कार के लिए अपनाने जाने वाली विधि की विस्तृत जानकारी देता है। मुंबई की सात द्वीपों से एक विशाल औद्योगिक शहर में बदलने की कहानी कहते पुराने मानचित्र, तस्वीरें, पांडुलिपियों और दुर्लभ किताबें यहाँ देखी जा सकती हैं। यथा १८वीं शताब्दी में जॉन हेनरी ग्रोस द्वारा वाटरकलर से बनाये गए तत्कालीन शहर के नक़्शे 'प्लान ऑफ़ बॉम्बे' या फिर सिटी ऑफ़ बॉम्बे इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट द्वारा निर्मित वर्ली उपनगर के दो मॉडल्स द्वारा इस शहर के शुरूआती गठन की प्रक्रिया को समझा जा सकता है। हेप्टेनेशिया' अर्थात 'सात द्वीपों का समूह', मुंबई शहर का अतिप्राचीन ग्रीक नाम है जिसका उल्लेख यूनानी खगोलविद और भूगोलवेत्ता टॉलेमी के लेखन में है, कुछ ऐसी ही जानकारियों और तक़रीबन ३५०० कलाकृतियां इतिहास को समझने में हमारी मदद करती है।


साथ ही, यहाँ समय -समय पर लगने वाली प्रदर्शनियाँ, विशेष कार्यक्रम तथा बच्‍चों के लिए लगी कार्यशालाएं भी लोगों द्वारा खूब पसंद की जाती हैं। पिछले महीने दिल्ली आर्ट गैलरी (DAG) के सौजन्य से संग्रहालय में 'नवरत्न -नाइन जेम्स ' नामक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। 'नवरत्न' नाम से प्रसिद्ध नौ कलाकारों की कलाकृतियों की प्रदर्शनी संग्रहालय के कमलनारायण बजाज दीर्घा में लगाई गयी थी।यहाँ बता दें, भारत सरकार द्वारा पारित ऐंटिक्विटीज ऐंड आर्ट ट्रेजर्स ऐक्ट, 1972 द्वारा भारत के नौ कलाकारों की कलाकृतियों को 'नेशनल आर्ट ट्रेजर्स' का दर्ज़ा दिया गया था. राजा रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, निकोलस रोएरिक , गगनेन्द्रनाथ टैगोर, जैमिनी रॉय, अवनीन्द्रनाथ टैगोर, नन्द लाल बोस, रवींद्रनाथ टैगोर और सैलोज मुख़र्जी जैसे दिग्गज कलाकारों के चित्रों से सजी प्रदर्शनी ने कलाकारों द्वारा प्रयोग में लाये गए भिन्न-भिन्न माध्यमों और पेंटिंग के विषयों से भी अवगत कराया।जैसा कि प्रदर्शनी के सम्बन्ध में जानकारी दी गयी थी, कलाकृतियों को देखकर बेशक महसूस किया जा सका कि कैसे पश्चिमी चित्रकला शैली से आरम्भ कर भारतीय कला शैली को एक अलग पहचान देकर उसे ऊंचाइयों तक ले जाने का बीड़ा इन कलाकारों ने उठाया था ।ये कलाकार भारतीय कला-परंपरा को भारत के अपने इतिहास और पौराणिक कथाओं के सन्दर्भ में मोड़ने से जरा भी विचलित नहीं हुए और साथ -साथ इन्हें भारतीय दर्शकों के बीच मान्य बनाने का भी काम किया।

बेशक इनमें रंगों और लकीरों का अद्भुत संयोजन तो है ही, कई दशकों के दरम्यान बने इन पेंटिंग्स के माध्यम से भिन्न -भिन्न समयों में प्रचलित भारतीय जीवन शैली के भी दर्शन कर सकना संभव हो सका । प्राकृतिक सुंदरता हो अथवा प्रकृति और इंसानों के आपसी सम्बन्ध, तत्कालीन ग्रामीण समाज एवं जीवन शैली हो या धार्मिक भावनायें हों , या फिर सामजिक और धार्मिक कुरीतियां पर प्रहार हो, माँ और बच्चे के मध्य प्यारे सम्बन्ध से लेकर भारतीय महिलाओं के वास्तवकि स्थितियों को पेंटिंग के विषय के रूप में चुना गया. इतना ही नहीं, इन पेंटिंग्स के जरिये भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के विभिन्न चरणों को भी बखूबी दर्शाया गया है। नन्द लाल बोस द्वारा बनाये गए दांडी यात्रा का चित्र या अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित भारत माता की एक खास इमेज से उत्पन जोश का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं!

राजा रवि वर्मा ने कई पौराणिक कथाओं और उनके पात्रों के जीवन को अपने कैनवास पर उतारा। सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, राधा या कृष्ण की ज्यादातर तस्वीरें राजा रवि वर्मा की कल्पनाशक्ति की ही उपज हैं। अमृता शेरगिल का अपनी पेंटिंग्स के लिए पेरिस से लौटकर अजंता के भित्तिचित्रों से ली गयी प्रेरणा यह साबित करती है कि अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंग गई। जामिनि रॉय द्वारा बाद के वर्षों में बनायी गई पेंटिंग्स पर भारतीय लोक कला और शिल्प परम्पराओं से ली गयी प्रेरणा साफ़ झलकती है। सपाट रंगों का चुनाव और किनारे पर की गयी सजावट इस बात की पुष्टि भी करती दीख रही थी।

प्रदर्शन में लगी अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाई गयी मुग़ल शैली की पेंटिंग उनके द्वारा पश्चिमी चित्रकला शैली के प्रभाव को कम कर भारतीय शैली को विकसित करने की पुरजोर कोशिश की मिशाल है. निकोलस रोयरिक के नग्गर की पहाड़ियों में १९ साल तक बसने और वहां की बनाई गए खूबसूरत पेंटिंग्स भी यही इशारा करती दिख रही थीं। हर पेंटिंग के नीचे कलाकारों से जुडी कई ऐसी जानकारियां इस प्रदर्शनी को बहुत ही रोचक बनाये हुई थी, जैसे भारतीय संविधान की प्रथम कॉपी के पन्नों में नन्द लाल बोस द्वारा हाथों से रंग भरना या फिर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन्ही के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सभाओं के पोस्टर बनाया जाना इत्यादि। इन कलाकारों द्वारा लिखी गयी और इनके बारे में लिखी कुछ किताबें भी इस प्रदर्शनी की शोभा बढ़ा रही थी। इन कलाकारों के कुछ निजी सामान और हस्तलिखित पत्र भी दर्शन के लिए रखे गए थे।
कला कालजयी होती है! सच है, आज भी ये पेंटिंग्स दशकों बाद उतनी ही प्रासंगिक हैं।


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Saturday, 3 November 2018

डिकॉय इफ़ेक्ट :क्या आपका निर्णय 'आपका' है ?



अगर आपने हाल ही में कुछ ख़रीदा है जैसे टीवी, फ्रीज़, ओवन, फ़ोन, पेन ड्राइव  या फिर किसी समाचार पत्र अथवा मैगज़ीन की सदस्यता ? खूब रिसर्च कर, जांच परख कर, कहें तो ठोक बजाकर अपने निर्णय  भले किया हो पर पर जरा सम्भलिये, क्या आपके द्वारा लिया गया निर्णय वाकई आप ही का है ? यह क्या सवाल है? पुनः सवाल को दुहरा देती हूँ. क्या सच में आपका निर्णय आपका ही है ? झटका लगा न ?
कहीं आप 'डिकॉय एफेक्ट ' के चक्कर में तो न पड़  गए ? ये क्या है? इसे एसिमेट्रिक डोमिनेन्स इफ़ेक्ट भी कहा जाता है, ऐसी तकनीक जिसे  उत्पाद कंपनियों द्वारा किसी विशेष सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। और मजेदार बात ये कि इसके चक्कर में हम पड भी जाते हैं और  हमें तनिक अहसास भी नहीं होता है। ख़ास बात यह कि, यह महज सामानों से ही नहीं जुड़ा है, वरन हमारे द्वारा लिए गए जीवन के कई छोटे-बड़े निर्णयों  से जुड़ा मुद्दा है. मसलन आप किसे पसंद करते हैं, किसे वोट देते हैं, किस रेस्तराँ में खाना खाने जा रहे हैं या पॉपकॉर्न का कितना बड़ा डब्बा खरीद रहे हैं इत्यादि.


एक साधारण से परीक्षण पर नजर डालते हैं जिसके केंद्र में है, स्लाइम मोल्ड, एक तरह का बैक्टीरिया ,एक रोचक और अत्यंत सूक्ष्म जीव। थोड़ा और जानकारी के लिए बता दें, यह एककोशिकीय जीव होता है और कई बार अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर कई हजार ऐसे जीव संगठित होकर प्लाज्मोडियम का निर्माण करते हैं जिसे हम आसानी से देख भी सकते है. इन नन्हे जीवों के बारे में एक मजेदार बात यह है कि अन्य जीवों की तरह ये भी निर्णय लेने में सक्षम हैं. सुनकर भले ही अविश्वसनीय लगे पर इन दिमागविहीन जीवों द्वारा लिए गए निर्णय साधारण नहीं वरन सोचे -समझे भी होते है. हाँ, इनकी दुनिया सीमित है, तो निसंदेह निर्णय लेने की भी सीमा है,  जैसे उनकी तरफ जाय जो हमें पसंद है मसलन भोजन और उन वस्तुओं से दूरी बनाये जाए जो हमें नापसंद है यथा प्रकाश। अब बात परीक्षण की:
एक पेट्री डिश लेकर उसके एक तरफ ५ ग्राम कुछ खाद्य पदार्थ या भोजन रखते है और साथ में उस क्षेत्र को प्रकाशित कर देते हैं और उसी पेट्री डिश की दूसरी तरफ थोड़ा कम भोजन की मात्रा ३ग्राम रखते हैं जहाँ अँधेरा है. अब पेट्री डिश के बींचो- बीच स्लाइम मोल्ड के समूह को रख देते हैं। स्पष्ट है, स्लाइम मोल्ड के पास दो विकल्प हैं, एक जहाँ भोजन की मात्रा अधिक है पर जहाँ रौशनी है और दूसरा, खाना काम है मगर जहाँ अँधेरा है. निर्णय मुश्किल है. अब प्रश्न है, स्लाइम मोल्ड पेट्री डिश के किस तरफ आकर्षित होंगे? परीक्षण में देखा गया कि दोनों विकल्पों को  ५०-५० % समय तरजीह दी गयी. यानी आधे समय ३-डार्क की तरफ और आधे समय ५-लाइट की तरफ स्लाइम मोल्ड जाते दिखे.  है न आश्चर्यजनक !

अब  इस परीक्षण को थोड़ा और रोचक बनाते हैं, पेट्री डिश में अब एक अँधेरे क्षेत्र में १ग्राम  भोजन रख कर तीसरा विकल्प जोड़ देते हैं.  स्लाइम मोल्ड अब क्या निर्णय लेंगे? कह सकते हैं, इस तीसरे विकल्प का तो स्लाइम मोल्ड द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिये और निर्णय में कोई फर्क नहीं आना चाहिए। पर क्या ऐसा है? नहीं, परीक्षण में देखा गया कि निरर्थक से लगने वाले इस  विकल्प के यहाँ जोड़ देने से स्लाइम मोल्ड पहले विकल्प (५ लाइट) की जगह  दूसरे विकल्प  (३ डार्क) को ज्यादा तरजीह देने लगते हैं. जहाँ दोनों विकल्प  पहली स्थिति में एक समान तरज़ीह पा रहे थे वहीँ दूसरी स्थिति मतलब तीसरे विकल्प जोड़ देने के बाद, दूसरे विकल्प की तरफ तीन गुना ज्यादा दफा स्लाइम मोल्ड आकर्षित हुए. इसका मतलब क्या कि बिलकुल बेतुके से दिखने वाले किसी विकल्प को जोड़कर स्लाइम मोल्ड द्वारा लिए गए निर्णय को अपने हिसाब से तोडा मरोड़ा जा सकता है? जी हाँ, ऐसा संभव है. और हाँ, नीलकण्ठों, मधुमक्खियों और हम्मिंगबर्ड्स के साथ किये गए परीक्षणों में भी यही पाया गया.

अब आई बात समझ में! तो क्या, इंसानों द्वारा लिए गए निर्णयों को भी किसी एक विशेष विकल्प की तरफ मोड़ा जा सकता है? जी हाँ, हम इंसान भी ऐसे ही विकल्पों के चक्कर में फँसकर कई बार ऐसे ही विवेकहीन निर्णय लेने पर मजबूर किये जाते हैं. इसे एसिमेट्रिक डोमिनेन्स इफ़ेक्ट या डिकॉय इफ़ेक्ट की संज्ञा दी जाती है.

डिकॉय इफ़ेक्ट को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. हम सब सामान्यतः चीजों को कैसे पसंद करते हैं, उपलब्ध विकल्पों से तुलना करके, विकल्पों को एक दूसरे के साथ नापजोख कर और यहीं हम इसके चपेट में आ जाते हैं. एक ऐसे विकल्प का निर्माण कंपनियों द्वारा पेश किया जाता है जो कि तुलनात्मक रूप से तीनों विकल्पों से निम्नतम श्रेणी का है पर किसी एक विकल्प को किसी पैमाने पर अपने से श्रेष्ठ बना देने में सक्षम। यहीं मानव मस्तिष्क गच्चा खा जाता है और तुच्छ होते हुए भी वह विकल्प हमारे निर्णय को किसी एक विशेष विकल्प तक झुकाने में कामयाब हो जाता है.


डैन एरियल की किताब प्रेडिक्टेबली इरेशनल में दिए गए उदाहरण के द्वारा कोशिश करते हैं. कल्पना करिये, द इकोनॉमिस्ट पत्रिका की वार्षिक सदस्यता लेने के लिए ग्राहकों को दो विकल्प दिए गए हैं-


• केवल डिजिटल संस्करण $59 के भुगतान पर

• केवल प्रिंट संस्करण $125 के भुगतान पर


अपनी जरूरतों और पसंद के आधार पर ग्राहक इनमे से कोई भी विकल्प को चुनने के लिए स्वतंत्र है. जब लेखक ने अपने विद्यार्थियों को इनमे से एक विकल्प को चुनने को कहा तब ६८% विद्यार्थियों ने पहले विकल्प को चुना और ३२ % ने दूसरे विकल्प को. मतलब पहला विकल्प ज्यादा लोकप्रिय पाया गया.


अब इस परीक्षण में पत्रिका द्वारा शामिल किये गए तीसरे विकल्प को जोड़ दिया तब विद्यार्थियों को तीन विकल्प मिले:

• केवल डिजिटल संस्करण $59 के भुगतान पर

• केवल प्रिंट संस्करण $125 के भुगतान पर

• प्रिंट और डिजिटल संस्करण $125 के भुगतान पर


अब चीजें कैसे बदली, देखते हैं. जहाँ ६८ % लोगों ने पहले विकल्प को चुना था, अब उनकी संख्या घटकर १६ % रह गयी, दूसरे विकल्प को किसी ने पूछा तक नहीं और ८४ % लोगों ने तीसरे विकल्प में अपनी दिलचस्पी दिखाई. हमारे दिमाग ने उसे यूँ समझा, हालाँकि पहले दो विकल्प एक ही तरह से एक दूसरे से बढ़िया हैं और जो तीसरा कॉम्बो डील है, एक तो वह दोनों अन्य विकल्पों की तुलना में बढ़िया है वहीँ दूसरे विकल्प जितने ही दाम में उपलब्ध है यानी अन्य दोनों विकल्पों से बेहतर है. क्या इस निर्णय को वाकई बढ़िया निर्णय कहा जा सकता है?


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A) Hard Drive with 500 GB for $150.

B) Hard Drive with 300 GB for $100.

अगर आपको ज्यादा हार्ड ड्राइव स्पेस चाहिए तो पहले को खरीद सकते हैं और यदि आप ज्यादा पैसा नहीं लगाना चाहते तब दूसरे को. अब अगर यहाँ एक तीसरा विकल्प लाया जाय जो ऐसा है

C) Hard Drive with 400 GB for $170.

तब आप क्या करेंगे? देखा जाता है की ऐसी स्थिति में ऑपशन A चुनने वालों की संख्या में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हो जाती है. चलिए अगर कंपनी को विकल्प B की तरफ लोगों को आकर्षित करवाना है तो क्या कोई एक विकल्प और ढूँढा जा सकता है? सोचिये !


आइंदा अगर कोई सामान खरीदते वक्त प्रदत्त विकल्पों में से कोई एक विकल्प आपको हास्यास्पद लगे तो सावधान हो जाइये, हो सकता है उत्पादक मूर्खतावश ऐसा न कर रहे हों. ज्यादा संभावना है कि वह हमारे 'साइकोलॉजिकल बग ' का फायदा उठाकर अपने विशेष सामान की बिक्री बढ़ा रहे हों.


कई गणितज्ञों ने इस अवधारणा को बोरडा काउंट पद्धति से विकल्पों को पसंद के आधार पर अंक आबंटित कर समझाने की कोशिश की है. स्लाइम मोल्ड के परीक्षण को इस तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. मान लेते हैं, जो विकल्प पसंद के क्रम में सबसे ऊपर है उसे २ अंक, द्वितीय स्थान पर रखे जाने वाले को १ अंक और तीसरे अर्थात सबसे नीचे रखे जाने वाले को 0 अंक दिए जाएंगे।


स्लाइम मोल्ड के साथ किये गए परीक्षण के पहले केस जिसमें दो विकल्पों, ५ लाइट और ३ डार्क से शुरू करते हैं। ।मान लेते हैं कि प्लास्मोडियम के ५०% स्लाइम मोल्ड (फ़ूड लविंग ) अधिक भोजन को तरजीह देते हैं और ५०% (लाईट हेटिंग) अँधेरे को. और आगे मान लें कि ५लाईट वाले विकल्प को ५०% स्लाइम मोल्ड से २-२ अंक मिलते हैं और बाकी स्लाइम मोल्ड से 0 अंक. इस तरह दूसरे विकल्प को भी ५० % स्लाइम मोल्ड से २-२ अंक मिलेंगे और बचे स्लाइम मोल्ड 0 अंक देंगे । ऐसी स्थिति में पहले विकल्प को मिलेंगे

२*0 . 5 +०*0 . 5 यानि १ और दूसरे विकल्प को भी मिलेंगे 0 *0. 5+२*0 . 5 यानि दोनों को १ -१ पॉइंट मिलते हैं।



अब दूसरे केस में, जहाँ तीसरा विकल्प १- डार्क भी जुड़ गया है वहां अंकों का बंटवारा थोड़ा अलग होगा। देखते हैं: ५ लाइट को जस का तस आधे स्लाइम मोल्ड से २ -२ अंक मिलेंगे और लाइट हेटिंग मोल्ड देंगे 0. तब कुल अंक हो गए 1.


३ -डार्क को फुड लविंग जो कि ५०% हैं, वो दूसरे स्थान पर रखेंगे और अंक मिलेगा १ और साथ ही, लाइट हेटिंग जो कि कुल स्लाइम मोल्ड के ५०% हैं, तीसरे विकल्प के जुड़ जाने के बाद इस ५०% समूह के २५% या तो पहले स्थान पर रखेंगे अथवा दूसरे स्थान पर. इस तरह ३-डार्क के कुल अंक होंगे 1 *५०%+२*२५%+१*२५% यानि की कुल अंक 1. २५


१ डार्क के विकल्प को फ़ूड लविंग द्वारा तीसरे स्थान पर रखने और लाइट हेटिंग बैक्टीरिया के समूह (५०%)द्वारा या तो पहले स्थान पर रखने अथवा दूसरे स्थान पर रखने की स्थिति में कुल अंक मिलेंगे:


0 *0. 5 +१ *0. 2 5 +२*0. २५ यानि कुल 0. 75


अर्थात तीसरे विकल्प के आ जाने से ३-डार्क वाला विकल्प ज्यादा लोकप्रिय बन गया! है न ये ब्यूटी ऑफ़ डिकॉय इफ़ेक्ट।