Monday, 20 April 2015

नेट न्यूट्रैलिटी

एयरटेल द्वारा जीरो योजना की घोषणा के बाद नेट न्यूट्रैलिटी या नेट तटस्थता पर बहस तेज हो गई है।उपभोक्ताओं को कुछ मोबाइल एप्स तक मुफ्त में पहुंच की सुविधा देने की व्यवस्था वाली एयरटेल-जीरो नामक ओपन मार्केटिंग प्लेटफार्म गत सप्ताह कंपनी ने पेश की थी। इसमें शुल्क का बोझ वेबसाइट चलाने वाली या ऐप बनाने वाली कंपनियों द्वारा उठाने की बात कही गयी है. पर नेट तटस्थता की वकालत करने वाले इस योजना का जमकर विरोध कर रहे है. इनका तर्क है कि किस वेबसाइट को धीमा चलाना है, किसे फास्‍ट या फ्री में एक्‍सेस देना है, इस मनमानी का अधिकार टेलीकॉम कंपनियों को मिला तो इंटरनेट की आजादी ही खतरे में पड़ जाएगी। कुछ टेलीकॉम कंपनियां कुछ वेबसाइटों को फ्री या तेज स्‍पीड देकर बाकी वेबसाइटों का रास्‍ता बंद करना चाहती हैं। इंटरनेट पर हर वेबसाइट को बराबर स्‍पीड और बराबर मौका मिलना चाहिए।

और तो और, उपभोक्ताओं के भी नेट के इस्तेमाल की स्वतंत्रता पर खतरा है. अभी यदि कोई व्यक्ति किसी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से डाटा पैक लेता है तब उसे अपने डेटा के इस्तेमाल के हिसाब से भुगतान करना होता है न की अलग अलग वेबसाइट अथवा ऐप के आधार पर. उसका यह अधिकार है कि वो नेट सर्फ करे या फिर स्काइप, वाइबर पर वॉइस या वीडियो कॉल करे. लेकिन अगर नेट न्यूट्रैलिटी खत्म हुई तो इंटरनेट डाटा के मामले में हमें हर सुविधा के लिए अलग से भुगतान करना पड़ सकता है। इससे कंपनियों को तो फायदा होगा, लेकिन आम जनता के लिए इंटरनेट के काफी महंगे हो जाने की संभावना है । सरल उदाहरण से समझा जा सकता है , जैसे की फोन लगने पर जिस तरह किसी भी नंबर पर कॉल करना ग्राहकों की मर्जी पर निर्भर करता है, उसी तरह इंटरनेट प्लान लेने पर कौन सी साइट देखनी है, इसका निर्णय लेने का अधिकार भी ग्राहकों को ही मिलना चाहिए. टेलिकॉम कंपनियां इसे खत्म करना चाहती हैं.

आम जनता, फिल्म हस्तियों से लेकर कई राजनीतिज्ञों ने मिलकर ट्राइ से मांग की है कि ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को जारी रखा जाए। सवाल है कि क्या सचमुच टेलीकॉम कंपनियां इंटरनेट सेवा देने के नाम पर इंटरनेट पर ही कब्‍जा जमाना चाहती हैं।

हालांकि फ्लिपकार्ट जैसी इ कॉमर्स की अग्रणी कंपनी ने नेट न्युट्रलिटी पर हुए हंगामे को देखते हुए एयरटेल जीरो योजना से अपने को अलग कर लिया है. इसी बीच एयरटेल ने भी अपना पक्ष साफ करने की कोशिश की है. एयरटेल का कहना है कि इस जीरो प्लान को लेकर लोगों में गलतफहमी है और यह योजना नेट न्यूट्रैलिटी की अवधारणा का बिलकुल उल्लंघन नहीं करती। 'जीरो योजना' के तहत :
  1. किसी भी तरह के एप्लिकेशन और कंटेंट को एक टोल-फ्री सर्विस के जरिए उपभोक्ताओं तक  पहुँचाया जाएगा.
  2. ऐसे कस्टमर्स जिनके पास डेटा पैक नहीं है, वह भी जीरो प्लान के तहत आने वाली वेबसाइट्स को बिना किसी डेटा पैक की मदद के फ्री में एक्सेस कर पाएंगे.
  3. कोई भी साइट्स जो टॉल फ्री सर्विस का हिस्सा हों या नहीं उसे ब्लॉक नहीं किया जाएगा. बिना किसी भेद-भाव के कोई भी बेब-पेज एक्सेस करना संभव है. 
  4. यह प्लेटफॉर्म बिना किसी भेद-भाव के हर उन कंपनियों के लिए खुला होगा जो हमारे इस सर्विस से जुड़ना चाहेंगी।
अपने ग्राहकों को भेजे ईमेल में भारती एयरटेल के प्रबंध निदेशक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (भारत व दक्षिण एशिया) गोपाल विट्टल ने लिखा है, ‘हम पूरी तरह नेट निरपेक्षता के पक्ष में हैं।’’ उन्होंने कहा कि यह प्लेटफॉर्म सभी ऐप डेवलपर्स, कंटेंट प्रदाताओं और इंटरनेट साइटों को समानता के आधार पर उपलब्ध है और सभी को समान रेट कार्ड की पेशकश की जा रही है।यह भी कहा है, ‘‘इसमें और टोल-फ्री वॉयस मसलन 1800 में कोई अंतर नहीं है।’’ कंपनी के रूप में हम किसी वेबसाइट को ब्लॉक नहीं करते हैं और न ही उसे अलग रफ्तार की पेशकश करते हैं। हमने ऐसा कभी नहीं किया है और न ही ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि सभी वेबसाइट, कंटेंट या एप्लिकेशन के साथ उसके नेटवर्क पर समान बर्ताव किया जाएगा, बेशक वे टोल-फ्री प्लेटफॉर्म पर हैं या नहीं।

यह विचारणीय मुद्दा है कि क्या सच में जीरो योजना नेट न्यूट्रैलिटी के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या नहीं? साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल बताते हैं कि इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियां अब इंटरनेट पर उपलब्‍ध कॉन्‍टेंट से कमाई के रास्‍ते तलाश रही हैं। यानी इंटरनेट पर आप जो देखते हैं, पढ़ते हैं और खरीदते हैं, उसमें भी इन्‍हें हिस्‍सा चाहिए। दूसरी तरफ वाट्स एप, वाइबर जैसी कंपनियां इंटरनेट के जरिए फ्री मैसेज और कॉल की सुविधा दे रही हैं, इन्हें भी टेलीकॉम कंपनियां बंद कराना चाहती हैं।

नेट न्यूट्रैलिटी के पैरोकारों का दावा है, नई तकनीक ने भारी- भरकम निवेश करने वाली इन टेलिकॉम कम्पनियाँ के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. स्काइप जैसी कम्पनियाँ इनके मुनाफे को कम करने में लगी है, वॉट्सऐप के मुफ्त ऐप ने एसएमएस सेवा को लगभग खत्म ही कर डाला है, इसलिए ऐसी सेवाओं के लिए ज्यादा रेट वसूलने की कोशिश की जारी है , जो उनके कारोबार और राजस्व को नुकसान पहुंचा रही हैं। यदि एयरटेल की जीरो योजना अस्तित्व में आती है तब निश्चित रूप से इंटरनेट के स्वरुप में व्यापक परिवर्तन आएगा। स्वस्थ प्रतियोगिता जाती रहेगी, बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा और भविष्य में नई और छोटी कंपनियों के अस्तित्व में आने के रास्ते बंद होंगे. बेशक खुली और तटस्थ इंटरनेट का कोई विकल्प नही.

यदि कंपनी के मकसद नेक हैं, तब भी कई सवाल हैं जिसके उत्तर देने होंगे-
  • देश के तमाम लोगों जो की इंटरनेट प्रयोग नहीं कर पा रहे थे, उन्हें इंटरनेट से जोड़ने और अभिव्यक्ति की आजादी का अहसास दिलाने के उद्देश्य वाली इस महत्वकांक्षी योजना की शुरुआत करने वाले एयरटेल ने योजना की घोषणा करने से पूर्व ही जनता तक यह बात  क्यों नहीं पहुंचाई?
  • अगर यह प्लान जनता के हित  में भी है तब क्या तब भी इस योजना के लागू होने के बाद इंटरनेट इस्तेमाल करना आम आदमी के लिए उतना ही आसान होगा? मसलन यदि हम किसी ब्लॉग पर जाएँ जो मुफ्त में उपलब्ध है और उस ब्लॉग में एक यू-ट्यूब वीडियो या किसी अन्य साइट का लिंक भी डाला गया है, जिसे देखने के लिए पैसे देने होंगे तब क्या आम इंसान के लिए असमंजस की स्थिति नहीं होगी?
  • आखिरकार एयरटेल का करार कंपनियों  के साथ किन शर्तों पर हुआ है, इसे और विस्तार से बताना होगा।  जैसे अगर यह टोल फ्री नंबर जैसी ही व्यवस्था है, तब इसके लिए कितनी कीमत चुकानी होगी? 
  • किसी स्टार्ट अप कंपनी के लिए इस योजना  में शामिल होना क्या आसान होगा ?  
  • अब सवाल यह भी है की क्या केवल टोल फ्री नंबर के वजह से ही घर घर तक मोबाइल पहुंचा है ? यदि सच में इंटरनेट से जुड़ने वाले लोगों की संख्या में इजाफा करना मकसद है, तब क्या इंटरनेट की दरों में कमी लाना ज्यादा  सरल उपाय नहीं है?
  • इस साल के अंत तक वेबसाइट को बंद कर केवल ऐप से ही बिक्री किये जाने की संभावना की फ्लिपकार्ट द्वारा आज की गयी घोषणा क्या मात्र संयोग है?
कुछ लोगों ने निस्वार्थ भाव से कड़ी मेहनत करके मानवता के कल्याण के उद्देश्य से इंटरनेट की आधारशिला रखी थी. महज कुछ निवेश कर, स्पेक्ट्रम खरीद लेने से इंटरनेट पर इन टेलीकॉम कंपनियों का अधिकार होना निराशाजनक है. अर्थव्यवस्था के अन्य निहायत जरूरी संसाधनों जैसे ही इंटरनेट जैसे मूल्यवान संसाधन का कुछ टेलीकॉम कंपनियों का संरक्षक बन जाना कहीं से उचित प्रतीत नहीं होता .

नेट न्यूट्रैलिटी पर विवाद कोई नई बात नहीं है. कई देशों में इस सम्बन्ध में कड़े कानून बनाये गए हैं. अमेरिका, चिली, नीदरलैंड और ब्राजील जैसे देश पहले ही ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ अपना चुके हैं, जबकि भारत में कोई कानून नहीं है। मुद्दे को समझने के लिए एक कमिटी का गठन किया जा चुका है जिसकी सिफारिशें मई महीने के दूसरे हफ्ते तक आनी है.  इतना तो तय है कि मेक इन इंडिया का नारा लगाने वाली वर्तमान सरकार को सोच समझ कर कदम उठाना होगा क्यूंकि यह हमारे और सबसे बढ़कर हमारे देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा सकता है.

Saturday, 21 February 2015

स्वच्छ भारत अभियान


"मैं न गंदगी करूंगा और न किसी को करने दूंगा", मोदीजी  का यह  वक्तव्य जहाँ  उनकी  स्वच्छ भारत के प्रति गंभीर चिंता को  दर्शाता है वहीँ  भारतवासियों में यह आशा भी जगाता है कि  शायद सबसे गंदे और प्रदूषित राष्ट्र के निवासी कहलाने के कलंक से  छुटकारा पा जायें ।

 भारत को साफ़-सुथरा देश बनाने के उद्देश्य के साथ भारतीय प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी जी ने  पिछले वर्ष दो अक्तूबर को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत  की । उस दिन देश भर के तक़रीबन ३ मिलियन सरकारी कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं की सफाई अभियान में भागीदारी से आशा बंधी कि शायद वर्ष 2019 में गांधीजी के जन्म की 150वीं वर्षगांठ तक हम स्वच्छ भारत के लक्ष्य को पा सकेंगे।

इस अभियान को सफल बनाने के लिए तमाम मंत्री और अधिकारी जोर-शोर से जुटे। हाथों में झाड़ू थामे सार्वजनिक स्थलों की सफाई करते प्रधानमन्त्री और नामचीन हस्तियों ने सफाई को लेकर जागरूकता फैलाने की कोशिशें भी की. जगह-जगह लगाए गए बड़े-बड़े पोस्टर, विज्ञापनों, टीवी कार्यक्रमों, पपेट शो आदि के माध्यम से जन -जन तक सन्देश पहुंचाने का काम किया गया.  प्रधानमंत्री जी ने भी अपने भाषणों में कई दफा हर भारतीय से इस मिशन में शामिल होकर इसे सफल बनाने की अपील की है. उनका कहना है कि अगर हम इसे एक जनआंदोलन बना दें तो हम अपने देश की गिनती सबसे साफ राष्ट्रों की सूची में करा सकते हैं। स्वच्छता को पर्यटन और भारत के वैश्विक हित से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के प्रति वैश्विक अवधारणा में व्यापक बदलाव लाने के उद्देश्य से देश के 50 शीर्ष पर्यटन स्थलों में स्वास्थ्य और स्वच्छता का स्तर विश्वस्तरीय होना जरूरी है।

क्या है स्वच्छ भारत अभियान?

पांच वर्षों में भारत को गन्दगी मुक्त देश में तब्दील के उद्देश्य से शुरू किये गए स्वच्छता अभियान का आशय निश्चित रूप से मात्र स्वयं एवं घर परिवार तक की सफाई तक सीमित नहीं है वरन इसके तहत हरेक गाँव, मोहल्ला, सड़कें, फुटपाथ और बस्तियां को साफ़-सुथरा करना, अनाधिकृत क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाना अपशिष्ट जल को स्वच्छ करने की योजना है. संक्रामक महामारियों के नियंत्रण, पेय जल आपूर्ति की व्यवस्था, शहरी आबादी तथा उद्योगों के काम-काज से उत्पन्न कचरे के निबटान जैसी समस्याओं का समाधान ढूंढना भी शामिल है. इससे भी आगे बढ़कर इसके अंतर्गत सफाई कर्मचारियों के प्रति सम्मान की भावना के विकास को भी शामिल किया गया है. निसंदेह लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरुक कर व्यक्ति, समाज और देश के स्वास्थ्य में  सुधार लाया जा सकता है।

क्यों जरूरी है यह अभियान ?

आंकड़ों के हिसाब से भारत दुनिया के सबसे गंदे और प्रदूषित राष्ट्र की श्रेणी में आता है . पूरी दुनिया के 20 सबसे ज्यादा गंदे शहरों में 13 भारत के हैं जिनमें नई दिल्ली, पटना, ग्वालियर और रायपुर शीर्ष चार स्थानों पर हैं.

भारत की दो- तिहाई आबादी गंदगीयुक्त वातावरण में जीने के लिए मजबूर हैं, शौचालयों की सुविधा के अभाव में अभी भी लगभग 62.6 करोड़ भारतीय खुले में शौच करते हैं.

संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के मुताबिक हैजा, अतिसार, हेपेटाइटिस A , मलेरिया, डेंगू जैसे रोगों का जोखिम पूरी दुनिया के मुकाबले भारत में सबसे ज्यादा है.

स्वच्छता और बच्चों के विकास के मध्य गहरे सम्बन्ध को भी नकारा नहीं जा सकता। संक्रमण और बार- बार डायरिया के शिकार बच्चे जरूरी पोषक तत्वों के अभाव में कुपोषण के शिकार हो जाते हैं.

भारत में दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी, जो 1 साल से 6 साल के बीच की है, कुपोषण की शिकार है।

अस्वच्छ वातावरण की वजह से होने वाले हरेक वर्ष तक़रीबन ५ वर्ष से कम आयु के १,८६००० बच्चों की मौत को स्वच्छता फैलाकर रोका जा सकता है. विडम्बना ही है कि बढ़ती आय और बेहतर खान-पान के बावजूद भी बच्चों के कुपोषण स्तर जस की तस है.

अगर कचरे की बात करें, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक शहरों में उत्पन्न कचरे का का एक तिहाई हिस्सा सडकों पर पड़ा सड़ता रहता है. अकेले दिल्ली में रोजाना 500 टन अपशिष्ट का सृजन होता है और सालाना 44 लाख से ज्यादा टन हानिकारक अपव्ययों का सृजन होता है। इससे भी ज्यादा खतरनाक बात यह है कि सूचना प्रौद्योगिकी के बढ़ रहे उपयोग के कारण ई- अपव्यय बढ़ रहा है और ताजा आकलनों के अनुसार देश में उत्पादित कुल ई-अपव्यय में से केवल 10 फीसदी की ही रिसाईक्लिंग हो पाती है। मौजूदा नीतियां, कार्यक्रम और प्रबंधन संरचना इस अपशिष्ट के निपटान की भीषण चुनौती का पर्याप्त रूप से समाधान नहीं करती जिससे 2031 तक 16.5 करोड़ टन तथा 2050 43.6 करोड़ टन हो जाने के आसार हैं।

दुर्भाग्यवश यही स्थिति गंदे पानी को लेकर भी है, कूड़े-कचरे, मानव-शवों और पारम्परिक प्रथाओं का पालन करते हुए उपयोग में आने वाले प्रत्येक घरेलू सामग्री का समीप के जल स्रोत में विसर्जन कर देना हमारी आदतों में शुमार है। नालियों और विभिन्न औद्योगिक इकाइयों द्वारा कचरे तथा गंदे पानी का नदियों, नहरों में उड़ेलने का विकल्प ढूंढना अत्यंत जरूरी है.

यदि भारत स्वच्छ होता है तो डब्ल्यूएचओ के अनुसार प्रति व्यक्ति वर्ष में साढ़े छह हजार रुपये की बचत होगी क्योंकि स्वच्छता के कारण बीमारियों पर होने वाले खर्च में कमी आएगी । विश्व बैंक के एक आँकड़ें के मुताबिक अगर साफ़-सफाई पर एक डॉलर खर्च किया जाए तो स्वास्थ्य और शिक्षा आदि पर खर्च होने वाले नौ डॉलर बचाए जा सकते हैं।

भारत के पर्यटन व्यवसाय पर भी अस्वच्छता का असर साफ़ दिखाई देता है. भारत के गौरवपूर्ण इतिहास और संस्कृति को देखने-समझने के लिए बड़ी तादाद में विदेशी पर्यटक भारत आना चाहते हैं, लेकिन गंदगी की वजह से वे यहां आने से कतराते हैं। सिंगापुर, थाइलैंड जैसे देशों की अर्थव्यवस्था उनके पर्यटन के वजह से चल रही हैं, लेकिन हमारे यहां दिन-प्रतिदिन पर्यटक कम होते जा रहे हैं।

साथ ही, अर्थव्यवस्था को मजबूत बंनाने के लिए विदेशी निवेश की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके लिए भी स्वच्छता जरूरी है। दुनिया भर में भारत की छवि को सुधारना आवश्यक है.


अभियान की मुख्य बातें :

1986 में कांग्रेस सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम यानी सीआरएसपी की शुरूआत की थी, पर सफल नहीं हो सकीं। सन् 2012 तक सार्वभौमिक घरेलू स्वच्छता के लक्ष्य के साथ 1999 में शुरू की गयी निर्मल ग्राम योजना या निर्मल भारत अभियान यानी एनबीए भी असफल रही. निर्मल भारत अभियान को ही वर्तमान सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान में परिवर्तित  किया है। स्वच्छ भारत अभियान का बजट एनबीए के बजट के तीन गुने के बराबर है. पूरी परियोजना की अनुमानित लागत 1,96,009 करोड़ रुपये है।

स्वच्छ भारत अभियान को दो उप अभियानों में वर्गीकृत किया गया है , स्वच्छ भारत अभियान ( ग्रामीण) और स्वच्छ भारत अभियान (शहरी ).

ग्रामीण इलाकों में ग्रामीण विकास मंत्रालय हर गांव को अगले पांच सालों तक हर साल 20 लाख रुपये देगा। सरकार द्वारा हर परिवार में व्यक्तिगत शौचालय की लागत 12,000 रुपये तय की गई है. पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा इस अभियान पर 1,34,000 करोड़ रुपये खर्च किये जाएंगे ।


शहरी क्षेत्र में हर घर में शौचालय बनाने, सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालय बनाने, ठोस कचरे का उचित प्रबंधन करने और चुने गए 4,041 वैधानिक कस्बों के 1.04 करोड़ घरों को इसमें शामिल करने की योजना है। जिन क्षेत्रों में घरेलू शौचालय बनाना कठिन है वहां सामुदायिक शौचालय बनाए जाएंगे। सार्वजनिक स्थानों जैसे रेलवे स्टेशन, बाजार, बस अड्डे, पर्यटक स्थलों, धार्मिक-तीर्थ स्थल एवं राष्ट्रीय राजमार्गो पर साफ-सुथरे सार्वजनिक शौचालय तथा पेशाबघर बनाने की बात कही गयी है । महिलाओं के लिए भी पृथक शौचालय बनाने की योजना है,


शहरी विकास मंत्रालय ने इस मिशन के लिए 62,000 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं।

वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार ने एक स्वच्छ भारत कोष की भी स्थापना की है. सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देश के अनुसार इस कोष में ऐच्छिक योगदान तथा सीएसआर कोष के तहत चंदा जुटाया जाएगा . नए कंपनी कानून के तहत मुनाफा कमा रही कंपनियों को अपने 3 साल के औसत सालाना शुद्ध लाभ का 2 प्रतिशत निगमित सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) गतिविधियों पर खर्च करना होता है।


स्वच्छ भारत अभियान को सही तरीके से लागू करने के लिए जाने-माने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक रघुनाथ अनंत माशेलकर की अध्यक्षता में 19 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति बनाई गई है। समिति विभिन्न राज्यों में स्वच्छता और पानी की सुविधा देने के सबसे श्रेष्ठ और आधुनिक तरीकों पर सुझाव देगी और उनमें सुधार के तरीके सरकार को बताएगी।।साथ ही, तकनीक के इस्तेमाल व इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल की दिशा में काम करेगी।


आम आदमी की भागीदारी :

बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारे धर्म में स्वच्छता का इतना महत्त्व होते हुए भी हम सार्वजनिक स्थलों की सफाई को नजरअंदाज कर देते हैं। सवाल यह है कि क्या स्वच्छ भारत अभियान केवल सरकार की जिम्मेदारी है? बेशक सरकार अथवा अन्य संस्थाओं के काम करने की अपनी सीमा है।लोगों की ज्यादा-से -ज्यादा भागीदारी ही इस अभियान की सफलता को सुनिश्चित कर सकती है. लोगों में इस भावना की विकास करना होगा कि अपनी मातृभूमि को स्वच्छ रखना हमारा कर्तव्य है, स्वच्छता हमारी जरूरत है, यह हमारे जीवन-मरण से जुड़ा मसला है.

सप्ताह में दो घंटे और वर्ष में सौ घंटे सफाई हेतु नागरिकों का श्रमदान के लिए आह्वान इस अभियान के द्वारा किया गया है और आग्रह भी है कि हरेक व्यक्ति कम -से-कम अपने साथ १०० अन्य व्यक्तियों को इस अभियान में शामिल करने का प्रयत्न करें. एक जिम्मेवार नागरिक की भूमिका निभाने के लिए हमें तैयार होना ही होगा, इसका कोई विकल्प नहीं।

क्या होगा सपना साकार?


बेशक सिर्फ अभियान शुरु करना ही काफी नहीं है, परिणाम मायने रखता है. हालांकि स्वच्छ भारत अभियान की डगर बहुत आसान नहीं है. लोगों की आदतों को बदलने से लेकर भ्रष्टाचार तक से निपटना चुनौती है. खासकर अतीत में कुछ योजनाओं की विफलता को देखकर इस अभियान की सफलता पर संदेह वाजिब ही है. गाँवों में बनाये गए शौचालयों का ग्रामवासियों द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाना अच्छे परिणाम का द्योतक नहीं है. इसके अलावा, गाँवों में शौचालय तो बन रहे हैं लेकिन शौचालयों में पानी की व्यवस्था नहीं है । निसंदेह स्वच्छता अभियान को पूर्णत: सफल बनाने के लिए सर्वप्रथम पानी की ऐसी व्यवस्था करनी होगी जिससे किसी भी शौचालय को पानी की किल्लत की बजह से बंद होने के कगार पर न आना पड़े.


सवाल यह भी है कि स्वच्छ भारत अभियान के चलते जमा कचरे का निस्तारण कहां और कैसे होगा? यानी कचरा निस्तारण केन्द्रों को भी बढ़ाने की दरकार है । ध्यानयोग्य बात है कि सरकार की नीतियों में कचरा निस्तारण को लेकर गंभीरता नहीं दीखती । इसके अलावा स्वच्छता के मद्देनजर जो अतिरिक्त पूंजी खर्च होगी, उसके बंदोबस्त पर भी अभी पूरी बात स्पष्ट नहीं है।

आशा
इसमें कोई शक नहीं कि काम कठिन है पर दृढ़ संकल्प, लगन और यथोचित प्रयास से लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल भी नहीं है। पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश ने इसी तरीके को आजमाकर 20 साल की अवधि में खुले में शौच को 34 फीसदी से घटाकर 3 फीसदी कर दिया है। कचरे की रिसाईक्लिंग प्रक्रिया के क्षेत्र में कई कम्पनियाँ काम कर रही है। CII ने भी अपने सदस्यों की मदद से २०१५-१६ में देश भर में १०,००० शौचालयों के निर्माण किये जाने की घोषणा की है वहीँ टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ और भारती फाउंडेशन ने विद्यालयों में शौचालय निर्माण हेतु ३००-३०० करोड़ रुपये देने का वादा किया है. ग्रामीण और शहरी विकास मंत्रालयों ने धार्मिक गुरुओं और समूहों जैसे श्री श्री रविशंकर और गायत्री परिवार से स्वच्छ भारत अभियान में शामिल होने का अनुरोध किया है। सरकार और लोगों के प्रयासों से आने वाले वर्षों में भारत निश्चित रूप से वैश्विक मानदंड के अनुरूप एक स्वच्छ देश बन सकेगा।
























Thursday, 27 November 2014

ऑनर किलिंग

पिछले हफ्ते देश की राजधानी दिल्ली के द्वारका इलाके में भावना यादव  की हत्या का मुद्दा आज लोकसभा में भी  उठा. ऑनर किलिंग को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने और इस विषय पर सरकार और समाज को और गंभीर होने की मांग की गई. २१ वर्षीय भावना की महज अपनी  मर्ज़ी से किसी दूसरी जाति  के लडके के साथ विवाह कर लेने की वजह से जान  ले ली गई । इस हत्या को अंजाम दिया, अपने ही माँ -बाप ने. और तो और उन्हें अपने किये पर शर्मिंदगी भी नहीं।ऐसा पहली बार नहीं हुआ  है, विगत कुछ वर्षों में  कई ऐसी  खबरें पढने को मिली  है.  नितीश कटारा , निरुपमा  पाठक,  आशा सैनी और योगेश , मोनिका  कुलदीप , खुशबू ,दीप्ति, हरप्रीत जैसे लोगों को प्रतिष्ठा और  मान मर्यादा के नाम पर मार दिया गया । इस तरह की हत्याएँ निसंदेह भारतीय  सामजिक व्यवस्था की खामियां  उजागर करती है और कई सवाल खड़े  करती है. क्या लोकलाज और सम्मान के लिए हत्या जैसे जघन्य अपराध करते हाथ नहीं कांपते ? सजा, दण्ड  का  भय भी ऐसा करने से नहीं रोक पाता ? क्या भारतीय समाज में एक वयस्क लड़का-लड़की का खुद अपना जीवनसाथी का चुनाव करना अपराध है ?  क्या अपनी  ज़िन्दगी पर अपना कोई अधिकार नहीं है? और क्या विचार -विमर्श कर मामले को खुशनुमा मोड़ नहीं दिया जा सकता था? इस तरह की हत्याओं को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है.

बेशक बच्चों और उनके माता-पिता के  बीच संबंधों को लेकर  भी निराशाजनक स्थिति है.  परस्पर प्रेम और विश्वास अपनी मान-मर्यादा के आगे गौण हो जाते हैं . दुखद है, विकास की दिशा में  अग्रसर  इस देश में किसी परंपरा को तोड़ने के एवज में या तो मौत मिलती है अन्यथा अपनी मर्ज़ी को  दरकिनार कर अपने तथाकथित हितैषियों द्वारा चुने गए जीवनसाथी के संग  ज़िन्दगी  बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता है।अपनी मर्ज़ी अपने बच्चों पर थोपने की इस परंपरा से   हर तरह से नुकसान की ही उम्मीद की जा सकती है.
 छोटे-छोटे  शहरों  से लेकर  महानगरों, शिक्षित या अशिक्षित, उच्च से लेकर निम्न आय वर्गीय परिवारों तक में ऐसे  विचार और  हत्यारों के  साथ हमदर्दी  रखने वालों की कमी नहीं है. दुर्भाग्यवश देश की कई पंचायतें भी ऐसी हत्याओं के पक्ष में बयान जारी करती रहती हैं। नतीजतन, यह मामला  देश की कानून व्यवस्था के सामने भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है ।अंदाज़न १००० से अधिक हत्याएं हर साल झूठी  प्रतिष्ठा के नाम पर कर दी  जाती हैं. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार इज्जत के नाम पर दुनिया भर में हर पांचवीं हत्या भारत में होती है. तमाम कोशिशों के बावजूद भी इन पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.


शाइनिंग इंडिया नारे को झुठलाती इन घटनाओं पर लगाम लगाना निहायत जरूरी है.  २१ वीं सदी  में पता नहीं हम अपनी किस संस्कृति को सहेजने में लगे हैं?  अगर सच में हमें अपनी परम्पराओं पर गर्व महसूस करना है तब इन कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा। समाज में परिवर्तन होते रहते है। सती प्रथा, बाल -विवाह , छूआछूत जैसी कुरीतियों को मिटाने में हमें कामयाबी  मिली है.  जरूरत है, दकियानूसी विचारों को तिलांजलि देकर हम नई सोच के साथ आगे बढ़ें। युवा पीढ़ी को गुजरे जमाने के तौर-तरीकों से चलने को मजबूर न कर थोड़ी स्वतंत्रता देकर बड़प्पन दिखाएं. अभिभावकों का खुद को बदलना, अपने बच्चों के साथ वक्त बिताना, उनकी बातें सुनना, उनकी तमाम समस्याओं का समाधान करना लाभदायक साबित हो सकता है. सरकार भी इसकी भयावहता को समझते हुए ऑनर किलिंग के मामलों के लिए एक अलग कानून बनाने पर विचार कर रही है. 

Saturday, 8 November 2014

बाल यौन शोषण: कैसे लगे लगाम


इधर ३-४ महीनों के अंतराल में बैंगलोर में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ घटित यौन शोषण की घटनाओं ने मामले की गंभीरता को उजागर किया है. भारतीय सभ्यता में जहाँ विद्यालयों को मंदिर और शिक्षकों को देवता का दर्जा हासिल है, इस तरह की घटनायें हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है. गौरतलब है, बच्चों को डरा धमकाकर उनका यौन शोषण करना न केवल आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों की समस्या है बल्कि सुख-सुविधाओं से पूरी तरह से सम्पन घरों के बच्चों पर भी खतरा कम नहीं है.
यूनिसेफ और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रलय द्वारा कराये गए सर्वेक्षण के मुताबिक हर ३ में से २ विद्यालय जाने वाले बच्चे किसी न किसी तरह के शारीरिक और मानसिक शोषण और ४२ % बच्चे यौन शोषण के शिकार पाये गये. यह भी पाया गया कि ७०% बच्चे अपने साथ हुए शोषण का जिक्र किसी से नहीं करते।

बच्चों के शोषण में केवल बाहरी व्यक्ति ही जिम्मेवार नहीं है वरन घरेलू रिश्तेदारों द्वारा भी बच्चों का खुलेआम शोषण किया जाता है। केन्द्र सरकार की ओर से बाल शोषण पर कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार ५३.२२ प्रतिशत बच्चे एक या उससे ज्यादा बार यौन शोषण के शिकार पाये गए , जिनमें ५३ प्रतिशत लड़के और ४७ प्रतिशत लड़कियाँ हैं। २२ प्रतिशत बच्चों ने अपने साथ गम्भीर किस्म और ५१ प्रतिशत ने दूसरे तरह के यौन शोषण की बात स्वीकारी तो ६ प्रतिशत को जबरदस्ती यौनाचार के लिये मारा-पीटा भी गया। सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि यौन शोषण करने वालों में ५० प्रतिशत नजदीकी रिश्तेदार या मित्र थे।निश्चिततः यह स्थिति शर्मनाक और चिंताजनक है।

मसला इसलिए भी और गंभीर है कि बच्चों के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न को या तो अनदेखा कर दिया जाता है या फिर अपनी मान- मर्यादा की दुहाई देकर इस मुद्दे को दबा दिया जाता है. और-तो-और अगर किसी बच्चे के साथ किसी तरह की यौन हिंसा हो जाती है तब उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता है जिससे बाल यौन शोषकों का साहस और बढ़ता जाता है और समस्या बढ़ती ही जाती है.

सवाल उठता है, इन मासूमों के साथ हो रहे अत्याचारों के लिए कौन है जिम्मेवार? बेशक हमारा कानून, हमारी सोच,  सामजिक व्यवस्था, मात्र पैसा कमाने की होड़ में चल रही तमाम शिक्षण व्यवस्थाएं और आँखे मूंदे माँ-बाप, सब सवालों के कठघरे में हैं. अब सोचना है कि क्या हम कुछ बदलकर बच्चों को भयरहित एक खुशनुमा माहौल दे सकते हैं जिससे उनकी बचपन की स्मृतियाँ मधुर बने और एक बेहतर भविष्य की नींव डाली जा सके।


* अभिभावकों का दायित्व :
बच्चों की शिक्षा घर से ही शुरू होती है, क्यों न अपने बच्चों को ऐसे ढालने का प्रयत्न किया जाए कि इन घटनाओं पर अंकुश लगाने में मदद मिले.
बड़ों से सवाल -जवाब न करना, उनका हर हाल में आदर करना, शिक्षक को भगवान मानने जैसी पारम्परिक मान्यताओं को त्यागना बुद्धिमानी है.
बच्चोँ को बोलने की आजादी देनी होगी और हमें सुनने की शक्ति बढ़ानी होगी। बच्चों से दोस्ताना व्यवहार और बच्चों पर विश्वास कर समस्या को गंभीर होने से बचाया जा सकता है.
बच्चों को आयु अनुकूल  सेक्स सम्बन्धी शिक्षा देना कारगर हो सकता है, ताकि बच्चे सही और गलत ढंग से अंगों के स्पर्श का अंदाजा लगा सकें. ज्यादा जोर से गले लगाना या अत्यधिक करीब आना अथवा  कोई अजब बात- चीत या अभद्र वीडियो दिखाना सामान्य नहीं है, बच्चों को समझ आ सके.
यह भी बच्चों को बताना होगा कि यह कहीं भी हो सकता है, गुनहगार कोई भी हो सकता है. 
बच्चों को किसी भी आदमी के चरित्र को अपनी बुद्धि से परखने की स्वतंत्र दी जानी चाहिए और हमें उसका आदर भी करना चाहिए.
बेशक माता पिता की अति सतर्कता और जागरूकता बच्चों के यौन शोषण को ख़त्म करने का प्रभावी और कारगर उपाय साबित हो सकता है.


स्कूल या अन्य संस्थाओं का दायित्व :

* विद्यालयों और अन्य बाल संरक्षण संस्थाओं को भी इस दिशा में सख्त और कारगर कदम उठाने होंगे। इन संस्थाओं को एक सर्वमान्य बाल सुरक्षा नीति बनानी होगी जो सारे स्थाई व् अंशकालिक  कर्मचारियों और  सलाहकारों पर एकसमान लागू होगी. इन नीतियों को बच्चों से अवगत कराना संस्था की जिम्मेवारी हो मसलन शिकायत किससे करनी है. शिकायतकर्ताओं का नाम गुप्त रखने की व्यवस्था की जाये ताकि बच्चे अन्य किसी उत्पीड़न से बचें।
* शिक्षकों या अन्य कर्मचारियों की भर्ती के दौरान डिग्री, काबिलियत के अलावा उनके आचरण को भी अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू के रूप में देखना होगा . इसके मद्देनजर उनकी पृष्ठभूमि की जांच अनिवार्य है. इसके उपरांत भी पूरी नजर रखनी जरूरी है.
* समय-समय पर इन संस्थाओं के उच्च पदाधिकारियों का बच्चों से बातचीत एवं दोस्ताना माहौल समस्या को कम करने में सहायक होगा।
* आयु अनुरूप सेक्स शिक्षा देने की भी व्यवस्था की जा सकती है.

*बच्चों के द्वारा किसी भी शिक्षक अथवा शिक्षिका के खिलाफ शिकायत किये जाने की स्थिति में तुरंत पुलिस को सूचित करने की जिम्मेवारी उठानी होगी.
 

सरकार का दायित्व 
भारत में बाल यौन शोषण के खिलाफ एक सख्त कानून की अत्यंत जरुरत महसूस की जा रही थी. इस दृष्टि से  बच्‍चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012 का प्रारूप, बच्‍चों को यौन उत्‍पीड़न और शोषण से बचाने तथा कानूनी प्रावधानों को मजबूती प्रदान करने के लिए तैयार किया गया।यह अधिनियम हर बच्‍चे को जो 18 वर्ष से कम उम्र का हो, उसे यौन उत्‍पीड़न, यौनाचार और अश्‍लीलता से सुरक्षा प्रदान करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत कठोर दंड का प्रावधान है।

 पोस्को नामक इस कानून को कड़ाई से लागू करना और लोगों को इस कानून के बारे में अवगत कराना सरकार की जिम्मेवारी है. इस कानून के तहत २०१२ में ८,५४१ शिकायतों की तुलना में सन २०१३ में १२,३६३ शिकायतें दर्ज़ की गई. 
* स्थानीय पुलिस को भी बेहद सतर्कता से काम करना होगा। विद्यालयों और अन्य संस्थाओं में सुरक्षा सम्बन्धी इंतजाम किये गए हैं अथवा नहीं, शिक्षकों की भर्ती में आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है या नहीं, समय-समय पर जांच-पड़ताल को अनिवार्य करना होगा।

* किसी मामले की शिकायत  के उपरांत अविलम्ब उपयुक्त कदम उठाये जाना जरूरी है.

* दोषी पाये जाने वालों का एक केंद्रीकृत रिकॉर्ड भी बनाये जाने में कोताही न बरती जाए.

* साथ ही, इस दिशा में लोगों को सचेत करने हेतु समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिये।  टीवी, रेडियो, नुक्कड़ नाटकों का सहारा लिया जा सकता है. 

निश्चित रूप से हम सब एक-दूसरे के सहयोग से बच्चों के लिए एक सुरक्षित समाज का निर्माण कर सकते हैं.

 

Saturday, 1 November 2014

क्या है ऑनलाइन ग्रोसरी शॉपिंग?

ऑनलाइन खरीदारी अब अनोखी बात नहीं है. समय की बचत, विकल्पों की भरमार और प्रतिस्पर्धात्मक कीमतों ने इ-कॉमर्स को आम लोगों के मध्य लोकप्रिय बनाया है. स्मार्ट फ़ोन के गिरते दाम, बेहतर इंटरनेट-कनेक्टिविटी और ऑनलाइन भुगतान को लेकर घटते डर जैसी वजहों से भी ऑनलाइन खरीदारी करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ  है. इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, जूते जैसी चीजों को ऑनलाइन खरीदने वाले ग्राहक अब आटा ,दाल, चावल, नमक, साबुन जैसी रोजमर्रा इस्तेमाल की जाने वाली चीजों की भी खरीदारी ऑनलाइन करने लगे हैं. लोगों की इन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े शहरों यथा मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई, पुणे, कोलकाता, चंडीगढ़ से लेकर त्रिवेंद्रम, कोयंबटूर, इंदौर और जमशेदपुर जैसे शहरों में भी कई ऑनलाइन ग्रॉसरी स्टोर खुले हैं. आरामशॉप.कॉम, एकस्टॉप. कॉम, बिगबास्केट. कॉम, ऐट माय डोर स्टेप. कॉम, मायग्राहक. कॉम, ज़ॉपनाउ. कॉम, ओमार्ट.इन, लोकलबनिया. कॉम, राशनहट. कॉम, टाउनएसेंशियल. कॉम, वेजीबाज़ार. कॉम, फ्रेश एंड डेली और मैंगोशॉपर्स इत्यादि वेबसाइट में जाकर ग्रोसरी शॉपिंग की जा सकती है. 

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ऑनलाइन ग्रॉसरी रिटेल आउटलेट की संख्या भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है, क्योंकि कुल इंटरनेट यूजर्स की संख्या विगत वर्ष में 12 करोड़ से 21.3 करोड़ हो गई है.
भारत में ऑनलाइन किराना का बाजार 25-30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। पूरे रिटेल बाजार में खाने और किराने के सामान के बाजार का हिस्सा करीब 300 अरब डॉलर का है।निसंदेह बड़े बाज़ार तक पहुँच और मुनाफे की अपार संभावनाएं भी उद्यमियों को भी किराने के सामान की ऑनलाइन दुकान लगाने के लिए प्रेरित कर रही है. 

ग्राहक को फायदे: 

 हर हफ्ते दूकान अथवा मॉल का चक्कर लगाना, भुगतान और डिलीवरी के लिए कतार में खड़ा होना, लिमिटेड स्टॉक,  मनपसनद ब्रांड का न मिलना और तमाम अन्य तरह के खर्चे किराने की शॉपिंग को उबाऊ बनाती है और इस स्थिति में  ऑनलाइन स्टोर्स बड़े फायदेमंद  साबित होते हैं. ये  स्टोर्स चौबीसों घंटे  खुले रहते हैं. अपनी सुविधा अनुसार आर्डर  दिया जा सकता है. साथ ही, अपने हिसाब से डिलीवरी स्लॉट का भी चुनाव करने की आजादी  ग्राहक को मिलती है।  लुभावने ऑफर्स और डिस्काउंट ऑनलाइन स्टोर्स का अन्य बड़ा अट्रैक्शन है। मिसाल के लिए मुंबई, बंगलुरु और हैदराबाद में बिजनेस चलाने वाली बिगबास्केट.कॉम अप्रैल में दिए जाने वाले हर पहले ऑर्डर पर 10 प्रतिशत तक डिस्काउंट दे रही है। कुछ स्टोर्स रिवॉर्ड प्वाइंट्स भी देते हैं। 1000 रुपये से ऊपर के ज्यादातर ऑर्डर पर मुफ्त डिलीवरी मिलती है। इन वेबसाइट्स पर मासिक शॉपिंग लिस्ट भी बनाने की सुविधा मिलती है जिससे काफी सहूलियत होती है. इन स्टोर्स की और भी खास बात है कि यहाँ इम्पोर्टेड सामानों की भी खासी रेंज मिल जाती है जो कि  परंपरागत दुकानों में मुश्किल है।   

 कंपनियों के काम करने के तरीके:

विभिन्न कम्पनियों ने अलग-अलग मॉडल को चुना है. कुछ कंपनियों ने अपना भंडारगृह बनाया है, जहां वे अपने प्रॉडक्ट का स्टॉक रखते हैं, जबकि कुछ ऑर्डर मिलने पर थोक खरीदारी करते हुए संबंधित ग्राहक तक माल पहुंचाने का काम करते हैं. कुछ वेबसाइट ग्राहकों का आर्डर ऑनलाइन कार्ट के अलावा फोन पर भी लेने की सुविधा देती हैं। एक बार ऑर्डर दर्ज करवाने के बाद वांछित वस्तुओं को यथासंभव उसी दिन या कुछ घंटों में ग्राहक के दरवाजे तक पहुंचाए जाने की व्यवस्था कंपनियों द्वारा की जाती है वहीँ, आरामशॉप ने एक अलग ही मॉडल को अपनाया है, जो केवल ऑर्डर लेती है और ग्राहक द्वारा अपने पसंद के चुने हुए किराना दुकान तक ऑर्डर तत्काल पहुंचा देती है. वहां से ग्रॉसरी ग्राहक तक पहुंचा दी जाती है और नकद ले लिया जाता है।इसके लिए आरामशॉप ने कई किराना दुकानों को अपने साथ जोड़ा है. यकीनन, माल की गुणवत्ता या समय पर डिलीवरी जैसे पैमाने पर इनकी पकड़ नहीं रह सकती और पर हाँ, कम निवेश और कम कर्मचारियों से भी काम चलाया जा सकता है।ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए  इस व्यवसाय में लगी कई कंपनियां ऑर्डर देने के कुछ घंटों की तय समय सीमा में सामान नहीं पहुंचने पर ग्राहक को आर्थिक क्षति-पूर्ति करने जैसे कदम भी उठा रही है. ऑनलाइन किराना कंपनियां कई तरीकों से उपभोक्ताओं को आकर्षित करने में लगी है.

* ऑनलाइन बेचने की दिक्कतें:

बेशक ऑनलाइन किराना सामानों का चलन बढ़ रहा है लेकिन ऑनलाइन किराना कंपनियों को कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. जैसे यह व्यवसाय कम मार्जिन पर आधारित है और ज्यादातर कंपनियों का कामकाज एक-दो शहरों तक ही सिमटा हुआ है. दूसरी, हरेक शहर में लोगों की आदतें भी एक सी नहीं होती. उनको समझना और पूरा करना भी भी एक चुनौती है. और तो और जल्दी खराब हो जाने वाले उत्पाद भी ऑनलाइन किराने की दुकान चलाने वालों के लिए एक चुनौती है। उन्नत तकनीक के सॉफ्टवेयर के अलावा स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ मजबूत गठजोड़ और सप्लाई की मजबूत व्यवस्था, भण्डार गृृह और स्टोरेज सुविधा, कुशल वितरण व्यवस्था जैसे ऑफलाइन घटकों को भी नजरअंदाज  नहीं किया जा सकता है।
मार्केट में अपार सम्भावनों को देखते हुए संगठित खुदरा शृंखलाएं भी ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी पेशकश करने लगी हैं। फ्यूचर समूह की प्रीमियम फूड शृंखला फूडहॉल के बाद अब रिलायंस इंडस्ट्रीज की खाद्य एवं किराना (फूड ऐंड ग्रोसरी) शृंखला रिलायंस फ्रेश और एमेजॉन भी इस दौड़ में शामिल हो गई है।स्पेंसर्स रिटेल और आदित्य बिड़ला के अलावा अन्य कंपनियों के भी इस कारोबार में आगे बढ़ने के पूरे आसार है.

जाहिर है, उपभोक्ताओं को तो कई विकल्प मिलने वाले हैं वहीँ इस बाजार पर कब्जे के लिए ऑनलाइन कंपनियों में प्रतियोगिता भी बढ़ने वाली है. पर हाँ, रचनात्मक सोच के साथ उत्कृष्ट ग्राहक सेवा देकर ऑनलाइन ग्रोसरी स्टोर बड़ा मुनाफा कमा सकती है.



Monday, 27 October 2014

 दास्ताने आजादी: तस्वीरों के जरिये 

 इन दिनों बैंगलोर के नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट में 'विजुअल आर्काइव ऑफ़ कुलवंत रॉय' नामक एक प्रदर्शनी चल रही है जिसमें फोटो जर्नलिस्ट कुलवंत रॉय द्वारा सन १९३० से १९७० के मध्य खींची गयी दुर्लभ तस्वीरों को लगाया गया है। तक़रीबन ३०० तस्वीरों से सजी इस प्रदर्शनी की एक-एक तस्वीर गुलाम भारत की लाचारियों और स्वतंत्र भारत की उम्मीदों को बयां करती है जिसे हमने किताबों और कहानियों में पढ़ा है।
तक़रीबन ५ दशकों की कई खट्टी -मीठी यादों को सहेजे ये तस्वीरें भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है, चाहे वह १९४२ के क्रिप्स मिशन की तस्वीरें हो या शिमला कैबिनट मिशन की या फिर महात्मा गांधी और फ्रंटियर  गांधी की नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में हुई मुलाकात की तस्वीर।भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इन महत्वपूर्ण क्षणों को देखना एक अनोखा अनुभव है. 
विभिन्न रैलियां को सम्बोधित करते गांधी, रेलवे के तीसरे दर्ज़े में यात्रा करते गाँधी,नेहरू और पटेल के साथ मंत्रणा में व्यस्त गांधी और जिन्ना के साथ विचार- विमर्श करते गांधी की तस्वीरें अतीत को जीवंत कर उठी है. 

इन तस्वीरों के माध्यम से स्वतंत्र भारत के समक्ष चुनौतियाँ को भी देखा और महसूस किया जा सकता है। संविधान पर हस्ताक्षर करते प्रमुख नेतागण, पटेल की विभिन्न देसी रियासतों के महाराजाओं से मुलाकात या पाकिस्तान युद्ध के वक्त सीमा पे लड़ते जवानों का हौसला देखना अत्यंत रोमांचक है.

 इन गंभीर मसलों के अलावा कुछ हलके- फुल्के क्षणों को भी कुलवंत रॉय ने उतनी ही खूबसूरती  से अपने कैमरे में कैद किया है यथा बिरला हाउस में लंच के बाद हाथ धोते नेहरू, अपने नाती राजीव गांधी को दुलारते नेहरू, बहन विजय लक्ष्मी पंडित के गले मिल रहे नेहरू या एक क्रिकेट मैच के दौरान बल्ले को थामे नेहरू। राजनीति का पाठ सीखती इंदिरा गांधी की तस्वीरें भी इस प्रदर्शनी  का हिस्सा बनी है.

तस्वीरों के अलावा यहाँ महत्वपूर्ण पोस्टकार्ड, समाचारपत्रों की मौलिक प्रतियाँ भी देखी जा सकती है. हॉल के बीचों-बीच रखे कैमरे को देखना भी सुखद है जो इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों का जरिया बना.

आजादी मिलने के तत्पश्चात कुलवंत रॉय के विदेश भ्रमण की तस्वीरें भी यहाँ लगाई गयी है जिसमें तत्कालीन विश्व की झलकियाँ मिलती है .स्वंतत्रता आंदोलन के अलावा भारत के कई महत्वपूर्ण स्थलों की तस्वीरें भी आकर्षित करती है मसलन अमरनाथ की कठिन यात्रा पर जाते लोग और भाखरा-नांगल बाँध की विशालता।

 इस बेमिसाल फोटो संग्रह को सहेजा और आम जनता के समक्ष प्रस्तुत किया है, आदित्य आर्या ने जो कुलवंत रॉय के निकट सम्बन्धी भी हैं।
The crates stacked with old photographs were lying in one corner of renowned advertising photographer Aditya Arya’s house for almost 24 years. He finally opened them one day, and he was surprised to find a treasure—numerous photographs that reflected key moments in India’s history of independence. It was unimaginable that a long forgotten photojournalist from the pre-independence period clicked these pictures. This photographer was Arya’s uncle, Kulwant Roy. Roy’s images are a documentation of India during the pre- as well as postindependence eras. He has managed to capture raw emotions and crucial events that emerged from the Indian political movements. One is easily transported into these eras and swayed by the moments frozen into each of these frames. - See more at: http://betterphotography.in/perspectives/great-masters/kulwant-roy/12313/#sthash.AHRQdXPq.dpuf
The crates stacked with old photographs were lying in one corner of renowned advertising photographer Aditya Arya’s house for almost 24 years. He finally opened them one day, and he was surprised to find a treasure—numerous photographs that reflected key moments in India’s history of independence. It was unimaginable that a long forgotten photojournalist from the pre-independence period clicked these pictures. This photographer was Arya’s uncle, Kulwant Roy. Roy’s images are a documentation of India during the pre- as well as postindependence eras. He has managed to capture raw emotions and crucial events that emerged from the Indian political movements. One is easily transported into these eras and swayed by the moments frozen into each of these frames. - See more at: http://betterphotography.in/perspectives/great-masters/kulwant-roy/12313/#sthash.AHRQdXPq.dpuf






                                                       

Friday, 16 October 2009

शुभ दीपावली




दीवाली के दिन पूजन का विशेष महव है. गणेश जी , लक्ष्मी जी और सरस्वती जी की पूजा अर्चना कर लोग धन, सुख समृद्धि, बुद्धि और ज्ञान प्राप्ति की कामना करते हैं। विधिवत पूजा करने में आनंद भी है और संतोष भी ...

कलश, आम के पत्ते, फूल, अक्षत, अगरबत्तियां, मूर्तियाँ ,इत्यादि पूजा के वक्त उपयोग में लाये जाते हैं।
परन्तु जानकारी के अभाव की वजह से कई लोग चाहते हुए भी इस परम्परा का निर्वहन कर सकने में असक्षम हैं ।
अगर आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं तब यहाँ क्लिक करें ॥ पूजा के प्रत्येक चरण की जानकारी यहाँ उपलब्ध है ...
अपनी दीवाली भी मनाएँ इस बार कुछ अलग और परंपरागत अंदाज़ में ...

दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं ....