Wednesday, 30 January 2019

वीकेंड ट्रिप :काशिद बीच



मुंबई से १२६ किमी दूर महाराष्ट्र के उत्तरी कोंकण क्षेत्र में अरब सागर के किनारे अवस्थित है एक छोटा सा गांव, काशिद। तक़रीबन १२०० जनसँख्या वाला यह गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता की बदौलत एक साल में इससे कहीं ज्यादा संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर खींचता होगा! इसके साफ़-सुथरे समुद्र तट, अरब सागर का फैलाव, पहाड़ियां और यहाँ मौजूद ऐतिहासिक मंदिरों और अवशेषों के बीच खासकर मुंबई और पुणे से पर्यटक सुकून का पल बिताने पहुँचते हैं. खासकर ऐसी स्थिति में जब समय की बाध्यता हो और ज्यादा भीड़-भाड़ वाली जगह जाने से बचना चाहते हों. कहने वाले इसे 'पुअर मैन्स 'गोवा भी कहते हैं, हर बजट के होटल्स और सस्ते दाम में खाने-पीने के सामानों की उपलब्धता को देखकर सही भी है. पर, यहाँ सागर के नीले स्वच्छ पानी का स्पर्श करने , चमकते सफ़ेद रेत पर खाली पैर चलने, लहरों के उतावलेपन और सूर्यास्त का मनोरम दृश्य देखने के बाद काशिद यात्रा का निर्णय बिलकुल निराश नहीं करता। सरल शब्दों में, मात्र एक वीकेंड में ही बीच का लुत्फ़ उठाकर, बिलकुल रिफ्रेश होकर अपने काम पर लौट सकते हैं और गोवा की तरह जेब पर भारी भी नही, है न आम के आम गुठलियों के भी दाम☺

अरब सागर के 530 किमी लम्बे समुद्रतट के होने के कारण ही पर्यटकों के लिए इस राज्य में बीच के कई विकल्प उपलब्ध हैं. परन्तु दुर्भाग्यवश, जब ज्यादातर समुद्र तट हम इंसानों की बदौलत गन्दगी और कूड़े का पर्याय बन चुके हैं, ऐसे में काशिद बीच की स्वच्छता देखना एक अच्छा अनुभव रहा. यूँ ही इसे कोंकण क्षेत्र के एक बेहतरीन बीच में शुमार नहीं किया जाता!

मुंबई से काशिद सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है अथवा मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया से उपलब्ध फेरी के माध्यम से समुद्र मार्ग से अलीबाग पहुंचकर भी टैक्सी अथवा बस के द्वारा काशिद तक की यात्रा की जा सकती है . यात्रा के दरम्यान यदि तत्कालीन सडकों के निर्माण-कार्य को अगर अनदेखा करें, तब सड़क के दोनों तरफ की हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता के मद्देनजर यात्रा काफी सुखद लगती है . हाइवे की तरह सड़कें चौड़ी तो नहीं, परन्तु बुरी नहीं.

रस्ते भर कई मनभावन प्राकृतिक नजारे देखने को मिलते हैं. हरे भरे खेत हों या उड़ते पंक्षियोँ का झुण्ड या फिर अरब सागर में समाहित होती छोटी-छोटी नदियों का विस्मरणीय दृश्य ! बीच के समीप पहुंचते ही सागर तट के किनारे पंक्तिबद्ध कसुअरिना के वृक्ष, समुद्र तट की तरफ रूख करते लोगों के छोटे- बड़े झुण्ड दिखाई देने लगते हैं जो आये हैं सुकून के दो पल गुजारने अपनों के साथ. सामने ही दिखाई देता है, क्रिस्टल की तरह साफ़ नीले पानी और सफ़ेद चमकीले रेत से निर्मित एक सुरम्य दृश्य! समंदर के पानी में भींगते लोग, रेत के घरोंदे बनाते जोड़े, या फिर समन्दर के किनारे-किनारे चहलकदमी करते कोई अकेला या एक- दूसरे के हाथ पकड़े जोड़े, ख़ुशी में चीखते-भागते बच्चे और उनको पकड़ने को दौड़ते माता-पिता और  रेत पर उकेरे शब्द 'आई लव यू तृप्ति'!

कई लोगों का कहना है कि सागर तट पर वे 'ऑप्टिमिस्टिक बेस्ट' की स्थिति में होते हैं, क्या यह सबके लिये उतनी ही सही है? बीच पर मौजूद हर इंसान के चेहरे पर फैली मुस्कराहट क्या इस तथ्य को सही सिद्ध करती है?

४-५ किलोमीटर में फैला है यह समुद्र तट, बीच- बीच में पानी से अठखेलियां करते लोग, चाहे तो कोई एक छोटे से भाग को अपना प्राइवेट बीच बना लें! छोटे-छोटे पत्थर दूर पानी में फेंकने का खेल खेलना अथवा पतले सपाट से पत्थर का पानी में फ़ेंक ३-४ बार पानी में गिरते और ऊपर उछलते दूर तक जाते देखना क्या मजेदार है???

बैठ -बैठे सागर की अथाह गहराई को मापने की कोशिश या कभी ऊपर फैले नीले आसमाँ की ऊंचाई मापना, सहसा अहसास होता है, प्रकृति के समक्ष हम कितने बौने हैं?

अन्य समुद्री तटों की तुलना में भले यह एक शांत बीच लगे, पर यहाँ भी पर्यटकों के लिए बीच सम्बन्धी गतिविधियों का अच्छा खासा इंतजाम है. मसलन, सागर के किनारे घुड़सवारी, अकेले अथवा पूरे परिवार के साथ हॉर्सकार्ट पर या फिर ATV राइड को रेत पर ज़ूम कर निकालने की ख्वाहिश भी पूरी कर सकते हैं . पैरासेलिंग, जेट स्की, बनाना राइड जैसी गतिविधियों से भी यह बीच अछूता नहीं।

अगर बस तमन्ना हैमक पर लेटकर अलसाने की हो, बीच पर पर्यटकों के लिए यह भी सुविधा है।  साथ में पकोड़े, मैगी और नारियल पानी भी उपलब्ध है ! शैक के ही एक कोने में बनाये गए हैं चेंजिंग रूम जहाँ नहाने का पानी भी उपलब्ध है । और हाँ, अगर नहाने की इच्छा है पर अतिरिक्त कपडे नहीं है, तो बीच किनारे लगे बाजार से खरीददारी भी की जा सकती है।
रेत की ठंढक ,लहरों का शोर, चमकते रेत, ऊपर खुला आकाश और दहकता सूरज, पीछे शांत खड़ी पहाड़ी! एक रिलैक्सिंग वीकेंड ट्रिप के लिए और क्या चाहिए?




Wednesday, 5 December 2018

डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय, नवरत्न प्रदर्शनी :एक अनोखा अनुभव


भारत की आर्थिक राजधानी है, मुंबई। भारत की सबसे अधिक आबादी वाला यह शहर विभिन्न समाजों और संस्कृतियों के मिश्रण और बहुभाषी तथा बहुआयामी जीवन शैली के लिए भी जाना जाता है। और भारत ही क्या, वैश्विक आर्थिक स्तर पर धाक जमा लेने की वजह से ही सन २००८ में इस महानगर को 'अल्फा वर्ल्ड सिटी' का भी दर्ज़ा मिल गया है।मूल रूप से सात अलग -अलग द्वीपों में बंटा यह नगर पांच शताब्दियों के लम्बे समय में एक विशाल औद्योगिक शहर में परिवर्तित हो गया है। इस परिवर्तन की प्रक्रिया को थोड़ा और बारीकी से समझने की चाहत अगर आप में है, तब आप रूख कर सकते हैं मुंबई के भायखला स्थित 'डॉ भाऊ  दाजी लाड संग्रहालय' की तरफ। भारत के श्रेष्ठ संग्रहालयों में शामिल इस संग्रहालय में भारतीय इतिहास और विशेषतः १९वीं और २०वीं शताब्दी के मुंबई की जीवन शैली की जानकारी बखूबी मिलती है। इस संग्रहालय की स्थापना सन १८७२ में हुई थी और तब उसे 'विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय' नाम से जाना जाता था परन्तु सन १९७५ में इस संग्रहालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मुंबई के एक प्रमुख चिकित्सक, इतिहासकार और समाज सेवक के नाम पर 'डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय' कर दिया गया. यह संग्रहालय वर्षों से मुंबई की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और संभाल कर रखने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। विशेष रूप से वर्ष २००८ में संग्रहालय के नवीनीकरण के बाद विभिन्न तरह की प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं का नियमित आयोजन इस संग्रहालय को आम लोगों के मध्य लोकप्रिय बनाने में मददगार साबित हुआ है और यह कहना गलत नहीं होगा कि यह स्थान मुंबई के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों की सूची में शामिल हो गया है। संग्रहालय ने लगातार अपने संग्रह को बढ़ाने की दिशा में भी काम किया है. गूगल की सहायता से संग्रहालय के वर्चुअल टूर की भी व्यवस्था की गई है।


पैलेडियन डिज़ाइन में बनी यह दोमंजिला इमारत जितनी बाहर से आकर्षित करती है, उतनी ही भव्य अंदर से भी है। चमकते टर्न्सटाइल से होकर एक बड़े हॉल में प्रवेश करते ही दिखाई देते हैं,सुन्दर-से अलंकृत खम्भे, छत पर स्टैंन्सिल से बनी डिज़ाइन और सबसे अहम कांच के बड़े-बड़े डब्बे में बंद कई तरह की खूबसूरत कलाकृतियां मसलन चांदी और मिट्टी के बर्तन, हाथी दांत से बनी कलाकृतियां और उनपर की गई नक्काशी, लाख से बने सामान या फिर पेंटिंग और पुराने हथियार। सीढ़ियों पर लगे रंगीन मिन्टन टाइल्स पर नजर ठिठक ही जाती है और कुछ सीढ़ियां चढ़ते ही सामने दिखाई देती है डॉ भाऊ दाजी लाड जी की एक बड़ी तस्वीर।

बढती जरूरतों और तकनीकी प्रगति के साथ नौकाओं के बदलते स्वरुप, कपड़ा मिलों, विभिन्न आवास परिसरों, पारम्परिक उद्योगों और अलग -अलग वेशभूषाओं की जानकारियाँ देते मॉडल को पहली मंजिल पर देखा जा सकता है. जैसे मुंबई के मालाबार हिल्स स्थित 'टावर ऑफ़ साइलेंस' का संग्रहालय में प्रदर्शित डायोरामा और लिखित विवरण पारसी समुदाय द्वारा अंतिम संस्कार के लिए अपनाने जाने वाली विधि की विस्तृत जानकारी देता है। मुंबई की सात द्वीपों से एक विशाल औद्योगिक शहर में बदलने की कहानी कहते पुराने मानचित्र, तस्वीरें, पांडुलिपियों और दुर्लभ किताबें यहाँ देखी जा सकती हैं। यथा १८वीं शताब्दी में जॉन हेनरी ग्रोस द्वारा वाटरकलर से बनाये गए तत्कालीन शहर के नक़्शे 'प्लान ऑफ़ बॉम्बे' या फिर सिटी ऑफ़ बॉम्बे इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट द्वारा निर्मित वर्ली उपनगर के दो मॉडल्स द्वारा इस शहर के शुरूआती गठन की प्रक्रिया को समझा जा सकता है। हेप्टेनेशिया' अर्थात 'सात द्वीपों का समूह', मुंबई शहर का अतिप्राचीन ग्रीक नाम है जिसका उल्लेख यूनानी खगोलविद और भूगोलवेत्ता टॉलेमी के लेखन में है, कुछ ऐसी ही जानकारियों और तक़रीबन ३५०० कलाकृतियां इतिहास को समझने में हमारी मदद करती है।


साथ ही, यहाँ समय -समय पर लगने वाली प्रदर्शनियाँ, विशेष कार्यक्रम तथा बच्‍चों के लिए लगी कार्यशालाएं भी लोगों द्वारा खूब पसंद की जाती हैं। पिछले महीने दिल्ली आर्ट गैलरी (DAG) के सौजन्य से संग्रहालय में 'नवरत्न -नाइन जेम्स ' नामक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। 'नवरत्न' नाम से प्रसिद्ध नौ कलाकारों की कलाकृतियों की प्रदर्शनी संग्रहालय के कमलनारायण बजाज दीर्घा में लगाई गयी थी।यहाँ बता दें, भारत सरकार द्वारा पारित ऐंटिक्विटीज ऐंड आर्ट ट्रेजर्स ऐक्ट, 1972 द्वारा भारत के नौ कलाकारों की कलाकृतियों को 'नेशनल आर्ट ट्रेजर्स' का दर्ज़ा दिया गया था. राजा रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, निकोलस रोएरिक , गगनेन्द्रनाथ टैगोर, जैमिनी रॉय, अवनीन्द्रनाथ टैगोर, नन्द लाल बोस, रवींद्रनाथ टैगोर और सैलोज मुख़र्जी जैसे दिग्गज कलाकारों के चित्रों से सजी प्रदर्शनी ने कलाकारों द्वारा प्रयोग में लाये गए भिन्न-भिन्न माध्यमों और पेंटिंग के विषयों से भी अवगत कराया।जैसा कि प्रदर्शनी के सम्बन्ध में जानकारी दी गयी थी, कलाकृतियों को देखकर बेशक महसूस किया जा सका कि कैसे पश्चिमी चित्रकला शैली से आरम्भ कर भारतीय कला शैली को एक अलग पहचान देकर उसे ऊंचाइयों तक ले जाने का बीड़ा इन कलाकारों ने उठाया था ।ये कलाकार भारतीय कला-परंपरा को भारत के अपने इतिहास और पौराणिक कथाओं के सन्दर्भ में मोड़ने से जरा भी विचलित नहीं हुए और साथ -साथ इन्हें भारतीय दर्शकों के बीच मान्य बनाने का भी काम किया।

बेशक इनमें रंगों और लकीरों का अद्भुत संयोजन तो है ही, कई दशकों के दरम्यान बने इन पेंटिंग्स के माध्यम से भिन्न -भिन्न समयों में प्रचलित भारतीय जीवन शैली के भी दर्शन कर सकना संभव हो सका । प्राकृतिक सुंदरता हो अथवा प्रकृति और इंसानों के आपसी सम्बन्ध, तत्कालीन ग्रामीण समाज एवं जीवन शैली हो या धार्मिक भावनायें हों , या फिर सामजिक और धार्मिक कुरीतियां पर प्रहार हो, माँ और बच्चे के मध्य प्यारे सम्बन्ध से लेकर भारतीय महिलाओं के वास्तवकि स्थितियों को पेंटिंग के विषय के रूप में चुना गया. इतना ही नहीं, इन पेंटिंग्स के जरिये भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के विभिन्न चरणों को भी बखूबी दर्शाया गया है। नन्द लाल बोस द्वारा बनाये गए दांडी यात्रा का चित्र या अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित भारत माता की एक खास इमेज से उत्पन जोश का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं!

राजा रवि वर्मा ने कई पौराणिक कथाओं और उनके पात्रों के जीवन को अपने कैनवास पर उतारा। सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, राधा या कृष्ण की ज्यादातर तस्वीरें राजा रवि वर्मा की कल्पनाशक्ति की ही उपज हैं। अमृता शेरगिल का अपनी पेंटिंग्स के लिए पेरिस से लौटकर अजंता के भित्तिचित्रों से ली गयी प्रेरणा यह साबित करती है कि अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंग गई। जामिनि रॉय द्वारा बाद के वर्षों में बनायी गई पेंटिंग्स पर भारतीय लोक कला और शिल्प परम्पराओं से ली गयी प्रेरणा साफ़ झलकती है। सपाट रंगों का चुनाव और किनारे पर की गयी सजावट इस बात की पुष्टि भी करती दीख रही थी।

प्रदर्शन में लगी अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाई गयी मुग़ल शैली की पेंटिंग उनके द्वारा पश्चिमी चित्रकला शैली के प्रभाव को कम कर भारतीय शैली को विकसित करने की पुरजोर कोशिश की मिशाल है. निकोलस रोयरिक के नग्गर की पहाड़ियों में १९ साल तक बसने और वहां की बनाई गए खूबसूरत पेंटिंग्स भी यही इशारा करती दिख रही थीं। हर पेंटिंग के नीचे कलाकारों से जुडी कई ऐसी जानकारियां इस प्रदर्शनी को बहुत ही रोचक बनाये हुई थी, जैसे भारतीय संविधान की प्रथम कॉपी के पन्नों में नन्द लाल बोस द्वारा हाथों से रंग भरना या फिर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन्ही के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सभाओं के पोस्टर बनाया जाना इत्यादि। इन कलाकारों द्वारा लिखी गयी और इनके बारे में लिखी कुछ किताबें भी इस प्रदर्शनी की शोभा बढ़ा रही थी। इन कलाकारों के कुछ निजी सामान और हस्तलिखित पत्र भी दर्शन के लिए रखे गए थे।
कला कालजयी होती है! सच है, आज भी ये पेंटिंग्स दशकों बाद उतनी ही प्रासंगिक हैं।


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Saturday, 3 November 2018

डिकॉय इफ़ेक्ट :क्या आपका निर्णय 'आपका' है ?



अगर आपने हाल ही में कुछ ख़रीदा है जैसे टीवी, फ्रीज़, ओवन, फ़ोन, पेन ड्राइव  या फिर किसी समाचार पत्र अथवा मैगज़ीन की सदस्यता ? खूब रिसर्च कर, जांच परख कर, कहें तो ठोक बजाकर अपने निर्णय  भले किया हो पर पर जरा सम्भलिये, क्या आपके द्वारा लिया गया निर्णय वाकई आप ही का है ? यह क्या सवाल है? पुनः सवाल को दुहरा देती हूँ. क्या सच में आपका निर्णय आपका ही है ? झटका लगा न ?
कहीं आप 'डिकॉय एफेक्ट ' के चक्कर में तो न पड़  गए ? ये क्या है? इसे एसिमेट्रिक डोमिनेन्स इफ़ेक्ट भी कहा जाता है, ऐसी तकनीक जिसे  उत्पाद कंपनियों द्वारा किसी विशेष सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। और मजेदार बात ये कि इसके चक्कर में हम पड भी जाते हैं और  हमें तनिक अहसास भी नहीं होता है। ख़ास बात यह कि, यह महज सामानों से ही नहीं जुड़ा है, वरन हमारे द्वारा लिए गए जीवन के कई छोटे-बड़े निर्णयों  से जुड़ा मुद्दा है. मसलन आप किसे पसंद करते हैं, किसे वोट देते हैं, किस रेस्तराँ में खाना खाने जा रहे हैं या पॉपकॉर्न का कितना बड़ा डब्बा खरीद रहे हैं इत्यादि.


एक साधारण से परीक्षण पर नजर डालते हैं जिसके केंद्र में है, स्लाइम मोल्ड, एक तरह का बैक्टीरिया ,एक रोचक और अत्यंत सूक्ष्म जीव। थोड़ा और जानकारी के लिए बता दें, यह एककोशिकीय जीव होता है और कई बार अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर कई हजार ऐसे जीव संगठित होकर प्लाज्मोडियम का निर्माण करते हैं जिसे हम आसानी से देख भी सकते है. इन नन्हे जीवों के बारे में एक मजेदार बात यह है कि अन्य जीवों की तरह ये भी निर्णय लेने में सक्षम हैं. सुनकर भले ही अविश्वसनीय लगे पर इन दिमागविहीन जीवों द्वारा लिए गए निर्णय साधारण नहीं वरन सोचे -समझे भी होते है. हाँ, इनकी दुनिया सीमित है, तो निसंदेह निर्णय लेने की भी सीमा है,  जैसे उनकी तरफ जाय जो हमें पसंद है मसलन भोजन और उन वस्तुओं से दूरी बनाये जाए जो हमें नापसंद है यथा प्रकाश। अब बात परीक्षण की:
एक पेट्री डिश लेकर उसके एक तरफ ५ ग्राम कुछ खाद्य पदार्थ या भोजन रखते है और साथ में उस क्षेत्र को प्रकाशित कर देते हैं और उसी पेट्री डिश की दूसरी तरफ थोड़ा कम भोजन की मात्रा ३ग्राम रखते हैं जहाँ अँधेरा है. अब पेट्री डिश के बींचो- बीच स्लाइम मोल्ड के समूह को रख देते हैं। स्पष्ट है, स्लाइम मोल्ड के पास दो विकल्प हैं, एक जहाँ भोजन की मात्रा अधिक है पर जहाँ रौशनी है और दूसरा, खाना काम है मगर जहाँ अँधेरा है. निर्णय मुश्किल है. अब प्रश्न है, स्लाइम मोल्ड पेट्री डिश के किस तरफ आकर्षित होंगे? परीक्षण में देखा गया कि दोनों विकल्पों को  ५०-५० % समय तरजीह दी गयी. यानी आधे समय ३-डार्क की तरफ और आधे समय ५-लाइट की तरफ स्लाइम मोल्ड जाते दिखे.  है न आश्चर्यजनक !

अब  इस परीक्षण को थोड़ा और रोचक बनाते हैं, पेट्री डिश में अब एक अँधेरे क्षेत्र में १ग्राम  भोजन रख कर तीसरा विकल्प जोड़ देते हैं.  स्लाइम मोल्ड अब क्या निर्णय लेंगे? कह सकते हैं, इस तीसरे विकल्प का तो स्लाइम मोल्ड द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाना चाहिये और निर्णय में कोई फर्क नहीं आना चाहिए। पर क्या ऐसा है? नहीं, परीक्षण में देखा गया कि निरर्थक से लगने वाले इस  विकल्प के यहाँ जोड़ देने से स्लाइम मोल्ड पहले विकल्प (५ लाइट) की जगह  दूसरे विकल्प  (३ डार्क) को ज्यादा तरजीह देने लगते हैं. जहाँ दोनों विकल्प  पहली स्थिति में एक समान तरज़ीह पा रहे थे वहीँ दूसरी स्थिति मतलब तीसरे विकल्प जोड़ देने के बाद, दूसरे विकल्प की तरफ तीन गुना ज्यादा दफा स्लाइम मोल्ड आकर्षित हुए. इसका मतलब क्या कि बिलकुल बेतुके से दिखने वाले किसी विकल्प को जोड़कर स्लाइम मोल्ड द्वारा लिए गए निर्णय को अपने हिसाब से तोडा मरोड़ा जा सकता है? जी हाँ, ऐसा संभव है. और हाँ, नीलकण्ठों, मधुमक्खियों और हम्मिंगबर्ड्स के साथ किये गए परीक्षणों में भी यही पाया गया.

अब आई बात समझ में! तो क्या, इंसानों द्वारा लिए गए निर्णयों को भी किसी एक विशेष विकल्प की तरफ मोड़ा जा सकता है? जी हाँ, हम इंसान भी ऐसे ही विकल्पों के चक्कर में फँसकर कई बार ऐसे ही विवेकहीन निर्णय लेने पर मजबूर किये जाते हैं. इसे एसिमेट्रिक डोमिनेन्स इफ़ेक्ट या डिकॉय इफ़ेक्ट की संज्ञा दी जाती है.

डिकॉय इफ़ेक्ट को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. हम सब सामान्यतः चीजों को कैसे पसंद करते हैं, उपलब्ध विकल्पों से तुलना करके, विकल्पों को एक दूसरे के साथ नापजोख कर और यहीं हम इसके चपेट में आ जाते हैं. एक ऐसे विकल्प का निर्माण कंपनियों द्वारा पेश किया जाता है जो कि तुलनात्मक रूप से तीनों विकल्पों से निम्नतम श्रेणी का है पर किसी एक विकल्प को किसी पैमाने पर अपने से श्रेष्ठ बना देने में सक्षम। यहीं मानव मस्तिष्क गच्चा खा जाता है और तुच्छ होते हुए भी वह विकल्प हमारे निर्णय को किसी एक विशेष विकल्प तक झुकाने में कामयाब हो जाता है.


डैन एरियल की किताब प्रेडिक्टेबली इरेशनल में दिए गए उदाहरण के द्वारा कोशिश करते हैं. कल्पना करिये, द इकोनॉमिस्ट पत्रिका की वार्षिक सदस्यता लेने के लिए ग्राहकों को दो विकल्प दिए गए हैं-


• केवल डिजिटल संस्करण $59 के भुगतान पर

• केवल प्रिंट संस्करण $125 के भुगतान पर


अपनी जरूरतों और पसंद के आधार पर ग्राहक इनमे से कोई भी विकल्प को चुनने के लिए स्वतंत्र है. जब लेखक ने अपने विद्यार्थियों को इनमे से एक विकल्प को चुनने को कहा तब ६८% विद्यार्थियों ने पहले विकल्प को चुना और ३२ % ने दूसरे विकल्प को. मतलब पहला विकल्प ज्यादा लोकप्रिय पाया गया.


अब इस परीक्षण में पत्रिका द्वारा शामिल किये गए तीसरे विकल्प को जोड़ दिया तब विद्यार्थियों को तीन विकल्प मिले:

• केवल डिजिटल संस्करण $59 के भुगतान पर

• केवल प्रिंट संस्करण $125 के भुगतान पर

• प्रिंट और डिजिटल संस्करण $125 के भुगतान पर


अब चीजें कैसे बदली, देखते हैं. जहाँ ६८ % लोगों ने पहले विकल्प को चुना था, अब उनकी संख्या घटकर १६ % रह गयी, दूसरे विकल्प को किसी ने पूछा तक नहीं और ८४ % लोगों ने तीसरे विकल्प में अपनी दिलचस्पी दिखाई. हमारे दिमाग ने उसे यूँ समझा, हालाँकि पहले दो विकल्प एक ही तरह से एक दूसरे से बढ़िया हैं और जो तीसरा कॉम्बो डील है, एक तो वह दोनों अन्य विकल्पों की तुलना में बढ़िया है वहीँ दूसरे विकल्प जितने ही दाम में उपलब्ध है यानी अन्य दोनों विकल्पों से बेहतर है. क्या इस निर्णय को वाकई बढ़िया निर्णय कहा जा सकता है?


अब निम्न दो उत्पादों पर नजर डालते हैं:

A) Hard Drive with 500 GB for $150.

B) Hard Drive with 300 GB for $100.

अगर आपको ज्यादा हार्ड ड्राइव स्पेस चाहिए तो पहले को खरीद सकते हैं और यदि आप ज्यादा पैसा नहीं लगाना चाहते तब दूसरे को. अब अगर यहाँ एक तीसरा विकल्प लाया जाय जो ऐसा है

C) Hard Drive with 400 GB for $170.

तब आप क्या करेंगे? देखा जाता है की ऐसी स्थिति में ऑपशन A चुनने वालों की संख्या में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हो जाती है. चलिए अगर कंपनी को विकल्प B की तरफ लोगों को आकर्षित करवाना है तो क्या कोई एक विकल्प और ढूँढा जा सकता है? सोचिये !


आइंदा अगर कोई सामान खरीदते वक्त प्रदत्त विकल्पों में से कोई एक विकल्प आपको हास्यास्पद लगे तो सावधान हो जाइये, हो सकता है उत्पादक मूर्खतावश ऐसा न कर रहे हों. ज्यादा संभावना है कि वह हमारे 'साइकोलॉजिकल बग ' का फायदा उठाकर अपने विशेष सामान की बिक्री बढ़ा रहे हों.


कई गणितज्ञों ने इस अवधारणा को बोरडा काउंट पद्धति से विकल्पों को पसंद के आधार पर अंक आबंटित कर समझाने की कोशिश की है. स्लाइम मोल्ड के परीक्षण को इस तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. मान लेते हैं, जो विकल्प पसंद के क्रम में सबसे ऊपर है उसे २ अंक, द्वितीय स्थान पर रखे जाने वाले को १ अंक और तीसरे अर्थात सबसे नीचे रखे जाने वाले को 0 अंक दिए जाएंगे।


स्लाइम मोल्ड के साथ किये गए परीक्षण के पहले केस जिसमें दो विकल्पों, ५ लाइट और ३ डार्क से शुरू करते हैं। ।मान लेते हैं कि प्लास्मोडियम के ५०% स्लाइम मोल्ड (फ़ूड लविंग ) अधिक भोजन को तरजीह देते हैं और ५०% (लाईट हेटिंग) अँधेरे को. और आगे मान लें कि ५लाईट वाले विकल्प को ५०% स्लाइम मोल्ड से २-२ अंक मिलते हैं और बाकी स्लाइम मोल्ड से 0 अंक. इस तरह दूसरे विकल्प को भी ५० % स्लाइम मोल्ड से २-२ अंक मिलेंगे और बचे स्लाइम मोल्ड 0 अंक देंगे । ऐसी स्थिति में पहले विकल्प को मिलेंगे

२*0 . 5 +०*0 . 5 यानि १ और दूसरे विकल्प को भी मिलेंगे 0 *0. 5+२*0 . 5 यानि दोनों को १ -१ पॉइंट मिलते हैं।



अब दूसरे केस में, जहाँ तीसरा विकल्प १- डार्क भी जुड़ गया है वहां अंकों का बंटवारा थोड़ा अलग होगा। देखते हैं: ५ लाइट को जस का तस आधे स्लाइम मोल्ड से २ -२ अंक मिलेंगे और लाइट हेटिंग मोल्ड देंगे 0. तब कुल अंक हो गए 1.


३ -डार्क को फुड लविंग जो कि ५०% हैं, वो दूसरे स्थान पर रखेंगे और अंक मिलेगा १ और साथ ही, लाइट हेटिंग जो कि कुल स्लाइम मोल्ड के ५०% हैं, तीसरे विकल्प के जुड़ जाने के बाद इस ५०% समूह के २५% या तो पहले स्थान पर रखेंगे अथवा दूसरे स्थान पर. इस तरह ३-डार्क के कुल अंक होंगे 1 *५०%+२*२५%+१*२५% यानि की कुल अंक 1. २५


१ डार्क के विकल्प को फ़ूड लविंग द्वारा तीसरे स्थान पर रखने और लाइट हेटिंग बैक्टीरिया के समूह (५०%)द्वारा या तो पहले स्थान पर रखने अथवा दूसरे स्थान पर रखने की स्थिति में कुल अंक मिलेंगे:


0 *0. 5 +१ *0. 2 5 +२*0. २५ यानि कुल 0. 75


अर्थात तीसरे विकल्प के आ जाने से ३-डार्क वाला विकल्प ज्यादा लोकप्रिय बन गया! है न ये ब्यूटी ऑफ़ डिकॉय इफ़ेक्ट।

Thursday, 4 October 2018

फोर्टनाइट! ये क्या बला है ?



क्या आपने सुना, पति-पत्नी के रिश्तों में अलगाव के लिए कई कारणों मसलन ड्रग्स, नशा,जुआ, बेवफाई, दहेज़ इत्यादि के अलावा एक और कारण भी हो सकता है, वह है फोर्टनाइट। फोर्टनाइट, भला ये क्या बला है?तो सुनिए, यूके की एक वेबसाइट 'डिवोर्स ऑनलाइन' द्वारा कराये गए एक सर्वे के मुताबिक यूके में जनवरी से लेकर अभी तक फाइल हुए ४६६५ तलाक के मामले में २०० याचिकाओं में प्रमुखता से 'फोर्टनाइट गेम खेलने की लत' को जिम्मेदार बताया गया है। डिजिटल क्रांति का यह दौर कहीं 'फुटबॉल विडो' के तर्ज़ पर 'फोर्टनाइट विडो जैसा कुछ इज़ाद तो नहीं कर रहा? स्पष्ट है, यह गेम महज बच्चों को ही नहीं वरन वयस्कों को भी अपनी ओर आकर्षित करने में उतना ही सक्षम है। खिलाडियों की संख्या के लिहाज से देखें तब इसने अन्य सभी ऑनलाइन खेले जा रहे गेम को पीछे छोड़ दिया है. आंकड़ें कहते हैं, अभी तक यह गेम १२५ मिलियन लोगों द्वारा डाउनलोड किया जा चुका है जबकि नवम्बर २०१७ में यह संख्या २०मिलियन ही थी। निश्चित रूप से संख्या में यह उछाल इस गेम की बेमिसाल लोकप्रियता की पुष्टि करता है। ख़बर है, हर महीने औसतन चार करोड़ लोग इस खेल को खेलते भी हैं। फोर्टनाइट बैटल रोयाल गेम के प्रति लोगों का जनून इस कदर है कि प्रतिद्वंद्वियों को मात देने के लिए लोग अच्छी खासी रकम का भुगतान कर कोच की मदद तक ले रहे हैं☺

क्या है फोर्टनाइट
माना जाता है कि प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री विलियम हिगिनबाथम द्वारा सन १९५८ में बनाये गए 'टेनिस फॉर टू' नामक वीडियो गेम से ऑनलाइन गेमिंग की शुरुआत हुई थी। तब से लेकर अब तक कई ऑनलाइन गेम्स ने लोगों को अपना दीवाना बनाया है और 'फोर्टनाइट बैटल रोयाल' को इसी कड़ी का नवीनतम सदस्य माना जा सकता है।

यह गेम एक पोस्ट अपोकलिप्टिक दुनिया या कहें एक खत्म होती दुनिया में खुद का अस्तित्‍व बनाए रखने की जद्दोजहद से जुड़ा है जिसे खेलने के लिए खिलाड़‍ियों को खुद का ऑनलान अवतार तैयार करना होता है। शुरुआत होती है, 100 खिलाडि़यों को एक सिकुड़ती दुनिया में भेज दिए जाने से, या तो अकेले या फिर ४ के समूह में, जिनके पास अलग-अलग टास्‍क पूरा कर खुद को जिंदा रखने की चुनौती है। तमाम बधाएं पार करके, जोम्बियों से मुकाबला कर अंत तक जो जीवित बचेगा वही विजेता घोषित किया जायेगा । हालांकि हरेक खिलाड़ी को मात्र एक कुदाल जैसे हथियार के साथ गेम की शुरूआत करनी होती है, लेकिन खेल के दौरान खेल के मैदान में उपलब्ध कई तरह के हथियारों, कवच और उपकरणों को हासिल कर अपने को शक्तिशाली बनाया जा सकता है, उनका उपयोग कर दुश्मनों को फंसाने के लिए तरह- तरह के जाल बनाये जा सकते हैं और खुद दुश्मनों से बचने के लिए वहां के लैंडस्केप और भवनों को ढूंढ सकते हैं। यह भी संभव है कि कई अन्य संसाधनों की खोज कर उनकी सहायता से भी ऐसी संरचनायें अपने बल पर निर्मित की जाए जहाँ खिलाड़ी खुद को मुश्किल की घडी में छिपा सकें और अपनी रक्षा कर सकें। लक्ष्य होता है, यथासंभव अपने दुश्मनों को मार भगाते हुए शस्त्रागारों को खाली कर देना।


इन सब घटनाओं के साथ -साथ, खेल के आभासी मैदान में एक बड़ा- सा गोला दिखाई देना और उसे खिलाडियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया जाना और कुछ- कुछ मिनटों में उस गोले का सिकुड़ते चला जाना खेल को और रोचक बनाता जाता है. बस यही नहीं, इस गोले के किसी हिस्से में फिर से एक नया गोले का यकायक बन जाना और अब उस नए बने क्षेत्र को सुरक्षित कह कर खिलाडियों की चुनौतियाँ को बढ़ा देना खेल के प्रति खिलाडियों को और भी गंभीर बना देता है। ऐसे किये जाने का मकसद होता है सभी प्रतिद्वंदी खिलाड़ियों को आस-पास होने को मजबूर किया जाना और मुकाबले को और भी दिलचस्प बनाना।

फोर्टनाइट को लेकर लोगों के दिल और दिमाग पर छाया नशा, कीबोर्ड पर तेजी से खटखटाती उंगलियां सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इसके इतनी तेजी से लोकप्रिय होने के क्या कारण हैं? इसी अवधारणा पर आधारित अन्य गेम मसलन माइनक्राफ्ट, PUBG या WoW की तुलना में क्या खास है फोर्टनाइट मे?

क्या खास है फोर्टनाइट में

हर तरह के प्लेटफार्म जैसे एंड्राइड , ios , मैक ,विंडोज और गेमिंग कंसोल पर यह गेम मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है। यह एक मल्टीप्लयेर गेम है, दोस्तों के साथ मिलकर इसे खेला जा सकता है |प्रतिभागी अपने हेडसेट और माइक्रोफोन से लैस होकर एक दूसरे से चैट भी कर सकते हैं. कई बच्चों ने तो बाकायदा फोर्टनाइट टीम का गठन किया है और साथ में अभ्यास भी करते हैं.

लोगों का मानना है कि अन्य इसी श्रेणी के खेलों की तरह इसे गंभीर न बनाकर इस गेम को हल्के - फुल्के , आसान और मजेदार रूप में पेश करना इसे अन्य गेम की तुलना में अधिक लोकप्रिय बनाता है। इसके रंग -बिरंगे ग्राफिक्स लोगो को बहुत पसंद आते हैं. इमोट्स फोर्टनाइट का एक खास फीचर है जिसके तहत कई तरह के इमोट्स को अपनी इच्छानुसार खास बटन कमांड के रूप में परिवर्तित किये जाने की खिलाडियों को एक खास सुविधा दी गयी है. कई तरह की छोटी-छोटी चीजें इस गेम को लोकप्रिय बनाने में मददगार रही है जैसे किसी खिलाड़ी की जीत की ख़ुशी में किया गया छोटा- सा नृत्य। यह नृत्य बहुतों को बचकानी लग सकती है, पर सच्चाई है कि यह निराला अंदाज खिलाडियों को बहुत भा रहा है।

माइनक्राफ्ट गेम की तरह इसमें भी खिलाडियों को कई तरह की सामग्रियों जैसे पत्थर, लकड़ियां, कई तरह के धातु को जुटाने का साहसिक काम और उन सामग्रियों का उपयोग होशियारी और रचनात्मक तरीके से करना होता है ताकि दुश्मनों से छिप कर अपने को बचा सकें। इसके अलावा फोर्टनाइट में किसी ऊँची जगह या पहाड़ों पर चढने के लिए सीढ़ियों को बनाने का अवसर मिलता है, अपनी सुरक्षा के लिए एक ऊँची दीवार बनानी पड़ सकती है, लकड़ी की सहायता से किले बनाने होते हैं।

अन्य इसी श्रेणी के खेलों से यह इस मामले में भिन्न है की इसमें खिलाड़ियों को अपनी जरूरतों, रूचि के हिसाब से मैप में परिवर्तन लाने की छूट दी गयी है।

इतना ही नहीं, हर कुछ दिनों में नए-नए चरित्रों, हथियारों , पोशाकों, नृत्य मुद्राओं, मैप लोकेशन को गेम में समावेश कर खिलाडियों के समक्ष कुछ नया पेश कर लोगों की इस खेल में दिलचस्पी बनाये रखने की पूरी कोशिश की जाती है। जैसे कि गार्जियन ऑफ़ द गैलेक्सी के स्टार लार्ड से प्रेरित रस्ट लार्ड आउटफिट का गेम में उपलब्ध होना।

गेम बनाने वाली कंपनी 'एपिक गेम्स 'खिलाडियों के कमेंट और फीडबैक को नजरअंदाज नहीं करती है। कंपनी की इस नीति ने यकीनन इस गेम को लोकप्रिय बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।गेम में किसी तरह की त्रुटि के उजागर किये जाने पर यथाशीघ्र उसका हल निकाला जाता है।

पिछले सीजन के गेम पर नजर डालें तब देख सकते हैं कि जहाँ प्रतिद्वंदियों को हराने के लिए एक बेहतर रणनीति का बनाये जाने के लिए सामग्रियां उपलब्ध कराई गयी हैं वहीँ मनोरंजन की दृष्टि से कई फनी तरीकों को भी शामिल किया गया है, जो हास्यास्पद होते हुए भी लोगों को आकर्षित करने में सफल भी हुए हैं जैसे दुश्मन को फॅसाने के लिए जमीन पर या छतों पर जाल बिछाना, दुश्मनों से बचने के लिए अपने आप को किसी अन्य रूप में परिवर्तित कर सकना, राकेट लांचर से राकेट पर जा पहुँचना या फिर किसी दुशमन पर बूगी बम फेंककर उसे नाचने पर मजबूर कर देना !!


खिलायों को गेम में अपनी मर्ज़ी के हिसाब से कुछ परिवर्तन किये जाने की छूट दी गयी है, चाहे तो तत्काल युद्ध में शामिल हो सकते हैं या कुछ इंतज़ार के बाद, या तो बहुत भीड़ -भाड़ इलाके में अपने आप को डाल सकते हैं या नहीं, मतलब अपनी मर्ज़ी, अपनी रणनीति। चाहे तो इंतज़ार कर सकते हैं उस समय का जब केवल १० खिलाड़ी बचे हों। मतलब अपने गेमप्ले को खुद निर्धारित करने की पूरी स्वतंत्रता प्रदान की गयी है।

अब आते हैं फोर्टनाइट की एक अन्य खास बात पर! यह गेम मुफ्त में उपलब्ध है, कहने का मतलब कि बिना एक भी पैसे का भुगतान किये इस गेम को खेला जा सकता है. पर, मार्किट रिसर्च फर्म सुपर डेटा द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस गेम का अप्रैल २०१८ में २९६ मिलियन डॉलर अर्जित किया जाना अचंभित नहीं करता? फ्री गेम और आय इतनी! माजरा क्या है? बात यह है कि कुछ पैसे देकर इस गेम में बेसिक बैटल पास या कुछ अधिक पैसे देकर प्रीमियम बैटल पास ख़रीदा जा सकता है और इससे खरीदने वालों को एक्सेस मिलता है विशिष्ट परिधानों, बैग या फिर चमचमाते कुदाल जैसी चीजों पर. इसके अलावा यदि कोई अच्छा खेलता है और गेम के लिए सेट साप्ताहिक चुनौतियों को पार करता है तब उसे पॉइंट्स दिए जाते है जिसका उपयोग कर वह अन्य चीजों पर एक्सेस प्राप्त कर सकता है। बैटल पास के लिए कुछ निश्चित V-Buck भुगतान करने होंगे, अब आप पूछेंगे कि ये क्या बला है? जी, दुनिया अलग है तब मुद्रा भी तो अलग होगी? खैर बता दें, १००० V-Bucks को डाउनलोड कररने के लिए £7.99 पौंड चुकाने होंगे। इसके लिए और भी अन्य स्किम खेल संचालकों ने मुहैया कराई है जो की गेम के एक सीजन तक ही वैध है। यहाँ बता दें,फोर्टनाइट गेम सीजन में डिवाइडेड है और तत्काल सीजन ६ चल रहा है . कुछ पोशाकों को अलग से खरीदने का भी प्रावधान है। पर यहाँ उल्लेखनीय है, बैटल पास के माध्यम से खरीदी गयी चीजों से कोई भी खिलाड़ी अधिक शक्तिशाली नहीं बन रहा है और उससे उसके गेम खेलने की कला पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। यह पूर्णतः कॉस्मेटिक बदलाव है। इस खेल को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि कुछ नवीनतम और विशेष परिधानों तक पहुँच बनाने के लिए खिलाडियों को और अधिक खेलते रहने को विवश होना पड़ता है।

हालाँकि बच्चों के खेलने के समय पर नियंत्रण के दृष्टिकोण से पैरेंटल कण्ट्रोल जैसी सुविधा दी गयी है, पर उसके एवज में किसी खिलाडी के बीच में गेम छोड़ देने की स्थिति में चल रहे मुकाबले में अर्जित पॉइंट्स में उस खिलाडी के दल को कुछ अंक गंवाने पड़ते हैं।


गेम की बच्चों के मध्य बढती लोकप्रियता ने निश्चित रूप से माता - पिता और अभिभावकों को चिंता में डाला है. ब्लू व्हेल गेम और मोमो चैलेंज खेलने वाले कुछ बच्चों द्वारा आत्महत्या करने की खबरों ने सतर्कता बरतने को जरूरी भी बनाया है। कंपनी ने इस बाबत अपने बचाव में दावा किया है कि उनके द्वारा गठित सेफ्टी टीम अपलोड किए गए सभी ईमेजेज, वीडियो और ऑडियो फाइल को रिव्यू करती है। मल्टीप्लेयर शूटर गेम होने के बावजूद मार-पीट, खून-खराबे जैसे तत्व न डालकर इस गेम को बच्चों के अनुकूल बनाये रखने की कोशिश की गयी है।

यह सर्वविदित है, आज के डिजिटल युग में डिजिटल नशे के रूप में पहचाने जाने वाले ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया इत्यादि समाज पर गहरा असर करते दिख रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संघटन द्वारा 2018 में प्रकाशित 'इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ़ डिजीजेज' के 11वें संस्करण में 'गेमिंग डिसऑर्डर' को एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के तौर पर चिह्नित कर इसकी निगरानी किए जाने को जरूरी बताना, इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की वकालत भी करता है। कई देशों में सोशल मीडिया एडिक्शन स्केल नामक पैमाना भी ईजाद किया गया है, जिसके जरिये पता लगाया जाता है की किसे सोशल मीडिया की कितनी लत है और उसके आधार पर डी एडिक्शन क्लास में ले जाने और इलाज कराने की व्यवस्था भी की गयी है।

परन्तु इसका मतलब यह नहीं की सभी प्रकार की गेमिंग बुरी है, अगर WHO के ही आंकड़े पर ध्यान दें, तब मात्र २ से ३ प्रतिशत खिलाडी ही गेमिंग डिसऑर्डर के शिकार है। पर हाँ, अति सर्वत्र वर्जयेत की तर्ज़ पर इतनी सलाह दी जा सकती है कि इनके अत्याधिक उपयोग से बचें ताकि किसी तरह के नुकसान को न झेलना पड़े।








































Thursday, 23 August 2018

बाल कहानी: द डे द क्रेयॉन्स क्विट

बाल कहानी: द डे द क्रेयॉन्स क्विट

कहानियां सुनने-सुनाने का इतिहास बहुत ही पुराना है. बस ज़िक्र हो कहानियों की और मन कल्पना के अथाह सागर में डुबकी लगाने को तत्पर हो जाता है. खासकर बच्चों की बात करें, उनकी आँखों में आई चमक को देखकर कहानियों के महत्व को समझा जा सकता है. कहानियों अपने विभिन्न पात्रों चाहे चाँद -सितारे हों या उमड़ते -घुमड़ते बादल, गुड्डे -गुड़िया या नन्ही चिड़िया, पेड़ या पर्वत, कोमल से खरगोश या गर्जन करते शेर,राजा-रानी या परियां और चुड़ैल, के माध्यम से जहाँ बच्चों को अचरज से भर देती हैं वहीँ उनकी कल्पनाशीलता को नए आयाम देती हैं. कहना गलत न होगा, एक अच्छी कहानी के द्वारा बच्चे के मन के उड़ान का अंदाजा लगाना असंभव है. कहानियां बच्चों की कल्पनाशीलता को तो बढ़ाती ही है साथ ही भाषा एवं व्याकरण का ज्ञान, देश- दुनिया की कई जानकारियां, मानव जीवन के जरूरी पहलूओं से परिचय भी कराती है। निसंदेह,कहानियां बच्चों का मनोरंजन कर ख़ुशी भी देती हैं, कुल मिलाकर इसे एक अत्यंत जरूरी सार्थक गतिविधि कहा जा सकता है. और, माता-पिता, शिक्षक और अभिभावकों द्वारा बच्चों का बचपन में ही किताबों से दोस्ती कराया जाना और पढ़ने की आदत डलवाना एक अनुपम उपहार साबित होता है.

पर यहाँ कई सवाल खड़े होते हैं जैसे किताबें कैसी हों, बच्चों की रूचि कैसे जगाई जाए? सबसे महत्वपूर्ण है, बाल साहित्य का बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध होना और साथ ही हरेक बच्चे के पसंद के हिसाब की किताबें चुनने की व्यवस्था का होना। हर बच्चे की पसंद अलग-अलग होती है, किसी को परीकथाएं पसंद आती हैं, किसी को साहसिक कारनामे से जुड़े किस्से या किसी को साइंस फिक्शन. जरूरी है, बच्चों की अभिरूचि, आस-पास के परिवेश, जरूरतें,समझ के स्तर ,उनकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखकर कहानियां और कवितायेँ पढ़ने को दी जाएँ, खूबसूरत चित्रों के साथ प्रकाशित कहानियां उनमे पढ़ने के उत्साह को और बढ़ा देती है. इस बात को न भूला जाए की बच्चे बड़ों से भिन्न होते हैं. बाल साहित्य के क्षेत्र में काम करने वालों का यह भी मानना है कि बालसाहित्य के नाम पर नीति, धर्म, अध्यात्म आदि को केंद्र में रखकर छापे जा रहे ‘उपदेशक साहित्य’ के अलावा बच्चों की रुचि, मनोरंजन एवं उपयोगिता को केंद्र में रखकर बाल साहित्य की रचना ज्यादा जरूरी है ताकि इनके माध्यम से बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ- साथ भविष्य की चुनातियों से निपटने के लिए तैयार भी किया जा सके. एक अच्छा बाल साहित्य उसे ही समझा जा सकता है जिसमें मात्र सीख की ही बात न हो वरन बच्चों की भागीदारी भी महसूस की जाए, बच्चों को जवाबदेही की प्रक्रिया से जोड़ा जाए. ऐसा साहित्य जो केवल राजा-रानी, परियों, सुन्दर वन तक ही सीमित न होकर जिंदगी की पेचीदगियों से रूबरू कराये और विचारने की समझ विकसित करने में उनकी मदद करे. बच्चों के कोमल मन जैसी अवधारणा के आड़ में दुनिया की जटिलताओं से परिचय नहीं कराने और उनसे दूर ले जाने से से बेहतर यह नहीं की उन्हें इन विषयों की जानकारी देकर उनसे निपटने में उनकी मदद की जाए । इस तर्ज़ पर कि गन्दगी न देखने से गन्दगी खत्म नहीं हो जाती, गन्दगी खत्म करनी है तब हमें गन्दगी से जूझना होता है.

चलिए आज बात करते हैं कथाकार ड्रियू डेवॉल्ट और चित्रकार ऑलिवर जेफर्स की जोड़ी द्वारा बच्चों के लिए रचित एक मनोरंजक कहानी 'द डे द क्रेयॉन्स क्विट' की. खूबसूरत चित्रों से सजी एक छोटे बच्चे डंकन और रंग भरने वाले क्रेयॉन की समस्याओं की कहानी! ड्रियू डे वॉल्ट की २०१३ में प्रकाशित जहाँ यह पहली पुस्तक थी वहीँ इस कहानी में चित्रों से जान डालने वाले ऑलिवर जेफर्स उस समय तक बाल साहित्य के क्षेत्र में अच्छा मुकाम पा चुके थे. उनकी पहली ही किताब 'हाउ टू कैच अ स्टार' बच्चों का मनोरंजन करने में काफी सफल रही थी। इसके अलावा लॉस्ट एंड फाउंड, द इनक्रेडिबल बुक ईटिंग बॉय और स्टक भी खूब चर्चा में रही है. खासकर उनके द्वारा बनाये गए बच्चों की तरह बनाये गए चित्रों और हस्तलिखित स्टाइल से लिखी गयी कहानियों को लोगों ने खूब सराहा.

यह किताब भी उसी अंदाज में लिखी गयी है. शायद, बच्चों के लिए कहानी से खुद को जोड़ना स्वाभाविक और आसान बन जाता है. बड़े और छोटे लेटर्स को मिलाकर लिखने में की जाने वाली गलतियां इस कहानी में देखने को मिलती है और एक सुखद अहसास कराती है! कहानी है एक बच्चे डंकन की और असंतुष्ट क्रेयॉन्स की! पात्रों के रूप में क्रेयॉन का चुना जाना निश्चित रूप से अचंभित करता है, पर साथ में कहानी पात्रों के चयन से रोचक भी बन जाती है. सरल भाषा शैली इसे और भी मनोरंजक बनाती है. जैसा की ऊपर लिखा है, चित्रों ने कहानी में जान दाल दी है. क्रेयॉन के हाथ में प्लाकार्ड{घोषणापत्र) और उस पर लिखा उनका सन्देश 'we are not happy' आपको खुलकर हसने पर मजबूर करता है.

कहते है, एक असंभव सी कल्पना और फंतासी की रचना बच्चों को वास्तविकता से भरी कहानियों के मुकाबले अधिक मनोरंजन करने में सफल होती हैं. इस दृष्टि से लेखक यहाँ सफल दिखाई देते हैं.

कहानी शुरू होती है डंकन को मिले हरेक रंगों के क्रेयॉन द्वारा लिखे गए पत्रों से. हर क्रेयॉन ने पत्र के माध्यम से अपनी समस्याएं डंकन को बताई है. मसलन, लाल रंग की समस्या यह है कि पूरे साल तो काम में लगा ही रहता है और छुट्टियों में भी सांता और वैलेंटाइन को रंग-रंग कर थक चुका है, वहीँ बीज की शिकायत यह है कि उसे काम ही नहीं मिलता, भूरे रंग को भालू, घोड़े और पप्पी मिल जाते हैं और उसके पास आता है गेंहूं और गेंहू में रंग भरने में किस बच्चे को मजा आता है आदि ? पीले और नारंगी रंग के मध्य विवाद को सुनकर आप आश्चर्यचकित हो सकते हैं वहीँ सफ़ेद रंग के केवल बर्फ और बिल्लियों को ही रंग सकने के तर्क को सुनकर हतप्रभ! क्या हल निकालेगा डंकन सबको खुश करने का? समस्या का समाधान है, डंकन द्वारा लिया गया एक बोल्ड निर्णय, एक कलात्मक अंत.
शिकायतों का पुलिंदा होते हुए भी कहानी बोझिल नहीं होती, कह सकते हैं की लेखक ने ह्यूमर को एक -एक पंक्ति में बचाकर रखा है. लेखन शैली में दोहराव नहीं है, हरेक पत्र को पढ़ने में उतना ही मजा आता है जितना पहले पत्र को पढ़ने में. चित्रों के माध्यम से हरेक क्रेयॉन के अलहदा व्यक्तित्व ,मनोभावों यथा गुस्सा, दुःख, थकान आदि को बखूबी दर्शाया गया है.

सबसे खास बात इस कहानी की, आप अपने बच्चों को देख सकते हैं एक अलग ही कल्पना करते, उनके बनाये रंगीन चित्रों से दीवारों को सजाते ..तैयार हैं आप☺

Friday, 27 July 2018

कुछ ख्याल: मुंबई के कुछ उपनगरों से गुजरते हुए

छोटी -छोटी बूँदें मूसलाधार बारिश में तब्दील होकर मुंबई में हरेक साल नए कीर्तिमान बनाती है। कई अप्रिय घटनाएं मन को व्यथित करती हैं, वहीँ हमें सोचने पर मजबूर भी कि क्या इन मुसीबतों का हल नहीं ? प्रकृति के इस कहर के जिम्मेवार हम ही हैं और इनका समाधान हमें ही ढूंढना होगा। 

ऐसी ही लगातार होती बारिश के भय ने हमारे पिछले कुछ वीकेंड्स में घूमने जाने की योजना पर भी पानी फेर दिया।प्रकृति की रहमदिली ही कहिये, पिछले रविवार मौसम ने हमारा साथ दिया और हम निकल पड़े मुंबई की एक छोटी सैर पर. घूमने की जगहों की एक लम्बी सूची में से हमने इंडोर जगह घूमने को ही प्राथमिकता दी, और चुना मुंबई के एक उपनगर भायखला (Byculla )स्थित डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय को। खुशकिस्मती हमारी कि हमने एक ही परिसर में अवस्थित होने के कारण और प्रकृति की दया से संग्रहालय से ही सटे वीरमाता जीजाबाई उद्यान और ज़ू के भी दर्शन किये।एक तरफ जहाँ मुंबई की पुरानी कला-संस्कृति को जानने का मौका मिला वहीँ दूसरी तरफ प्रकृति को थोड़ा करीब से देखने का अवसर।

भायखला जाने के लिए हमें ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पकड़नी थी, ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे यानि EEH, मुंबई के दक्षिणी और उत्तरी भाग को जोड़ती२३.५५ किमी लम्बी सड़क। छत्रपति शिवजी टर्मिनस से ठाणे तक दौड़ती और मुंबई के पूर्वी उपनगरों को एक-एक कर छूते हुए, रोजाना लाखों की संख्या में लोगों को अपने मुक़ाम तक पहुँचाती यह सड़क ।और, इस सड़क के समानान्तर दौड़ती है मुंबई की लाइफ लाइन 'लोकल ट्रेन' की सेंट्रल लाइन। मुंबई के पूर्वी सबर्ब को 'ईस्ट' और 'वेस्ट' में विभाजित करते हुए। मसलन घाटकोपर ईस्ट, घाटकोपर वेस्ट और दादर ईस्ट, दादर वेस्ट इत्यादि।

यात्रा शुरू हो चुकी थी। योजनानुसार, घाटकोपर से ईस्टर्न एक्सप्रेस लेकर कई पूर्वी उपनगरों को लांघकर भायखला पहुँचना था। रविवार को अपेक्षा के अनुरूप सड़क पर गाड़ियों की संख्या कम ही थी. सबसे बड़ा फायदा यह कि पहुँचने और लौटने के समय का अनुमान लगा पाना संभव है. सबसे पहले पहुंचे घाटकोपर, हाँ वही मुंबई का पूर्वी सबर्ब घाटकोपर जो पिछले महीने एकचार्टर्ड प्लेन के एक निर्माणाधीन इमारत से टकराने की हृदय विदारक घटना, की वजह से समाचारों में था । एक घनी आबादी वाला मुंबई का उपनगर ,जहाँ से मेट्रो रेल पकड़कर मुंबई के पश्चिमी सबर्ब वर्सोवा तक जाया जा सकता है. हाँ, मुंबई के पूर्वी हिस्से को पश्चिमी हिस्से से जोड़ने वाली मुंबई की पहली मेट्रो लाइन का एक मुख्य स्टेशन घाटकोपर।

ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर हम चल रहे हैं, सड़क के दोनों ओर यातायात सम्बन्धी हिदायतें देते बोर्ड दीखते हैं, हमारी ही सुरक्षा के लिए हमें सावधान करते निर्देश। स्पीड लिमिट का एक एक बोर्ड जिस पर एक लाल रेखाओं से बने एक वृत्त के मध्य ४० लिखा है, पर सड़क पर हवा से बातें करती गाड़ियों को देखकर आगे लगे बोर्ड पर नजर ठहरती है और याद आती है २ दिन पहले ही बच्चों के क्लासेज के सन्दर्भ में बातचीत के दौरान किसी की कही हुई बात, आई लव रूल्स, सीरियसली! मैं सोचने लगती हूँ, डू वी ???

घाटकोपर छूटा और पहुंचे वडाला । हरेक उपनगर अपने आप में भरा पूरा एक शहर। ट्रैफिक लाइट पर दीखती हैं, ग्रीन लाइट होने के इंतज़ार में खड़ी गाड़ियों में बैठे लोगों को फूल की मालाएँ बेचने की कोशिश करती घस्त्रियां और बच्चे। ध्यान में वो साडी चीजें एक के बाद एक आने लगती है, जो यूँ ही ट्रैफिक लाइट पर ख़रीदे हैं मैंने, छोटे-बड़े खिलौने, बेन १० का बबल गन, डस्टिंग क्लॉथ, भूने मूंगफली और चने, मच्छर मारने की रैकेट, किताबें, फूल, झंडे, पेंसिल, पेन, और अभी हाल में मिटटी का तवा... और अन्य काफी रंग- बिरंगी चीजें बिकते देखा है... मेह्नत की कमाई भीख माँगने से बेहतर है। वहीँ सवाल यह भी उठता है की क्या ट्रैफिक के परिचालन और दुर्घटनों के मद्देनजर हमें इन सामानों को न खरीदकर इसे हतोत्साहित करना चाहिए? बत्ती हरी हो चुकी थी और पुनः गाड़ी रफ़्तार पकड़ने लगी. थोड़ी ही दूर आगे सुमननगर के बोर्ड के नीचे एक औरत फूलों की माला को हाथों में लिए खड़ी दिखी, ट्रैफिक के पुनः रुकने का इंतज़ार में.

वडाला कब गुजरा और सायन पहुंचे, अंदाज लगाना मुश्किल । सब एक दूसरे में समाये हुए.. सायन (शीव)यानि सरहद या सीमा। जैसा की नाम से ही अनुमान लगाया जा सकता है, १८वीं शताब्दी में मुंबई में प्रवेश करने वालों पर यहीं निर्मित किले से नजर रखी जाती थी। यह पहाड़ी अपनी ऊँचाई के कारण सामुद्री यातायात पर नज़र रखने के लिए महत्वपूर्ण था भले अब वहाँ समुद्र का अता पता नहीं चलता। आज इस इतिहास को समझने के लिए पुराने नक़्शे खंगालने होंगे जब आज का मुंबई शहर ७ -अलग-अलग द्वीपों में वितरित था, २२ पहाड़ियों से घिरा हुआ. सायन से कोलाबा (मुंबई का दक्षिणी भाग) तक पूर्वी और समुद्रतट के किनारे-किनारे पश्चिमी हिल रेंज के होने को विश्वास करना मुश्किल।
आगे पहुंचे दादर, मुंबई का पहला प्लांड सबर्ब। सिद्धिविनायक मंदिर, शिवाजी पार्क, हिन्दू कॉलोनी, पारसी कॉलोनी, मराठी फिल्मों की नामचीन हस्तियों का बसेरा, एक और पूर्वी सबर्ब। सड़क के दोनों तरफ छोटी-बड़ी, दुकानों की भारी संख्या इशारा करती कि कितने लोगों की पनाहगार है, यह सबर्ब। दादर का अर्थ है, 'सीढ़ी'. यक़ीनन मुंबई के प्रमुख द्वीप को अन्य द्वीपों से जोड़ने वाला कड़ी... मुंबई के 'कॉटन मिल युग' के समय कई प्रसिद्द कॉटन मिल मसलन बॉम्बे डाईंग, गोल्ड मुहर मिल, कोहिनूर मिल, रूबी मिल और टाटा मिल यहीं स्थापित किये गए थे. और अगर खाने की बात की जाए तब यह जानना बड़ा ही रोचक है कि विश्व प्रसिद्ध 'वड़ा पाव' ने सर्वप्रथम यहीं दादर स्टेशन पे ही लोगों को अपना दीवाना बनाया।

अब बात परेल की, हमारा अगला पड़ाव। पुनः कहना जरूरी नहीं कि दुकानों के ऊपर लगे बोर्ड से ही यह जानना संभव हुआ कि हम किसी और सबर्ब में प्रवेश कर चुके हैं। मूलतः कपड़ा मिलों का केंद्र रहे इस इलाके में मिलों के बंद होने के बाद दक्षिण मुंबई के कई व्यावसायिक केंद्र यहाँ स्थापित हुए, कई कॉर्पोरेट दफ्तर खुल गए. बायीं-दायीं नज़ारे घुमाने भर से ही इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. पिछले वर्ष की मुंबई में एल्फ़िंस्टन और परेल के लोकल रेलवे स्टेशनों को जोड़ने वाले पुल पर मची भगदड़ की घटना इशारा करती है कि हमें इस सबर्ब में अचानक बढ़ी भीड़ की सुरक्षा के इंतेज़ाम के बारे में गहराई से पड़ताल करनी चाहिए।


बस कुछ ही देर में हम पहुंचे भायखला स्थित अपने गंतव्य जीवाजी उद्यान के परिसर में, सबसे मजेदार बात, यहाँ पेंगुइन देखे जा सकते हैं.. है न अनोखी बात। पेंगुइन और मुंबई में ? है न यह मायानगरी !

Tuesday, 19 June 2018

असल्फा :चल रंग दे


दो दिनों तक कभी तेज, कभी छिटपुट बारिश के बाद आज मौसम कुछ साफ़ है, आज सुबह धूप खिली थी. खिड़की के बाहर देखती हूँ, दूर तक जहाँ तक नजर जा सके. घाटकोपर पहाड़ी की ढलान दिखती है, और दीखते हैं उसी ढलान पे बने कई छोटे-छोटे, सटे-सटे से घर और कुछ घरों की छतों को बारिश से लड़ने की ताकत देते नीले तिरपाल शीट. नजर पड़ती है, कहीं से निकलते धुएँ पर, शायद कोई छोटा कारखाना है! सामने एक मस्जिद और कुछ ही दूरी पर एक मंदिर की दीवार. यह मुंबई के कई बड़े स्लमों में से एक असल्फा स्लम का एक छोटा- सा हिस्सा है, यक़ीनन वह हिस्सा नहीं जिसपर  मेट्रो में सफर करने वाले यात्रियों की नजर पड़ती है और जो इटली के अमाल्फि कोस्ट पर बसे पोसितानो शहर की याद दिलाता है. तंग गलियों, छोटे अँधेरे घरों, नालों और दूर -दूर तक फैली गन्दगी से पहचाने जाने वाले स्लम से बिलकुल अलग जिनकी दीवारों पर इंद्रधनुषी रंग बिखेरे गए हैं. बस्ती की बाहरी दीवारों पर अलग-अलग तरह के डिजाइन बनाए गए हैं. बस्तियों की १७५ दीवारें  ७५० लोगों, ४०० लीटर पेंट और तक़रीबन ६ दिनों की मदद से अब बदरंग नहीं रही हैं.

स्लम के किसी एक विशेष हिस्से का मेकओवर कर इन बस्तियों के प्रति आम लोगों की धारणा बदलने और इन बस्तियों के निवासियों के जीवन में सकारात्मकता के रंग भर सकने में कितनी कामयाबी मिलेगी ? और, आम लोगों की धारणा बदलने से क्या स्लम में रहने वाले लोगों की समस्याएं ख़त्म या कम हो जायेंगी?  तो क्या कुछ लोगों का कहना सही है कि इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य मेट्रो में सफर करने वालों के लिए बस यह एक खुबसूरत नज़ारे की रचना है? क्या सचमुच रंग रोगन से बस्ती को कोई लाभ हुआ है या बस लोगों की जिज्ञासा इन बस्तियों के प्रति बढ़ गयी है? तो क्या यह 'स्लम टूरिज्म ' जिसे कुछ लोग 'पोवर्टी पोर्न' की भी संज्ञा देते हैं, का एक नया गंतव्य बनने वाला है?

स्लम के मेकओवर को अंजाम देने वालों का उद्देश्य बस्ती को नई पहचान दिलाना और फिर इसके बाद इसकी समस्याओं को सामने लाना भी है. आशा है, वे सफल होंगे।