Thursday, 22 February 2018

सफर कुछ अलग-सा


कागज की नाव बनाकर उसे बारिश के पानी में छोडना और तेजी से ओझल होते देखना मन में जैसी ख़ुशी का संचार करता था, वैसी ख़ुशी मोटर बोट खिलौने में कहाँ मिलती थी  ? कुछ ऐसे ही उम्मीदों के साथ पिछले रविवार हमने सेलिंग बोट की  राइड लेने की योजना बनाई. पहले से निर्धारित समय पर हमलोग गेटवे ऑफ़ इंडिया से सटे  जेटी नंबर ५ पर पहुँच गए. वहां से हमें ट्रांसफर बोट के माध्यम से सेलिंग बोट तक ले जाया गया.  सेलिंग बोट को किनारे तक लाने की अनुमति नहीं है. जाते -जाते हमें कई अन्य सेलिंग बोट, छोटे- बड़े मोटर बोट और प्राइवेट याच भी दिखाई दे रहे थे, कुछ पर्यटकों को ले जाते और कुछ समुन्दर के किनारे एंकर के सहारे पार्क किये हुए और हवा के संग-संग, आगे -पीछे हिलते- डुलते अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते. एलीफैंटा की गुफाओं और अलीबाग बीच भी यहाँ से जाया जा सकता है.
अब हमलोग  तैयार थे, अरब सागर के नीले पानी की अनोखी दुनिया को करीब से महसूस करने के लिए और इस छोटी मगर यादगार यात्रा को सफल बनाया नाव के चालक और उनके एक सहयोगी ने. चंद मिनट ही  काफी थे यह समझने में कि नाव को चलाने में कितने धैर्य और अनुभव की दरकार होती है !खड़े नावों या जहाजों के बीच से नाव के लिए रास्ता बनाना, नावों की दिशा बदलना या हवा का रूख समझ कर सेल को एक तरफ से दूसरी तरफ करना आसान काम नहीं है!
इंजीनियरिंग की सबसे पुरानी शाखा है, नौका निर्माण। हल्ल या पतवार, बड़ा-सा सेल, सेल और बूम को थामे एक बड़ा सा डंडा या मास्ट, नाव को  दिशा देने केलिए ट्रिलर, चप्पू, रस्सियां इत्यादि नाव के कुछ मुख्य भाग   हैं.
 हवा अच्छी चल रही थी और  उसके सहारे नाव भी अच्छी गति से आगे बढ़ी जा रही थी। दूर सागर और आसमान आपस में एक दूसरे में समाते हुए दिख रहे थे,जानते हुए भी यह एक भ्रम है,एकबारगी सच प्रतीत हो रहा था. नाविक ने बताया, जब हवा कम रहती है तब नाव इतनी तेजी से आगे नहीं बढती, और भी कम होने पर चप्पू चलाकर नाव को खेना पड़ता है, जो काफी मेहनत भरा काम है.  कभी- कभी  हवा के न रहने पर नाव के कहीं बीच में भी फँस जाने का डर रहता है, तब अन्य उपाय करने पड़ते हैं. डरने की बात नहीं,ऐसा बहुत कम ही होता है.☺ पर हाँ, डाल्फिन के दर्शन के मामले में किस्मत ने हमारा साथ नहीं दिया। सी गल और अन्य पक्षी अपना आहार ढूंढते और मछलियों का पीछा करते जरूर दिखे, और पानी में जगह-जगह तैरते नावों के लिए लगाए गए मार्कर पर कुछ पक्षियों को  आराम फरमाते और उड़ना छोड़ उनके सहारे ही किनारे का रूख करते देखना मजेदार लगा.
नाविक और उनके सहयोगी ने हमारे द्वारा पूछे गए लगभग सभी सवालों के जवाब दिए. सफर के दौरान दिखाई देते सभी नेवी के जहाज, ऑयल वेल, नेवी अधिकृत द्वीपों, लाइट हॉउस, इंडियन नेवी द्वारा एक जहाज को रेस्टोरेंट के रूप में परिवर्तित करने के बारे में भी हमें बताया। चलते-चलते हमलोग एक फिशिंग बोट  के करीब पहुंचे। उन्होंने बताया कि कुछ लोग रोज शाम फिशिंग बोट से मछलियों को पकड़ने के अपने अभियान पर निकलते हैं और सुबह-सुबह पकड़ी मछलियों को तट पर दिख रहे सेसॉन डॉक पर पहुंचा देने के बाद इनका काम खत्म होता है . फिशिंग बोट पर कोली समुदाय की आराध्य देवी, मुम्बा आई का भी झंडा लगा दिखा। ज्यादातर कोली समुदाय के लोग इस धंधे से जुड़े हैं.

हवा के रूख को देखते हुए सेल को बाईं या दाई और करना पड़ता है और इस बाबत नाविक के निर्देश मिलने पर नाव में सवार हमें कई दफा सर झुकाना पड़ा. यह थोड़ी असुविधाजनक लग सकती है पर यदि सेलिंग बोट पर बैठकर समुद्र की खूबसूरती का मजा लेना है, तब अलर्ट रहना भी उतना ही जरूरी है!

प्राचीनकाल से लोग सागर की यात्रा करने और इसके रहस्यों को जानने की कोशिश में लगे हुए हैं. जल जंतुओं की एक रहस्यमयी दुनिया, ब्लू व्हेल से लेकर प्लैंकटन तक. पता नहीं और कितने अद्भुत जीव-जंतु, दुर्लभ पौधे और भांति -भांति के बैक्टीरिया इन महासागरों के गर्भ में मौजूद हैं!

कितनी सारे रोमांचक किस्सों को याद दिलाता है यह दूर तक फैला नीले पानी का अम्बार! दूर से आते जहाज के मास्ट के ही हमेशा सबसे पहले देखे जाने के बाद ही इंसानों ने सोचना शुरू किया कि कहीं दुनिया समतल न होकर गोल तो नहीं ! सिंदबाद की रोमांचक कहानियाँ हो या अर्नेस्ट शैकलटन की सन १९०७ की साहसिक नीमरोड अभियान की साहस से भरी सच्ची घटना, समुद्र के बीच में जिंदगी और मौत के बीच गुजारे गए कई दिन, सब ऐसे ही किसी सागर से ही तो जुडी है. वास्कोडिगामा, कोलंबस, मार्को पोलो की समुद्री यात्राओं के बारे में किसने न सुना होगा? विभिन्न सभ्यता-संस्कृतियों को जानने -समझने से लेकर उपनिवेशों की स्थापना के किस्से इन यात्राओं से जुड़े हैं.

हमने शाम का वक्त यात्रा के लिये चुना था ताकि सनसेट का भी नज़ारा देख सकें।  हमारी नाव वापस लौटने के लिए मुड़ चुकी थी. नीले पानी पर सूरज की किरणों से बनी सुनहरी पट्टियों हमारे नाव का पीछा करती दिख रही थी. प्रकृति के इस अद्भुत रंग-संयोजन का कोई मुकाबला है क्या? हम मुंबई के करीब पहुँच रहे थे, इमारतें कुछ ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगी थी. और देखते ही देखते सूरज भी चल पड़ा था धरती के दूसरे हिस्से को प्रकाशमान करने और हम २ घंटे की थोड़ी अलग और यादगार यात्रा कर वापस अपनी राह!

Sunday, 18 February 2018

हँसी पर पहरा

अभी कुछ दिन पहले एक हँसी या कहें एक जोरदार ठहाके की गूंज सबने सुनी. हुआ यूँ कि राज्य सभा में देश के प्रधानमंत्री के एक वक्तव्य सुनकर विपक्षी पार्टी की सांसद रेणुका चौधरी अपनी हंसी रोक नहीं पाईं. हालांकि कुछ साल पहले उनके फफक -फफक कर रोने की भी घटना चर्चा में रही थी. खैर, जहाँ प्रधानमंत्रीजी की हाजिरजवाबी को कुछ लोगों ने खूब सराहा वहीँ उन्हें इस घटना को रामायण की कहानी से जोड़ने पर आलोचनओं का शिकार भी होना पड़ा. एक तरफ सत्ता पक्ष के सदस्यों ने मोदीजी  का जोरदार समर्थन किया और दूसरी ओर विपक्षी पार्टी ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दे डाली.
पर  इस घटना ने बहुत धीमी ही आवाज में ही सही पर एक जरूरी मुद्दा उठाया जिसे औरतों के 'राइट टू हैप्पीनेस' से जोड़कर देखा जा सकता है.
प्रकृति ने हमें 'हँसी' जैसी एक अचूक औषधि से नवाजा है, हँसने से रक्त-संचार बढ़ता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है. मानसिक तनाव घटाने के साथ -साथ सकारात्मक सोच बढ़ाने के लिए भी हॅसने को प्रेरित किया जाता है. सीधे-सादे शब्दों में, एक खुशहाल और तनावमुक्त जिंदगी की एक महत्वपूर्ण शर्त है, हँसने को न भूलना।
इंसान जब खुश होता है तब हँसता है, मन में अचानक आया कोई खुशनुमा ख्याल हो या अपनों से मुलाकात या बातचीत, या बस खेलने के उमंग को हँसकर अथवा मुस्कुराकर इजहार करता है. हँसी को संक्रामक भी माना जाता है, एक हँसता हुआ चेहरा बहुतों को हँसाने में कामयाब होता है, दिलों को जोड़ता है, और  कईयों को अपनी तरफ आकर्षित भी करता है. निसंदेह हँसने के भी अपने नियम-कानून हैं और यह सही भी है. पर कई दफा लड़कियों के लिए ये नियम कुछ ज्यादा ही सख्त दिखाई पड़ते हैं. लड़कियों के हँसने और मुस्कुराने को लेकर बेवजह रोक-टोक की जाती है. लड़कियों यहाँ भी भेद-भाव का शिकार होती हैं. आँचल में मुंह छिपाकर या   मुंह दबाकर ही हँसने को ही शिष्टाचार समझा जाता है. हँसने-मुस्कुराने के तरीके पर तंज कस उच्श्रृंखल होने जैसे तोहमत लगा दिए जाते हैं. तहजीब और शिष्टाचार के नाम पर असल में जब  पाबंदियां 'लड़की होने के कारण लगती है ' तब मन का आहत होना लाजिमी है. यह बिना गुनाह किये दोषी ठहराने सरीखा  है और एक सीमा से ज्यादा रोक-टोक से लड़कियों के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
क्या समय नहीं आया है कि औरतों की हँसी पर लगा पहरा हटाया जाए एवं हर चेहरे पर एक जैसी   और खिलखिलाती हँसी को खुशहाल भारत का प्रतीक बनाया जाये?



Tuesday, 13 February 2018

मुख्यमंत्रीजी का आगमन


कुछ दिन पहले लाउडस्पीकर से की जा रही एक घोषणा सुनाई दी. आवाज स्पष्ट न थी, पर अनुमान लगा कि शायद किसी राज्य के मुख्यमंत्री यहाँ किसी गार्डन में आम जनता को सम्बोधित करने वाले हैं. अक्सर ऐसा होता है, वर्तमान की कोई घटना, कुछ आवाजें या बस कोई खुशबू सहसा ही हमें अतीत की कुछेक घटनाओं की याद दिलाती है और सबकुछ चलचित्र की भांति हमारे सामने घूम जाता है.

करीब २२-२३ वर्ष पहले मिली ऐसी ही एक खबर पर अनायास ही ध्यान चला गया.. सूचना के मुताबिक राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्रीजी की हमारे गांव में पधारने की योजना बनी थी. सूचना मिलने के कुछ ही दिनों के अंतराल में निरीक्षण के लिए आये-दिन आने वाली  सरकारी अफसरों  की गाड़ियों ने इस समाचार को बिलकुल पुख्ता ही कर दिया था. चारों तरफ इसी की चर्चा थी. दूसरे अन्य गाँवों तक खबर फैलते देर न लगी. गांव का इतिहास खंगाला जाने लगा कि कब अंतिम दफा यहाँ ऐसे ही किसी अन्यमहापुरुष के चरण यहाँ की धरती पर पड़े हों! दिन नजदीक आते ही निर्धारित स्थान पर बॉस बल्लों का ढेर लग गया. मंच, जिस पर खड़े होकर मुख्यमंत्रीजी आम जन को सम्बोधित करने वाले थे, का ढांचा तैयार हुआ, VIP अतिथियों के लिए विशेष व्यवस्थायें की जा रही थी.  जैसे- जैसे समय नजदीक आ रहा था, सम्पूर्ण इलाके में उत्सव जैसा माहौल छाने लगा था . ऊपर से मुख्यमंत्री महोदय के हेलीकॉप्टर से आने की सूचना से  तो लोगों की उत्सुकता और बढ़ गयी थी. युद्धस्तर पर एक हेलिपैड बनने का काम भी शुरू हो चला था। सुनने में आया कि इंतज़ाम के लिए मिली राशि का भारी दुरूपयोग भी हुआ, पर बेशक ज्यादातर लोग निस्वार्थभाव से ही मुख्यमंत्री के आने का इंतज़ार कर रहे थे ☺. दूर -दराज इलाकों से भारी संख्या में लोग भी आकर मुआयना करने पहुँचने लगे।  अंदाजा होने लगा था की उस दिन मेले जैसी भीड़ जुटने वाली है और हुआ भी वैसा ही, बड़े बूढ़ों का कहना था कि ऐसी भीड़ इस गांव में कभी न देखी थी! विजयादशमी के मेले में भी इतनी भीड़ कभी न जुटी थी.

  अब जब ऐसा सुअवसर आ ही रहा था तब हमारे विद्यालय के शिक्षकों ने मिलकर भी बहती गंगा में हाथ धोने का निर्णय ले लिया कि वर्षों से उपेक्षित पड़े इस विद्यालय की सारी समस्याओं को एक चिट्ठी में लिखकर मुख्यमंत्री जी को सौंप देंगे. वैसे भी, चरवाहा विद्यालय की स्थापना करके शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर  दुनिया भर को हैरान करने वाले के समक्ष इन छोटी-मोटी समस्याओं  की क्या बिसात ?अब काहे की देर, लग गया पूरा विद्यालय बढ़िया से बढ़िया कंटेंट वाली चिट्ठी लिखने में. २-३ दिन के अंदर एक लम्बा- सा शिकायती पत्र भी बना लिया गया.  टूटी हुई छप्परों, बेंचों की कमी , प्रयोगशाला और पुस्तकालय  का अभाव, पीने का पानी और शौचालय के न होने से उत्पन्न परेशानियों का उल्लेख कर, दया-दृष्टि फेरने का आग्रह कर दिया गया. भव्य स्वागत के लिए एक स्वागत गान  गाने की योजना बनी. बस, सारा स्कूल तैयारी में जुट गया. कई स्वागत गानों में से एक स्वागत  गान का चुनाव किया गया और धुआंधार प्रैक्टिस शुरू हो गई। साथ ही, रोज पत्र का आकलन भी किया जाता, कुछ शिकायतें काटी जाती, कुछ जोड़ी जाती। महामहिम के आतिथ्य-सत्कार में कोई कमी न रह जाए, इस पर पूरा ध्यान दिया जा रहा था☺ हालिया सर्वेक्षण के हिसाब से शिक्षा के स्तर में गिरावट के समाचार मिले हैं, और कितनी गिरावट, अंदाज लगाना मुश्किल है.
खैर, जैसे राम का स्पर्श पा देवी अहिल्या वर्षों के श्राप से मुक्त हो पायी थी, वैसे ही कुछ चमत्कार की आशा बांधे हमसब उस पावन दिन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे.
आ ही गया वो दिन। एक-डेढ़ घंटे के ही बिलम्व के बाद ही हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट ने दूर से ही उनके आने की सूचना दी और लोगों का हुजुम उनकी जय-जयकार करते दौड़ पड़ा मुख्मंत्रीजी की झलक पाने।
तेज कदमों के साथ अपने सहयोगियों से घिरे मुख्यमंत्री महोदय जी मंच पर पहुंचे। माला वगैरह पहनने की औपचारिकताओं के पश्चात स्वागत गान के साथ उनका स्वागत किया गया. तत्पश्चात बारी आई, कई दिनों की मेहनत के बाद लिखेहुए शिकायती पत्र उनके हाथों में थमा देने की. उनके एक सहयोगी ने अपने हाथ में लेकर पत्र के साथ-साथ हमारी आशाओं को भी कहीं बगल में सरका दिया था. किन बातों को कितनी गम्भीरता से ली जाए, इतनी समझ बच्चों में कहाँ ? तमाम औपचारिकताओं की सम्पन्नता के बाद मुख्यमंत्रीजी ने चिरपरिचित अंदाज में बोलना शुरू किया. हमारी समझ से परे मगर लोटपोट कर देने वाला भाषण था, ढेर सारी  तालियां मिली, खूब मनोरंजन हुआ। मंच पर एक व्यक्ति को इशारे से बुलाकर उसकी पसलियां गिनने लगे, लगा कि अपनी पैनी नजर से उस बेचारे गरीब के सारे दुख दर्द ताड़ गए हों! कुछ उम्मीदें बंधाई, कुछ  वादे किये।अब समय हो चला था, अपने हेलीकॉप्टर में बैठ कर चल पड़े किसी और सभा को सम्बोधित करने ..






Saturday, 3 February 2018

थिएटर :एक छोटी चर्चा



मुंबई की शान है सिनेमा और इसमें थिएटर को भी जोड़ दें, तब कोई अतिशयोक्ति न होगी। हाँ,थिएटर सिनेमा जैसा लोकप्रिय नहीं। जबकि कई लोगों का मानना है कि उस समय चल रहे थिएटरों ने ही मुंबई में सिनेमा जगत की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 आज भले थिएटर की चमक फीकी पड़ी है, परन्तु आजादी के लिए लोगों के मन में उद्वेलित करने से लेकर वर्तमान सामजिक -राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न कर लोगों को जागरूक बनाने में इनके योगदान को कम नहीं आँका जा सकता. कभी गंभीरता से या कभी हलके फुल्के अंदाज में, कभी धारदार व्यंग्य के रूप में मंचित नाटकों द्वारा जिंदगी के हर पहलू की विवेचना की जा सकती है. सम-सामायिक मुद्दों, रिश्तों की जटिलता, आपसी द्वन्द, आम लोगों की शंकाएं तथा सामाजिक कुरीतियों को नाटकों के जरिये पेश किया जाता है. कभी-कभी तो थिएटर महज ज़िन्दगी के किस्से को ही दिखाने में सक्षम नहीं होता वरन कई सवाल उठाकर हमें सोचने पर मजबूर करता है. एक ऐसा ही उदहारण है, चेकोस्लोवाकिया के नाटककार 'कारेल कापेक' द्वारा लिखे नाटक 'रोसम्स यूनिवर्सल रोबोट्स' में सर्वप्रथम इस्तेमाल किया गया रोबोट शब्द, वर्तमान दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण देन कही जायेगी।  

विगत रविवार को मुंबई स्थित हरकत स्टूडियो में पञ्चतन्त्र नाटक का मंचन हुआ. पंचतंत्र की  दो प्रसिद्ध कहानियाँ, रंगा सियार तथा बन्दर और मगरमच्छ की दोस्ती, मंचन के लिए चुनी गयी थीं. पढ़ी हुई कहानियों को  नाटक के रूप मे देखने की कल्पना एक अलग ही उत्सुकता  जगाती है ! नाटक के शुरुआत में ढोलक और हारमोनियम पर बैठे कलाकारों की तीखी नोक-झोक ने सबको गुदगुदाया। मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को इस माहौल में सहज होने में सहायता मिली. नोक-झोक के दौरान ही हमें पंचतंत्र के पांच अध्यायों से  अवगत कराया गया. वे हैं , मित्रभेद (मित्रों में मनमुटाव एवं अलगाव),मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ),काकोलुकीयम् (कौवे एवं उल्लुओं की कथा ),लब्धप्रणाश (मृत्यु या विनाश के आने पर; यदि जान पर आ बने तो क्या?) एवं अपरीक्षित कारक (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें; हड़बड़ी में क़दम न उठायें) . मूल रूप से संस्कृत में लिखी गयी और बाद में विश्व की लगभग हर भाषा में अनुवादित इन कथाओं के द्वारा हमें मनोविज्ञान, व्यावहारिकता और राजनीतिके सिद्धांतोका परिचय होता है. ८७ कहानियों के माध्यम से इस ग्रन्थ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा  जी ने मानव समाज को उचित-अनुचित का ज्ञान दिया है. 

 जानवरों  का अभिनय करना एक चुनौती भरा काम है, जिसे सफल बनाया रुपेश टिल्लू के निर्देशन और चार अन्य कलाकारों के दमदार अभिनय ने.  कहानियों के प्रदर्शन के बीच में हारमोनियम और ढोलक से उठती आवाजों  ने इन कथाओं को मंच पर जीवंत करने में शानदार भूमिका निभाई। कलाकारों का  गीदड़, हाथी, शेर, बन्दर और कभी मगरमच्छ बनकर तरह- तरह की आवाजें निकालना, गुस्सा, घमंड, भय, ईर्ष्या, लालच, आश्चर्य जैसे भावों को शारीरिक मुद्राएं बनाकर दर्शाना, उछलना -कूदना, भागना जैसी सहज प्रस्तुति  दर्शकों को बांधने में कामयाब रही. हालांकि नाटक के मंचन के दौरान कई बार मुझे महसूस हुआ कि इस नाटक को केवल बच्चों को ध्यान में रखकर नहीं लिखा गया था. तथापि नाटक  के बीच-बीच में तालियों की गड़गड़ाहट और बच्चों की जोरदार हँसी सुनकर तसल्ली हुई  कि कम -से -कम  कलाकारों के सहज अभिनय ने सबका भरपूर मनोरंजन किया. खासकर नाटक के अंत में  होली के  गाये गए गीत और संगीत वाद्यों की मनमोहक आवाजों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।    
वर्तमान समय में बॉलीवुड की चमक -धमक के आगे भले ही रंगमंचों की चमक फीकी लगे,पर थिएटर जगत के लोग इसके भविष्य को लेकर आशावान हैं एवं दर्शकों को अपनी ओर खींच लाने की कोाशिश में लगे हैं. मनोरंजन की दृष्टि के अलावा शिक्षा की दृष्टि से भी रंगमंच की उपयोगिता को लेकर बहसें हो रही है. नाटकों में नए-नए  प्रयोग कर दुनिया भर में इस माध्यम को लोकप्रिय बनाने की कवायद जारी है, ताकि रंगमंच  उच्च मध्यमवर्गीय या बड़े शहरों में न सिमट कर आम जनता और छोटे -छोटे शहरों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो.

Saturday, 27 January 2018

साउथ मुंबई की वाकिंग ट्रिप


 साउथ मुंबई की वाकिंग ट्रिप 

गेटवे ऑफ़ इंडिया, टाउन हॉल, टेलीग्राफ ऑफिस,सिद्धि विनायक मंदिर, राजाभाई क्लॉक टावर , मणि भवन, अगस्त क्रांति मैदान, हाजी अली दरगाह, माउंट मैरी चर्च, मरीन ड्राइव, फिल्मसिटी, ग्लोबल विपासना पगोडा आदि मुंबई में कई  ऐसी जगहें हैं, जिसे देखने भारी संख्या में लोग दूर -दूर से पहुंचते हैं.  पर, यहाँ के बाजारों की भीड़-भाड़, चहल -पहल और शोर-गुल को देखे बिना मुंबई को समझना मुश्किल है. बस, मुंबई के इस महत्वपूर्ण हिस्से को देखने की योजना हमने भी बना डाली और एक ट्रैवल एजेंसी की मदद से निकल पड़े उन गलियों और बाजारों को छानने। कई विकल्पों में से हमने क्रॉफर्ड मार्केट, झवेरी बाजार, मंगलदास मार्केट, फ्लॉवर्स मार्केट और पिंजरापोल गोशाला वाली वाकिंग ट्रिप का चुनाव किया। हाँ, २६ जनवरी  की वजह से काफी दुकानें बंद मिली और गाइड के कहेनुसार वह भीड़ नहीं दिखी जो अमूमन यहाँ रहती है. यह हमारे लिए राहत की बात भी थी और अफसोस की भी। उस नज़ारे को देखने से हम चूक गए जो यहाँ को खास बनाती है. बहरहाल, उस दिन की भीड़ देखकर अन्य सामान्य दिनों की व्यस्तता के बारे में अंदाजा लग गया! शादी और अन्य त्योहारों के वक्त की भीड़-भाड़ की कल्पनामात्र से ही घबराहट होने लगी! 

इस ट्रिप में हमारे साथ थीं, दो कनाडा से आई महिलायें और दो ऑस्ट्रेलियाई महिलायें। रीगल  सिनेमा के सामने से शुरू हुआ हमारा सफर. पहला पड़ाव, क्राफर्ड मार्किट तक हमें टैक्सी से ले जाया  गया. रास्ते में जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट और सी एस टी देखने को मिला।  गाइड ने हमें बताया कि वी टी स्टेशन, जिसका नाम बदलकर अब सी एस टी कर दिया गया है , के बाहर महारानी विक्टोरिया  की प्रतिमा स्थापित थी जिसे वापिस लंदन भेज दिया गया है जो अब वहां किसी संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है.

अब हम पहुंचे, क्रॉफर्ड मार्केट। विशेष रूप से फलों,सब्जियों, मांस-मछली, ड्राई फ्रूट, मसालों के होलसेल और रिटेल बाजार  के तौर पर जाने जाने वाले इस मार्केट में  प्लास्टिक के सामान, कपडे, खिलौनों की भी दुकानें  दिखीं। दुकानों के दिखाने के क्रम में गाइड ने बारगेन यानि मोलजोल करने की कला के बारे में हमें विस्तार से बताया☺.  क्रॉफर्ड मार्किट का नामकरण मुंबई शहर के पहले  म्युनिसिपल कमिश्नर 'आर्थर क्रॉफर्ड' के नाम पर किया गया था जिसे सन १९९५ में शिवसेना द्वारा नामों के बदलने के राज्यव्यापी अभियान के तहत महात्मा ज्योतिबा फूले  कर दिया गया है. हालांकि लोगों की जुबान पर अभी भी यही नाम चढ़ा है. कई बातें १८६९ में निर्मित क्राफर्ड मार्केट को विशेष बनाती है जैसे मार्केट में अवस्थित एक फाउंटेन जो प्रसिद्ध कलाकार जॉन लॉकवुड किपलिंग और  प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग  ( द  जंगल बुक के लेखक)के पिता द्वारा निर्मित है।  हालांकि, फाउंटेन बहुत अच्छी हालत में नहीं दिखा, जाहिर है इसके रख- रखाव पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया गया है. इसके अलावा यह जानकर भी हैरत हुई कि भारत में विद्युतीकरण के आगाज के लिए भी इसी बाजार को चुना गया था. जी हाँ, सन  १८८२ में भारत की यही इमारत सर्वप्रथम बिजली से रौशन हुई.

इसके बाद हमने रूख किया मंगलदास मार्केट यानि फैब्रिक मार्केट की तरफ. परन्तु छुट्टी की वजह से अधिकतर दुकानें  बंद मिली। कपड़ों की विभिन्न किस्मों की सस्ते दामों में उपलब्धता के लिए विख्यात यह बाज़ार लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है. हम तो चूक गए, फिर कभी..

हाँ , झवेरी बाज़ार की तरफ जाने वाली सड़क के दोनों तरफ बैठकर दूकान लगाने वाले विक्रेता ग्राहकों के साथ व्यस्त  दिखे. खरीदने वालों की भी अच्छी खासी भीड़ दिखी. गाइड ने बताया कि दुकानदारों की कमाई अच्छी -खासी है और ये टैक्स भी भरते हैं।  सब कुछ प्रशासन की मंजूरी से है, शायद मुंबई की इस अनूठी वाइब को कायम रख लेने की कवायद का हिस्सा है ये । मॉल की नयी नवेली संस्कृति को झूठलाती इस मार्किट की चहल पहल थोड़ी अचंभित ही करती है.

झवेरी बाजार हमारा अगला पड़ाव था. यह बाजार जैसा नाम से ही विदित है, सोने चांदी एवं हीरों  के आभूषणों के लिए मशहूर है.  इसके अलावा इमिटेशन जूलरी और रत्नों और कीमती पत्थरों की भी खरीददारी यहाँ से की जा सकती है.  इस बाजार की महत्ता इस आंकड़ें से मापी जा सकती है कि भारत में हो रहे सोने के कुल कारोबार के ६५ प्रतिशत कारोबार के लिए यहाँ अवस्थित सैंकड़ों दुकानें ही जिम्मेदार हैं.  हर कुछ अंतराल पर  हमें गुजराती समाज की व्यापार कुशलता  के बारे में गाइड के माध्यम से जानकारी मिलती रही☺ बात सही भी है, प्रत्यक्षं  किं प्रमाणम।

इसके बाद हमने जामा मस्जिद और मुम्बा आई मंदिर को बाहर से देखा. . सड़क के एक छोर पर मस्जिद और दूसरे छोर पर मंदिर भारत के सांप्रदायिक विविधता को दर्शाता दिखा. ब्रिटिश शासकों ने शहर के विस्तार के मद्देनजर  वी टी स्टेशन के पास से हटाकर मुम्बा आई मंदिर को झवेरी बाजार के पास पुनर्स्थापित किया.  मुंबई के मूल निवासी, कोली समाज की आराध्य देवी हैं, मुम्बा माता। मुंबई शहर का नामकरण भी इन्हीं देवी के नाम पर किया गया है. मंदिर में प्रतिदिन छह बार आरती होती है। मंगलवार के शुभ माने जाने के कारण श्रद्धालुुओं की काफी भीड़ रहती है. मन्नत माँगने के लिए लोग यहाँ रखे लकड़ी पर सिक्कों को कीलों से ठोंकते हैं.

फ्लावर्स मार्किट हमारा अगला पड़ाव था. यूँ कहिये एक पतली सी गली. दोनों तरफ फूलों  से सजे स्टॉल और  लकड़ी की तख्तों पर बैठकर माला गूंथते लोग दिखे. फूलों की कई किस्मों के अलावा पूजा में प्रयुक्त होने वाले अन्य सामानों को भी यहाँ से ख़रीदा जा सकता है यथा तुलसी, आम के पत्ते, दूब, उपले आदि. हालाँकि दादर का फ्लावर मार्केट मुंबई की सबसे बड़ी फ्लावर मंडी है। पर, सुबह के वक्त इस बाजार में भी काफी रौनक रहती है.
फूलों की गली होते हुए हम पहुंचे हमारे अंतिम पड़ाव पर, पिंजरापोाल  गौशाला। हिन्दू धर्म में, गोसेवा की महत्ता से  सभी परिचित हैं. सड़कों पर खुले में विचरती और कचरा खाती गायों से इतर अच्छी तरह से देखभाल पा रही इन गायों को देखना सुखद अहसास रहा. सभी ने बड़े प्यार से गायों को चारा खिलाया।  कुछ लोग कबूतरों को दाना खिलाते भी दिखे. यहाँ की ३५० गायों की देखभाल के लिए चंदा देनेवालों की कमी नहीं।

मुंबई के इस हिस्से को देखकर शहर के अलग रूप से वाकिफ होना अच्छी अनुभूति रही. महज २ घंटे का यह ट्रिप  इस महानगर से संबंधित कई ऐतिहासिक और वर्तमान के व्यापारिक गतिविधियों के बारे में ज्ञानवर्धन करने वाला  साबित हुआ. 

Thursday, 14 May 2015

समलैंगिकता क्या अपराध है?


पिछले महीने एम्स अस्पताल के एनस्थीसिया विभाग की 31 वर्षीय डॉ प्रिया वेदी की दिल्ली में आत्महत्या की खबर आई। प्राप्त ४ पृष्ठों के सुसाइड नोट के मुताबिक पति का समलैंगिक होना, अँधेरे में रखकर शादी कर देने से लेकर दहेज़ की निरंतर मांग और तद्पश्चात पति के द्वारा दी गई शारीरिक और मानसिक यातना को उसकी आत्महत्या की वजह माना जा रहा है ।बेशक उसके पति का समलैंगिक होना ही आत्महत्या की मुख्य वजह है।तत्पश्चात भारतीय दंड संहिता की धाराओं ३०४ B(दहेज उत्पीड़न के कारण मौत) और 498A (पति द्वारा पत्नी के साथ क्रूरता) के तहत मामला दर्ज कर एम्स में ही कार्यरत प्रिया के पति डॉ कमल वेदी को १४ दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था। 

सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक पढ़ी -लिखी, महानगर में रहने वाली और देश-दुनिया में हो रहे परिवर्तनों से वाकिफ एक आत्मनिर्भर लड़की ने अपने दर्द से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या का ही विकल्प क्यों चुना ? अपने पति से अलग होकर एक नयी ज़िन्दगी की शुरुआत करने का ख्याल उसके मन में क्यों नहीं आया? निश्चित रूप से यह महज किसी एक लड़की की आत्महत्या का मामला नहीं है, वरन यह समाज में फैले तमाम बुराइयों की ओर इशारा है जिसे हम किसी वजह से सामने लाने से कतराते हैं. यह ऐसी कौन सी व्यवस्था है जहाँ आपसी प्रेम के गौण होने के बावजूद वैवाहिक बंधन को बचाये रखने और किसी तरह घूँट-घूँट कर ज़िन्दगी जीने को मजबूर करती है. दुर्भाग्यवश यह किसी एक जोड़े की कहानी नहीं, वरन लाखों लोग एक-दूसरे के साथ ज़िन्दगी गुजारने के लिए अभिशप्त हैं या फिर इसकी परिणति आत्महत्या के रूप में होती है. सवाल है कि गलती किसकी है और इसका हल क्या है? प्रिया वेदी के आत्महत्या के मामले में क्या दोष केवल कमल वेदी या प्रिया का ही है, या फिर हमारी दकियानूसी विचारधारा, भारतीय कानून या एक ढर्रे पर चलने की हमारी मजबूरी और समस्याओं को सुलझाने में हमारी असमर्थता  भी उतनी ही जिम्मेवार है ? 

समलैंगिकता और हमारा कानून 

प्रिया की आत्महत्या के बाद समलैंगिकता का मुद्दा फिर उठा है. अपने अंतिम फेसबुक पोस्ट द्वारा प्रिया ने समलैंगिक युवकों को शादी कर किसी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ नहीं करने की सलाह दी है. सवाल जायज है की डॉ कमल वेदी ने शादी करने की स्वीकृति क्यों दी ? शादी से पूर्व अपने समलैंगिक होने की जानकारी अपने होने वाले जीवनसाथी को क्यों नहीं दी? क्या यह मान लेना उचित होगा कि उसे भविष्य में हो सकने वाले इसके दुष्परिणामों का आभास नहीं था ?और यदि शादी मर्ज़ी के विरुद्ध की गयी तब निश्चित रूप से विडम्बना ही है कि  इतने पढ़े-लिखे इंसान में भी सच का सामना कर सकने की हिम्मत नही होती है. पर यह भी उतना ही सत्य है कि अपने परिवार के सदस्यों की ख़ुशी की खातिर, समाज में अपनी इज़्ज़त बनाये रखने के लिए और यहाँ तक की जीने के लिए भी न चाहते हुए भी ऐसे लोगों को शादी के लिए तैयार होना पड़ता है. और तो और घर और संपत्ति से बेदखल तक कर देने की धमकी इन्हे चुप करने में अहम भूमिका निभाती है. 

हाँ, हमें भी इसके लिए एक सकारात्मक माहौल बनाकर मदद करनी होगी जैसे समलैंगिक औरत या मर्द को अपराधी समझना बंद करना होगा. यह मानना होगा कि समलैंगिता कोई बीमारी नहीं है जो समय के साथ अथवा शादी कर देने से ठीक हो सकती है।.

कानून का भी डर भी ऐसी दुखद स्थिति के लिए कम जिम्मेवार नही. समलैंगिकता को अपराध का दर्ज़ा देने वाले हमारे देश के कानून में बदलाव की आवश्यकता है. हालांकि जुलाई 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक फैसले के तहत आईपीसी की धारा 377 में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया। पर इस फैसले के उपरांत समलैंगिकता पर बहस छिड़ गयी है. समलैंगिक पुरुष या महिलाएं , उनके परिवारजनों या उनके जीवन साथियों की समझाने और स्थिति से उबारने में मदद करने हेतु कई गैर सरकारी संगठन अस्तित्व में आये हैं. जो की इनके अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं.

हमारे देश जहाँ करीबन २.मिलियन समलैंगिकों के होने की रिपोर्ट है, जल्द से जल्द इस कानून में परिवर्तन किया जाना जरूरी है. साथ ही, जबरन विवाह को रोकने के लिए भी कड़े फैसले लिए जा सकते हैं।  मिसाल के तौर पर अभी हाल ही में यूके में कानून बनाकर जबरन विवाह पर रोक लगाने की कोशिश की गयी है. एंटी सोशल बिहेवियर, क्राइम एंड पुलिसिंग एक्ट 2014 के तहत ब्रिटेन और वेल्स में शादी के लिए मजबूर करने वाले व्यक्ति को सात साल की सजा तक दी जा सकती है।


सामाजिक व्यवस्था और शादी की परंपरा :

हमारी सोच, सामाजिक नियम -कानून और हमारा डर दरअसल समस्या की जड़ है. ऐसा समाज जहाँ बेटे-बेटियों की इच्छा, पसंद - नापसंद, ख़ुशी और सच्चाई से ऊपर मान-मर्यादा, दिखावा और शादियां निभाने जैसी बातों का महत्व है, जबरन शादी करने के लिए मजबूर करने से लेकर कष्टपूर्ण शादी को न तोड़ने की बाध्यता शामिल है. मामला इसलिए भी गंभीर है क्यूंकि हमारे समाज में ऐसे मुद्दों पर पर्दा डालने का रिवाज रहा है. औरतों के नजरिये से देखें, किसी समलैंगिक पुरुष से शादी हो जाने से उसे मानसिक कष्ट सहना पड़ता है और परिणामतः मनोवैज्ञानिक समस्याएं शुरू होने लगती है. हालांकि मदद के लिए काफी व्यवस्थाएं हैं , पर सच्चाई है कि औरतों को इसे समझने में, सबके सामने समस्याओं को प्रकट करने और कानूनी मदद लेने में इतना वक्त गुजर गया होता है कि एक तरह से क्षति हो चुकी होती है. 

हमारे समाज में प्रचलित अरेंजेड विवाह की व्यवस्था को भी नए सिरे से सोचना होगा। माँ-पिता द्वारा नियोजित इस विवाह में लड़का-लड़की को एक दूसरे को जानने का भी ढंग से मौका नहीं मिलता और अगर थोड़ा बहुत मिलता भी है तब शादी कर लेने के दवाब की वजह से लड़के अपने होने वाले जीवनसाथी से कुछ नहीं बताते. डेटिंग की अवधारणा को हमारे समाज में अपराध की नजर से देखा जाता है. इससे भी ज्यादा मुश्किल तब होती है जब कोई लड़की हिम्मत करके तलाक के बारे में सोचती है, चरित्र पर शक किया जाना और फिर सारा दोष लड़की के ऊपर ही मढ़ दिये जाने की प्रवृति भी शादी को न तोड़ने के निर्णय की वजह है. 'जिस आँगन में डोली में बैठकर जा रही हो, उसी आँगन से अर्थी भी उठे', गहराई से समाये ऐसी दकियानूसी विचारों को त्यागकर ही हम एक सुरक्षित माहौल बना सकते हैं। लड़कियों को जन्म के साथ ही शादी के लिए तैयार करने की मानसकिता में बदलाव लाना जरूरी है. 'शादी टूटी और ज़िन्दगी खत्म' को ही सच मानते रहे तब हत्याएं और आत्महत्यायें होती रहेंगी। 

नितांत जरूरी है कि शादी जैसे बंधन को गहराई से विचार किया जाये। इस रिश्ते की बुनियाद प्यार, एक- दूसरे के प्रति ईमानदारी, पारदर्शिता और आपसी संवाद हो. यक़ीनन समाज की ऐसी व्यवस्था से जूझते मर्द औरत सब है, पर इस पितृसत्तात्मक समाज में जहाँ मर्द को विशेषाधिकार प्राप्त है, निश्चित रूप से पुरुषों की अपेक्षा औरतों को ज्यादा सहना पड़ता हैं और नतीजतन ऐसी ख़बरें सुनने को मिलती है. क्या किसी को भी रिश्तों के ऐसे जाल में उलझा देना सही है? 

परिवार का सहयोग 

बहस का मुद्दा यह भी है कि अगर प्रिया और कमल के परिवारों को कमल के समलैंगिक होने की जानकारी थी तो उन्होंने इसे नजरअंदाज क्यों किया। किसी भी समलैंगिक इंसान को शादी के लिए जबरदस्ती मनाना गलत है.ऐसी स्थितियों में परिवार के बड़े- बुजुर्ग ही दूरदर्शिता नहीं दिखाएंगे, तब कौन दिखायेगा? सही निर्णय लेने में परिवार की अहम भूमिका होनी चाहिए. और यदि शादी हो भी गयी तब समय रहते सही निर्णय लेने से मामले के बिगड़ने की नौबत ही नहीं आती. अपने परिवारजनों के सहयोग से घूँट-घूँट कर जीवन जीने के लिए मजबूर प्रिया शायद यह समझ पाती की रिश्ते सुधरने और पति के बदलने की उम्मीद नहीं है. शायद प्यार और भावों के ऊपर नियंत्रण कर सही दिशा चुनने में मदद मिल जाती। जीवन को नए सिरे से शुरू कर सकने में अपने को सक्षम बना पाती और सही और गलत का निर्णय कर पाती . 

ज़िन्दगी फूलों की सेज नहीं है, उतार- चढाव ज़िन्दगी का हिस्सा है. क्यों दुखद परिस्थितयों में मित्रों की सहायता, परिवारजनों से विचार-विमर्श कर हल निकालने का विचार एकदम गौण हो जाता है. मनोविश्लेषकों और अन्य संगठनों की मदद ली जा सकती थी। खबर है कि प्रिया वेदी ने पहले भी आत्महत्या करने का प्रयास किया था, तब भी कुछ सुधारने की कोशिश पूर्णरूप से नहीं की गयी. हमें समस्याओं को लेकर अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा, समस्याओं के समाधान में मानसिक परिपक्वता लानी होगी। सच का सामना कर और अपने बच्चों का सहयोग कर काफी कुछ परिवर्तित किया जा सकता है.


निश्चित रूप से इस दुखद घटना ने ऐसी परिस्थिति से गुजर रहे युवाओं को खुद के बारे में सोचने और समाज को उनके बारे में विचार करने पर मजबूर किया है.

Monday, 20 April 2015

नेट न्यूट्रैलिटी

एयरटेल द्वारा जीरो योजना की घोषणा के बाद नेट न्यूट्रैलिटी या नेट तटस्थता पर बहस तेज हो गई है।उपभोक्ताओं को कुछ मोबाइल एप्स तक मुफ्त में पहुंच की सुविधा देने की व्यवस्था वाली एयरटेल-जीरो नामक ओपन मार्केटिंग प्लेटफार्म गत सप्ताह कंपनी ने पेश की थी। इसमें शुल्क का बोझ वेबसाइट चलाने वाली या ऐप बनाने वाली कंपनियों द्वारा उठाने की बात कही गयी है. पर नेट तटस्थता की वकालत करने वाले इस योजना का जमकर विरोध कर रहे है. इनका तर्क है कि किस वेबसाइट को धीमा चलाना है, किसे फास्‍ट या फ्री में एक्‍सेस देना है, इस मनमानी का अधिकार टेलीकॉम कंपनियों को मिला तो इंटरनेट की आजादी ही खतरे में पड़ जाएगी। कुछ टेलीकॉम कंपनियां कुछ वेबसाइटों को फ्री या तेज स्‍पीड देकर बाकी वेबसाइटों का रास्‍ता बंद करना चाहती हैं। इंटरनेट पर हर वेबसाइट को बराबर स्‍पीड और बराबर मौका मिलना चाहिए।

और तो और, उपभोक्ताओं के भी नेट के इस्तेमाल की स्वतंत्रता पर खतरा है. अभी यदि कोई व्यक्ति किसी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर से डाटा पैक लेता है तब उसे अपने डेटा के इस्तेमाल के हिसाब से भुगतान करना होता है न की अलग अलग वेबसाइट अथवा ऐप के आधार पर. उसका यह अधिकार है कि वो नेट सर्फ करे या फिर स्काइप, वाइबर पर वॉइस या वीडियो कॉल करे. लेकिन अगर नेट न्यूट्रैलिटी खत्म हुई तो इंटरनेट डाटा के मामले में हमें हर सुविधा के लिए अलग से भुगतान करना पड़ सकता है। इससे कंपनियों को तो फायदा होगा, लेकिन आम जनता के लिए इंटरनेट के काफी महंगे हो जाने की संभावना है । सरल उदाहरण से समझा जा सकता है , जैसे की फोन लगने पर जिस तरह किसी भी नंबर पर कॉल करना ग्राहकों की मर्जी पर निर्भर करता है, उसी तरह इंटरनेट प्लान लेने पर कौन सी साइट देखनी है, इसका निर्णय लेने का अधिकार भी ग्राहकों को ही मिलना चाहिए. टेलिकॉम कंपनियां इसे खत्म करना चाहती हैं.

आम जनता, फिल्म हस्तियों से लेकर कई राजनीतिज्ञों ने मिलकर ट्राइ से मांग की है कि ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ को जारी रखा जाए। सवाल है कि क्या सचमुच टेलीकॉम कंपनियां इंटरनेट सेवा देने के नाम पर इंटरनेट पर ही कब्‍जा जमाना चाहती हैं।

हालांकि फ्लिपकार्ट जैसी इ कॉमर्स की अग्रणी कंपनी ने नेट न्युट्रलिटी पर हुए हंगामे को देखते हुए एयरटेल जीरो योजना से अपने को अलग कर लिया है. इसी बीच एयरटेल ने भी अपना पक्ष साफ करने की कोशिश की है. एयरटेल का कहना है कि इस जीरो प्लान को लेकर लोगों में गलतफहमी है और यह योजना नेट न्यूट्रैलिटी की अवधारणा का बिलकुल उल्लंघन नहीं करती। 'जीरो योजना' के तहत :
  1. किसी भी तरह के एप्लिकेशन और कंटेंट को एक टोल-फ्री सर्विस के जरिए उपभोक्ताओं तक  पहुँचाया जाएगा.
  2. ऐसे कस्टमर्स जिनके पास डेटा पैक नहीं है, वह भी जीरो प्लान के तहत आने वाली वेबसाइट्स को बिना किसी डेटा पैक की मदद के फ्री में एक्सेस कर पाएंगे.
  3. कोई भी साइट्स जो टॉल फ्री सर्विस का हिस्सा हों या नहीं उसे ब्लॉक नहीं किया जाएगा. बिना किसी भेद-भाव के कोई भी बेब-पेज एक्सेस करना संभव है. 
  4. यह प्लेटफॉर्म बिना किसी भेद-भाव के हर उन कंपनियों के लिए खुला होगा जो हमारे इस सर्विस से जुड़ना चाहेंगी।
अपने ग्राहकों को भेजे ईमेल में भारती एयरटेल के प्रबंध निदेशक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (भारत व दक्षिण एशिया) गोपाल विट्टल ने लिखा है, ‘हम पूरी तरह नेट निरपेक्षता के पक्ष में हैं।’’ उन्होंने कहा कि यह प्लेटफॉर्म सभी ऐप डेवलपर्स, कंटेंट प्रदाताओं और इंटरनेट साइटों को समानता के आधार पर उपलब्ध है और सभी को समान रेट कार्ड की पेशकश की जा रही है।यह भी कहा है, ‘‘इसमें और टोल-फ्री वॉयस मसलन 1800 में कोई अंतर नहीं है।’’ कंपनी के रूप में हम किसी वेबसाइट को ब्लॉक नहीं करते हैं और न ही उसे अलग रफ्तार की पेशकश करते हैं। हमने ऐसा कभी नहीं किया है और न ही ऐसा करेंगे। उन्होंने कहा कि सभी वेबसाइट, कंटेंट या एप्लिकेशन के साथ उसके नेटवर्क पर समान बर्ताव किया जाएगा, बेशक वे टोल-फ्री प्लेटफॉर्म पर हैं या नहीं।

यह विचारणीय मुद्दा है कि क्या सच में जीरो योजना नेट न्यूट्रैलिटी के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या नहीं? साइबर मामलों के विशेषज्ञ पवन दुग्गल बताते हैं कि इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनियां अब इंटरनेट पर उपलब्‍ध कॉन्‍टेंट से कमाई के रास्‍ते तलाश रही हैं। यानी इंटरनेट पर आप जो देखते हैं, पढ़ते हैं और खरीदते हैं, उसमें भी इन्‍हें हिस्‍सा चाहिए। दूसरी तरफ वाट्स एप, वाइबर जैसी कंपनियां इंटरनेट के जरिए फ्री मैसेज और कॉल की सुविधा दे रही हैं, इन्हें भी टेलीकॉम कंपनियां बंद कराना चाहती हैं।

नेट न्यूट्रैलिटी के पैरोकारों का दावा है, नई तकनीक ने भारी- भरकम निवेश करने वाली इन टेलिकॉम कम्पनियाँ के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. स्काइप जैसी कम्पनियाँ इनके मुनाफे को कम करने में लगी है, वॉट्सऐप के मुफ्त ऐप ने एसएमएस सेवा को लगभग खत्म ही कर डाला है, इसलिए ऐसी सेवाओं के लिए ज्यादा रेट वसूलने की कोशिश की जारी है , जो उनके कारोबार और राजस्व को नुकसान पहुंचा रही हैं। यदि एयरटेल की जीरो योजना अस्तित्व में आती है तब निश्चित रूप से इंटरनेट के स्वरुप में व्यापक परिवर्तन आएगा। स्वस्थ प्रतियोगिता जाती रहेगी, बड़ी कंपनियों का दबदबा बढ़ेगा और भविष्य में नई और छोटी कंपनियों के अस्तित्व में आने के रास्ते बंद होंगे. बेशक खुली और तटस्थ इंटरनेट का कोई विकल्प नही.

यदि कंपनी के मकसद नेक हैं, तब भी कई सवाल हैं जिसके उत्तर देने होंगे-
  • देश के तमाम लोगों जो की इंटरनेट प्रयोग नहीं कर पा रहे थे, उन्हें इंटरनेट से जोड़ने और अभिव्यक्ति की आजादी का अहसास दिलाने के उद्देश्य वाली इस महत्वकांक्षी योजना की शुरुआत करने वाले एयरटेल ने योजना की घोषणा करने से पूर्व ही जनता तक यह बात  क्यों नहीं पहुंचाई?
  • अगर यह प्लान जनता के हित  में भी है तब क्या तब भी इस योजना के लागू होने के बाद इंटरनेट इस्तेमाल करना आम आदमी के लिए उतना ही आसान होगा? मसलन यदि हम किसी ब्लॉग पर जाएँ जो मुफ्त में उपलब्ध है और उस ब्लॉग में एक यू-ट्यूब वीडियो या किसी अन्य साइट का लिंक भी डाला गया है, जिसे देखने के लिए पैसे देने होंगे तब क्या आम इंसान के लिए असमंजस की स्थिति नहीं होगी?
  • आखिरकार एयरटेल का करार कंपनियों  के साथ किन शर्तों पर हुआ है, इसे और विस्तार से बताना होगा।  जैसे अगर यह टोल फ्री नंबर जैसी ही व्यवस्था है, तब इसके लिए कितनी कीमत चुकानी होगी? 
  • किसी स्टार्ट अप कंपनी के लिए इस योजना  में शामिल होना क्या आसान होगा ?  
  • अब सवाल यह भी है की क्या केवल टोल फ्री नंबर के वजह से ही घर घर तक मोबाइल पहुंचा है ? यदि सच में इंटरनेट से जुड़ने वाले लोगों की संख्या में इजाफा करना मकसद है, तब क्या इंटरनेट की दरों में कमी लाना ज्यादा  सरल उपाय नहीं है?
  • इस साल के अंत तक वेबसाइट को बंद कर केवल ऐप से ही बिक्री किये जाने की संभावना की फ्लिपकार्ट द्वारा आज की गयी घोषणा क्या मात्र संयोग है?
कुछ लोगों ने निस्वार्थ भाव से कड़ी मेहनत करके मानवता के कल्याण के उद्देश्य से इंटरनेट की आधारशिला रखी थी. महज कुछ निवेश कर, स्पेक्ट्रम खरीद लेने से इंटरनेट पर इन टेलीकॉम कंपनियों का अधिकार होना निराशाजनक है. अर्थव्यवस्था के अन्य निहायत जरूरी संसाधनों जैसे ही इंटरनेट जैसे मूल्यवान संसाधन का कुछ टेलीकॉम कंपनियों का संरक्षक बन जाना कहीं से उचित प्रतीत नहीं होता .

नेट न्यूट्रैलिटी पर विवाद कोई नई बात नहीं है. कई देशों में इस सम्बन्ध में कड़े कानून बनाये गए हैं. अमेरिका, चिली, नीदरलैंड और ब्राजील जैसे देश पहले ही ‘नेट न्यूट्रैलिटी’ अपना चुके हैं, जबकि भारत में कोई कानून नहीं है। मुद्दे को समझने के लिए एक कमिटी का गठन किया जा चुका है जिसकी सिफारिशें मई महीने के दूसरे हफ्ते तक आनी है.  इतना तो तय है कि मेक इन इंडिया का नारा लगाने वाली वर्तमान सरकार को सोच समझ कर कदम उठाना होगा क्यूंकि यह हमारे और सबसे बढ़कर हमारे देश के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा सकता है.