Friday, 30 March 2018

शादी और सरनेम



नाम इंसान की पहचान है, इंसान के व्यक्तित्व का हिस्सा। जन्म के समय दिए नाम पर ही टिके रहना या उसे बदलना किसी भी इंसान का व्यक्तिगत निर्णय है. पर, कई देशों में शादी के बाद महिलाओं को अपना सरनेम हटाकर अपने पति का सरनेम लगाना कानूनन जरूरी है. हालांकि, हमारे देश में ऐसी बाध्यता नहीं है परन्तु परंपरागत रूप से शादी के बाद औरतों के सरनेम बदलने की प्रथा रही है। जहां अक्सर लड़कियाँ शादी के बाद इसे सहर्ष या फिर थोड़े दवाब में स्वीकार कर लेती हैं वहीं कुछ महिलायें डबल-बैरल्ड या हाइफ़नेटेड नाम अपनाकर यानी अपने सरनेम के साथ पति का भी सरनेम जोड़कर एक नई पहचान बनाती हैं. परन्तु कई महिलाओं को यह नामांतरण का ख्याल रास नहीं आता. अचानक से शादी के बाद अपने घर-परिवार और जन्म स्थान छोड़ने के साथ -साथ वर्षों से जुड़े नाम और उससे बनी पहचान को बदल देना आसान नहीं होता।

कुछ वर्ष पूर्व शादी डॉट कॉम द्वारा कराये गए सर्वेक्षण में 24 से 38 वर्ष के बीच 11 हजार 200 अविवाहित महिलाओं से जब उनके विचार मांगे गए तो 40.4 फीसदी ने कहा कि शादी के बाद वे अपना सरनेम नहीं बदलना चाहतीं। सरनेम के बदलने को लेकर यदि विकसित देशों के आंकड़ों पर नजर डालें, 1994 में यूरोबैरोमीटर के एक सर्वे में दावा किया गया था कि 94 प्रतिशत ब्रितानी महिलाएं शादी के बाद अपने पति का नाम अपना लेती हैं. हालाँकि,पिछले दो दशकों में इस आंकड़े में कुछ कमी आई है और वर्ष 2013 में यह 75 प्रतिशत तक पहुँच गया.

स्पष्ट है कि महिलाओं के सामाजिक स्थिति में बदलाव के साथ -साथ यह मुद्दा उतना सरल नहीं रहा. हमारे समाज में शुरू से पितृसत्तात्मक व्यवस्था रही है, जिसके तहत शादी के बाद लड़कियों का अपने माता -पिता और भाई-बहन को छोड़कर अपने पति के साथ ससुराल में बसने और उसी परिवार के एक अंग के रूप में माने जाने का रिवाज रहा है और नाम में किये जाने वाला बदलाव, उसी की एक कड़ी है. शादी के बाद बने नए रिश्तों के साथ खुद को जोड़ने और परिवार का नाम आगे बढ़ाने को लेकर यह जरूरी समझा जाता था.

लेकिन सवाल उठता है कि क्या आधुनिक समाज में जहाँ स्त्रियों की सोच, दशा में व्यापक परिवर्तन हुये हैं , इस तरह नाम बदलने की परंपरा कायम रखना जरूरी है? परंपरायें तो इंसान की सहूलियत के लिए बनायी जाती है और अगर यह आपसी विवाद का मुद्दा बनने लगे तो क्या किया जाए?

सरनेम बदलने के पक्ष में तर्क दिया जाता है लड़की को शादी के बाद मिली नयी पहचान के लिए यह एक आवश्यक कदम है। कई लोगों का दावा है कि विवाह के बाद पति-पत्नी दोनों को उनके अलग -अलग अस्तित्व के रूप में न देखकर एक पारिवारिक इकाई के रूप में जाना जाता है, ऐसे में दोनों का सरनेम एक होना अनिवार्य है. कुछ औरतों का मानना है कि शादी के बाद पति की पहचान को अपने नाम के साथ जोड़ने से दोनों के बीच बना यह रिश्ता और दृढ होता है। यह पति और ससुराल पक्ष की ओर औरतों का समर्पण भी जाहिर करता हैै. इस सन्दर्भ में पितृसत्तात्मकता जैसे तर्क को यह कहकर ख़ारिज किया जाता है कि विवाह पूर्व लड़कियों को पिता द्वारा प्रदत्त सरनेम भी तो उसी पैतृक समाज का द्योतक है।

कानूनी तौर पर सरनेम न बदलने के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है, ढेरों कागजी कार्रवाई का होना मतलब बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना।कई महिलाएं इस वजह से जब तक ज़रूरी न लगे तब तक अपने नाम को बदलने के बारे में नहीं सोचतीं परन्तु वहीं कई औरतें अपने नाम के साथ जुड़ी अपनी भावनाओं और अपनी पहचान को किसी कीमत पर खोने को तैयार नहीं हैं.उन्हें अपने नाम के साथ अपने माँ-बाप से जुड़े होने का अहसास होता है.इन महिलाओं का तर्क है कि, नाम के साथ उनका करियर, उनका काम, अनुभव और उनका व्यक्तित्व जुड़ा होता है, ऐसे में नाम बदलने की सोच अव्यवहारिक है.

महिलाओं के हकों की दिशा में काम करने वालों के अनुसार इस परंपरा को अपना लेने से महिलाओं को पुरुषों से हीन माने जाने के विचार को बल मिलता है. सारे बदलावों के लिए महिलाओं के ही तैयार रहने की उम्मीद क्यों? पारिवारिक ईकाई की जहाँ तक बात है, पत्नी का सरनेम पति भी अपनाकर इस रिश्ते को एक नई पहचान दे सकते हैं.

एक अध्ययन के मुताबिक ऐसी महिलाएं जो शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदलती, पुरुष उनके प्रति नकारात्मक भावना रखते हैं. उन्हें कम आकर्षक और खराब मां मानने के साथ ही आपसी रिश्ते में कम वफादार माना जाता है. हद तो तब हो जाती है जब सरनेम नहीं बदलने के औरतों के निर्णय को ससुराल पक्ष के लोग अपनी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान से जोड़ने लगते हैं और तो और कभी-कभी यह मुद्दा पति- पत्नी के बीच अनबन और तलाक जैसे गंभीर मसले का कारण बन जाता है.

हालांकि कुछ लोग इस मुद्दे को ज्यादा तूल देने के पक्षधर नहीं हैं. उनका तर्क है कि सरनेम से ज्यादा लगाव रखने का कोई कारण नहीं है, सरनेम का महत्व केवल अपनी पहचान को आसान बनाने तक ही रखा जाना उचित है. ज्यादा जरूरी यह है हम सरनेम के वजाय अपने व्यक्तिगत गुणों को अपनी पहचान का आधार बनाने पर बल दें.

कुछ पश्चिमी देशों में पति का स्वेच्छा से अपने सरनेम के स्थान पर अपनी पत्नी का सरनेम लगाने का भी प्रचलन बढ़ा है. कुछ मामूली कारणों मसलन अपना सरनेम पसंद न आना के अलावा समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था और लैंगिक भेदभाव को चुनौती देना भी इसका उद्देश्य है.

आधुनिक समाज में जहाँ समाज में स्त्री-पुरुष समानता को लेकर बहस छिड़ी है, नाम बदलने या न बदलने के निर्णय का अधिकार महिलाओं को दे देना क्या उचित नहीं?
















Friday, 23 March 2018

क्या पूरी होगी आस?


हर शाम लालटेन के शीशे को साफ़ करना, किरोसिन भरना और जलाकर निश्चित स्थान पर रखना, कभी २ दिन कभी ७ दिन या कभी कभी एक पखवाड़े और महीने तक बिजली का इंतज़ार करना, गर्मियों में बिस्तर पर लेटकर घूमने की आस के साथ पंखे को एकटक देखकर या टीवी पर आ रहे किसी फेवरिट कार्यक्रम के बीच में बिजली के गुल हो जाने के उपरांत मन-ही-मन १०८ दफा भगवान का नाम जपना और होली,दशहरा, दीवाली या छठ जैसे कुछ पर्वों को छोड़ साल के अन्य किसी दिन शाम के वक्त बल्ब जलने को किसी उत्सव से कम न सेलिब्रेट करना☺, ऐसी तमाम यादों से सराबोर मेरा मन इस महीने बिहार में गुजारे कुछ दिनों के दौरान वहां तक़रीबन हर रोज २० घंटे की बिजली आपूर्ति को देखकर आश्चर्यचकित हुए बिना न रहा. रही-सही कसर इन्वर्टर और बैटरी पूरी कर दे रहा है। 'हर घर बिजली- लगातार ' मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा बिहार के विकास को ध्यान में रखकर किये गए सात निश्चयों में से एक निश्चय है, जिसके तहत बिहार के हरेक घर को बिजली से रोशन करने का वादा उन्होंने जनता से किया है. सौभाग्य योजना के तहत दी गयी जानकारी के मुताबिक बिहार में कुल 123.46 लाख ग्रामीण परिवार में से 58.76 लाख घरों में अबतक बिजली पहुंचाई जा सकी है जबकि 64 लाख से अधिक घर बिजली से अभी भी महरूम हैं. आशा है, नीतीश कुमार इस योजना के लक्ष्य को जल्द ही पूरा करेंगे। पटना से नालंदा जिले की तरफ जाते वक्त रास्ते के कुछ गाँवों में बिजली के खम्भे लगाने का काम होते देखकर तसल्ली हुई कि शायद अब बिहार 'लालटेन युग' से बाहर निकलने के रास्ते पर है!
भारत के अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में दौड़ती सडकों से तुलनीय सड़कें बिहार में देखकर मन में सवाल उठा कि वाकई जनता के 'अच्छे दिन' की शुरूआत तो नहीं है ये ? कई छोटे-छोटे गाँवों के सडकों के माध्यम से बड़े शहरों से जुड़ जाने से लोगों की जीवन -शैली बदली है, व्यापार -व्यवसाय बढे हैं, आने -जाने में लगने वाले समय में बचत ने लोगों के मानसिक स्तर पर प्रभाव डाला है. सडकों पर वाहन रोककर किये जाने वाले लूट-खसोट में भारी कमी आयी है. अगर आंकड़ों की तरफ न भी झांके तब कईयों का काम निपटाकर देर रात तक बिना परवाह किये घर लौटने की हिम्मत करना इस तथ्य की पुष्टि करता है. गुजरे वो दिन जब शाम होने तक घर तक किसी अपने या परिचित के न पहुँचने की खबर पाकर दिल की धड़कनें बढ़ जाया करती थी और तब तक सामान्य न होती जब तक सकुशल पहुँचने की खबर कानों में न पड़ती थी. उस डर और दहशत से छुटकारा जनता के लिए एक बहुत बड़ी राहत कही जाएगी. पर आगे भी, एक चुस्त -दुरुस्त सुरक्षा -व्यवस्था के साथ सरकार को चौकस रहना होगा ताकि वापिस जनता के शांति के साथ जीने के अधिकार में कोई सेंध न लगा सके.

होली बिहार में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है. समय में बदलाव के साथ अब त्योहारों की रौनक पहले जैसी नहीं होती। रंग खेलने से लेकर, पूरी-पुए, दही-बड़े, फ्राइड नमकीन खाने में भी लोग सावधानी बरतते हैं. हाँ, बच्चे हाथ में पिचकारी लिए सुबह से ही रंग-बिरंगी पिचकारी हाथ में लेकर एक -दूसरे पर रंग डालने को आतुर दिखे। पर, एक बड़ा अंतर कुछ बड़ों की होली में साफ़ दिखा। शराब के नशे में धुत लोगों का जत्था गाँव का चक्कर लगाते नहीं दिखा, दूकान की शटर गिराकर ४-५ लोगों के झुण्ड का देशी-विदेशी शराबों के साथ पार्टी करने की भी खबर या शराब के नशे में बेसुध इधर -उधर पटकाये लोगों को घर तक पहुंचाने जैसी खबरें भी अब होली का हिस्सा नहीं बनीं । कुछ मनचले लड़कों की जमात का शराब पीकर तेज गति से गाडी या बाइक चलाने और तत्पश्चात छोटी- बड़ी दुर्घटना की खबर का कानों में न पड़ना शराबबंदी कानून का सख्ती से लागू होने को प्रमाणित करता दिखा. 'शराबबंदी ' कानून के पक्ष और विपक्ष के अपने तर्क हैं, पर इस कानून ने होली और शराब की जुगलबंदी के मिथक को तोड़ने का काम किया है.

पटना में मुख्य सडकों के चारों तरफ कोचिंग क्लासेज की शत प्रतिशत सफलता की गारंटी देते बड़े- बड़े बोर्ड और पोस्टर्स और राजनीतिक दलों के आत्मप्रशंसा जैसे विज्ञापनों के अलावा सामाजिक मुद्दों के प्रति आम जनों के बीच जागरूकता फैलाते पोस्टर्स भी काफी संख्या में दिखे। कोई शिक्षा और स्वच्छता के महत्त्व को बता रहा था तो कोई बाल विवाह और दहेज़ प्रथा की बुराइयों को, कुछ लड़कियों को पढ़ाने के महत्व को. बालिका साईकिल योजना, मुख्यमंत्री पोशाक योजना और प्रोत्साहन योजना, नशाबंदी जैसे प्रावधान और गत २१ जनवरी को दहेज़ और बाल विवाह के विरोध में मानव श्रृंखला का आयोजन, सरकार का विकास के साथ सामाजिक मुद्दों पर भी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मुख्यमंत्री बनने के बाद वे न्याय यात्रा, विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा, प्रवास यात्रा, सेवा यात्रा, संकल्प यात्रा के तहत राज्य के लोगों की शिकायतें सुन चुके हैं और एक बार फिर निश्चय यात्रा की घोषणा कर सात निश्चय से सम्बंधित प्रगति की समीक्षा और जनता की शिकायतों के निपटारे का प्रयास करनेवाले हैं.

यक़ीनन नीतीश कुमार की अगुवाई में सरकार ने विकास की दिशा में सराहनीय कदम उठाये हैं. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद बेशक कुछ परिवर्तन हुए हैं। अब बिहार उपहास का विषय कम, बाकी दुनिया के लिए सुधारों के मद्देनजर कौतूहल का विषय ज्यादा बन गया है. नजरें नीतीश कुमार पर टिकी है. उम्मीदें बहुत हैं, काम भी बहुत करने हैं, सड़क, बिजली से लेकर उद्योग-धंधे लगाकर रोजगार के नए अवसर प्रदान करना, कृषि के विकास की तरफ ध्यान, भू-पुनर्विभाजन, शिक्षा और चिकित्सा के स्तर में सुधार जैसे कई वादे हैं, जिन्हें जल्द -से- जल्द पूरा करने की जिम्मेवारी नीतीश कुमार के कंधे पर है. आजादी मिलने के सत्तर साल बाद भी ३८ में से १७ जिलों में हर १ लाख लोगों पर अधिकतम ३ चिकित्सक का होना WHO द्वारा निर्धारित १:१००० के मापदंड के हिसाब से अत्यंत शर्मनाक है . शिेक्षा के क्षेत्र की भी हालत दयनीय है, विद्यार्थी और शिक्षक का अनुपात जहाँ प्राथमिक शिक्षा में ३०:१ तथा उच्च प्राथमिक वर्ग में ३५:१ निश्चित की गयी है, वहीँ बिहार में क्रमशः यह अनुपात ४३:१ और ९६:१ है.

हालांकि विकास की गति को लेकर जनता खुश नहीं दिखती। शुरूआती वर्षों में जिस तेजी से प्रगति को महसूस किया गया, वह अब नदारद है. आम जनता की तकलीफों और चिंताओं से इतर महज अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने एवं राजनीतिक दलों के वर्ग और जाति जैसे फालतू मुद्दों में उलझ कर विकास और प्रगति को दरकिनार करने का डर बिहार की जनता के जेहन में है.

राजगीर स्थित शांति स्तूप के दर्शन को सुविधाजनक बनाने की दृष्टि से लगाए गए रोपवे सेवा का संचालन को संभालते कर्मचारियों द्वारा एक युवती को निर्धारित रास्ते से पंक्ति में आने के निर्देश दिए जाने के बाद उस महिला का बेवजह उनसे वाद-विवाद करते देख मन विचलित हुआ। जरूरत है, हमें खुद को सुधारने की. जब हम सुधरेंगे, तब बिहार सुधरेगा।

Thursday, 22 February 2018

सफर कुछ अलग-सा


कागज की नाव बनाकर उसे बारिश के पानी में छोडना और तेजी से ओझल होते देखना मन में जैसी ख़ुशी का संचार करता था, वैसी ख़ुशी मोटर बोट खिलौने में कहाँ मिलती थी  ? कुछ ऐसे ही उम्मीदों के साथ पिछले रविवार हमने सेलिंग बोट की  राइड लेने की योजना बनाई. पहले से निर्धारित समय पर हमलोग गेटवे ऑफ़ इंडिया से सटे  जेटी नंबर ५ पर पहुँच गए. वहां से हमें ट्रांसफर बोट के माध्यम से सेलिंग बोट तक ले जाया गया.  सेलिंग बोट को किनारे तक लाने की अनुमति नहीं है. जाते -जाते हमें कई अन्य सेलिंग बोट, छोटे- बड़े मोटर बोट और प्राइवेट याच भी दिखाई दे रहे थे, कुछ पर्यटकों को ले जाते और कुछ समुन्दर के किनारे एंकर के सहारे पार्क किये हुए और हवा के संग-संग, आगे -पीछे हिलते- डुलते अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते. एलीफैंटा की गुफाओं और अलीबाग बीच भी यहाँ से जाया जा सकता है.
अब हमलोग  तैयार थे, अरब सागर के नीले पानी की अनोखी दुनिया को करीब से महसूस करने के लिए और इस छोटी मगर यादगार यात्रा को सफल बनाया नाव के चालक और उनके एक सहयोगी ने. चंद मिनट ही  काफी थे यह समझने में कि नाव को चलाने में कितने धैर्य और अनुभव की दरकार होती है !खड़े नावों या जहाजों के बीच से नाव के लिए रास्ता बनाना, नावों की दिशा बदलना या हवा का रूख समझ कर सेल को एक तरफ से दूसरी तरफ करना आसान काम नहीं है!
इंजीनियरिंग की सबसे पुरानी शाखा है, नौका निर्माण। हल्ल या पतवार, बड़ा-सा सेल, सेल और बूम को थामे एक बड़ा सा डंडा या मास्ट, नाव को  दिशा देने केलिए ट्रिलर, चप्पू, रस्सियां इत्यादि नाव के कुछ मुख्य भाग   हैं.
 हवा अच्छी चल रही थी और  उसके सहारे नाव भी अच्छी गति से आगे बढ़ी जा रही थी। दूर सागर और आसमान आपस में एक दूसरे में समाते हुए दिख रहे थे,जानते हुए भी यह एक भ्रम है,एकबारगी सच प्रतीत हो रहा था. नाविक ने बताया, जब हवा कम रहती है तब नाव इतनी तेजी से आगे नहीं बढती, और भी कम होने पर चप्पू चलाकर नाव को खेना पड़ता है, जो काफी मेहनत भरा काम है.  कभी- कभी  हवा के न रहने पर नाव के कहीं बीच में भी फँस जाने का डर रहता है, तब अन्य उपाय करने पड़ते हैं. डरने की बात नहीं,ऐसा बहुत कम ही होता है.☺ पर हाँ, डाल्फिन के दर्शन के मामले में किस्मत ने हमारा साथ नहीं दिया। सी गल और अन्य पक्षी अपना आहार ढूंढते और मछलियों का पीछा करते जरूर दिखे, और पानी में जगह-जगह तैरते नावों के लिए लगाए गए मार्कर पर कुछ पक्षियों को  आराम फरमाते और उड़ना छोड़ उनके सहारे ही किनारे का रूख करते देखना मजेदार लगा.
नाविक और उनके सहयोगी ने हमारे द्वारा पूछे गए लगभग सभी सवालों के जवाब दिए. सफर के दौरान दिखाई देते सभी नेवी के जहाज, ऑयल वेल, नेवी अधिकृत द्वीपों, लाइट हॉउस, इंडियन नेवी द्वारा एक जहाज को रेस्टोरेंट के रूप में परिवर्तित करने के बारे में भी हमें बताया। चलते-चलते हमलोग एक फिशिंग बोट  के करीब पहुंचे। उन्होंने बताया कि कुछ लोग रोज शाम फिशिंग बोट से मछलियों को पकड़ने के अपने अभियान पर निकलते हैं और सुबह-सुबह पकड़ी मछलियों को तट पर दिख रहे सेसॉन डॉक पर पहुंचा देने के बाद इनका काम खत्म होता है . फिशिंग बोट पर कोली समुदाय की आराध्य देवी, मुम्बा आई का भी झंडा लगा दिखा। ज्यादातर कोली समुदाय के लोग इस धंधे से जुड़े हैं.

हवा के रूख को देखते हुए सेल को बाईं या दाई और करना पड़ता है और इस बाबत नाविक के निर्देश मिलने पर नाव में सवार हमें कई दफा सर झुकाना पड़ा. यह थोड़ी असुविधाजनक लग सकती है पर यदि सेलिंग बोट पर बैठकर समुद्र की खूबसूरती का मजा लेना है, तब अलर्ट रहना भी उतना ही जरूरी है!

प्राचीनकाल से लोग सागर की यात्रा करने और इसके रहस्यों को जानने की कोशिश में लगे हुए हैं. जल जंतुओं की एक रहस्यमयी दुनिया, ब्लू व्हेल से लेकर प्लैंकटन तक. पता नहीं और कितने अद्भुत जीव-जंतु, दुर्लभ पौधे और भांति -भांति के बैक्टीरिया इन महासागरों के गर्भ में मौजूद हैं!

कितनी सारे रोमांचक किस्सों को याद दिलाता है यह दूर तक फैला नीले पानी का अम्बार! दूर से आते जहाज के मास्ट के ही हमेशा सबसे पहले देखे जाने के बाद ही इंसानों ने सोचना शुरू किया कि कहीं दुनिया समतल न होकर गोल तो नहीं ! सिंदबाद की रोमांचक कहानियाँ हो या अर्नेस्ट शैकलटन की सन १९०७ की साहसिक नीमरोड अभियान की साहस से भरी सच्ची घटना, समुद्र के बीच में जिंदगी और मौत के बीच गुजारे गए कई दिन, सब ऐसे ही किसी सागर से ही तो जुडी है. वास्कोडिगामा, कोलंबस, मार्को पोलो की समुद्री यात्राओं के बारे में किसने न सुना होगा? विभिन्न सभ्यता-संस्कृतियों को जानने -समझने से लेकर उपनिवेशों की स्थापना के किस्से इन यात्राओं से जुड़े हैं.

हमने शाम का वक्त यात्रा के लिये चुना था ताकि सनसेट का भी नज़ारा देख सकें।  हमारी नाव वापस लौटने के लिए मुड़ चुकी थी. नीले पानी पर सूरज की किरणों से बनी सुनहरी पट्टियों हमारे नाव का पीछा करती दिख रही थी. प्रकृति के इस अद्भुत रंग-संयोजन का कोई मुकाबला है क्या? हम मुंबई के करीब पहुँच रहे थे, इमारतें कुछ ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगी थी. और देखते ही देखते सूरज भी चल पड़ा था धरती के दूसरे हिस्से को प्रकाशमान करने और हम २ घंटे की थोड़ी अलग और यादगार यात्रा कर वापस अपनी राह!

Sunday, 18 February 2018

हँसी पर पहरा

अभी कुछ दिन पहले एक हँसी या कहें एक जोरदार ठहाके की गूंज सबने सुनी. हुआ यूँ कि राज्य सभा में देश के प्रधानमंत्री के एक वक्तव्य सुनकर विपक्षी पार्टी की सांसद रेणुका चौधरी अपनी हंसी रोक नहीं पाईं. हालांकि कुछ साल पहले उनके फफक -फफक कर रोने की भी घटना चर्चा में रही थी. खैर, जहाँ प्रधानमंत्रीजी की हाजिरजवाबी को कुछ लोगों ने खूब सराहा वहीँ उन्हें इस घटना को रामायण की कहानी से जोड़ने पर आलोचनओं का शिकार भी होना पड़ा. एक तरफ सत्ता पक्ष के सदस्यों ने मोदीजी  का जोरदार समर्थन किया और दूसरी ओर विपक्षी पार्टी ने उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दे डाली.
पर  इस घटना ने बहुत धीमी ही आवाज में ही सही पर एक जरूरी मुद्दा उठाया जिसे औरतों के 'राइट टू हैप्पीनेस' से जोड़कर देखा जा सकता है.
प्रकृति ने हमें 'हँसी' जैसी एक अचूक औषधि से नवाजा है, हँसने से रक्त-संचार बढ़ता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है. मानसिक तनाव घटाने के साथ -साथ सकारात्मक सोच बढ़ाने के लिए भी हॅसने को प्रेरित किया जाता है. सीधे-सादे शब्दों में, एक खुशहाल और तनावमुक्त जिंदगी की एक महत्वपूर्ण शर्त है, हँसने को न भूलना।
इंसान जब खुश होता है तब हँसता है, मन में अचानक आया कोई खुशनुमा ख्याल हो या अपनों से मुलाकात या बातचीत, या बस खेलने के उमंग को हँसकर अथवा मुस्कुराकर इजहार करता है. हँसी को संक्रामक भी माना जाता है, एक हँसता हुआ चेहरा बहुतों को हँसाने में कामयाब होता है, दिलों को जोड़ता है, और  कईयों को अपनी तरफ आकर्षित भी करता है. निसंदेह हँसने के भी अपने नियम-कानून हैं और यह सही भी है. पर कई दफा लड़कियों के लिए ये नियम कुछ ज्यादा ही सख्त दिखाई पड़ते हैं. लड़कियों के हँसने और मुस्कुराने को लेकर बेवजह रोक-टोक की जाती है. लड़कियों यहाँ भी भेद-भाव का शिकार होती हैं. आँचल में मुंह छिपाकर या   मुंह दबाकर ही हँसने को ही शिष्टाचार समझा जाता है. हँसने-मुस्कुराने के तरीके पर तंज कस उच्श्रृंखल होने जैसे तोहमत लगा दिए जाते हैं. तहजीब और शिष्टाचार के नाम पर असल में जब  पाबंदियां 'लड़की होने के कारण लगती है ' तब मन का आहत होना लाजिमी है. यह बिना गुनाह किये दोषी ठहराने सरीखा  है और एक सीमा से ज्यादा रोक-टोक से लड़कियों के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.
क्या समय नहीं आया है कि औरतों की हँसी पर लगा पहरा हटाया जाए एवं हर चेहरे पर एक जैसी   और खिलखिलाती हँसी को खुशहाल भारत का प्रतीक बनाया जाये?



Tuesday, 13 February 2018

मुख्यमंत्रीजी का आगमन


कुछ दिन पहले लाउडस्पीकर से की जा रही एक घोषणा सुनाई दी. आवाज स्पष्ट न थी, पर अनुमान लगा कि शायद किसी राज्य के मुख्यमंत्री यहाँ किसी गार्डन में आम जनता को सम्बोधित करने वाले हैं. अक्सर ऐसा होता है, वर्तमान की कोई घटना, कुछ आवाजें या बस कोई खुशबू सहसा ही हमें अतीत की कुछेक घटनाओं की याद दिलाती है और सबकुछ चलचित्र की भांति हमारे सामने घूम जाता है.

करीब २२-२३ वर्ष पहले मिली ऐसी ही एक खबर पर अनायास ही ध्यान चला गया.. सूचना के मुताबिक राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्रीजी की हमारे गांव में पधारने की योजना बनी थी. सूचना मिलने के कुछ ही दिनों के अंतराल में निरीक्षण के लिए आये-दिन आने वाली  सरकारी अफसरों  की गाड़ियों ने इस समाचार को बिलकुल पुख्ता ही कर दिया था. चारों तरफ इसी की चर्चा थी. दूसरे अन्य गाँवों तक खबर फैलते देर न लगी. गांव का इतिहास खंगाला जाने लगा कि कब अंतिम दफा यहाँ ऐसे ही किसी अन्यमहापुरुष के चरण यहाँ की धरती पर पड़े हों! दिन नजदीक आते ही निर्धारित स्थान पर बॉस बल्लों का ढेर लग गया. मंच, जिस पर खड़े होकर मुख्यमंत्रीजी आम जन को सम्बोधित करने वाले थे, का ढांचा तैयार हुआ, VIP अतिथियों के लिए विशेष व्यवस्थायें की जा रही थी.  जैसे- जैसे समय नजदीक आ रहा था, सम्पूर्ण इलाके में उत्सव जैसा माहौल छाने लगा था . ऊपर से मुख्यमंत्री महोदय के हेलीकॉप्टर से आने की सूचना से  तो लोगों की उत्सुकता और बढ़ गयी थी. युद्धस्तर पर एक हेलिपैड बनने का काम भी शुरू हो चला था। सुनने में आया कि इंतज़ाम के लिए मिली राशि का भारी दुरूपयोग भी हुआ, पर बेशक ज्यादातर लोग निस्वार्थभाव से ही मुख्यमंत्री के आने का इंतज़ार कर रहे थे ☺. दूर -दराज इलाकों से भारी संख्या में लोग भी आकर मुआयना करने पहुँचने लगे।  अंदाजा होने लगा था की उस दिन मेले जैसी भीड़ जुटने वाली है और हुआ भी वैसा ही, बड़े बूढ़ों का कहना था कि ऐसी भीड़ इस गांव में कभी न देखी थी! विजयादशमी के मेले में भी इतनी भीड़ कभी न जुटी थी.

  अब जब ऐसा सुअवसर आ ही रहा था तब हमारे विद्यालय के शिक्षकों ने मिलकर भी बहती गंगा में हाथ धोने का निर्णय ले लिया कि वर्षों से उपेक्षित पड़े इस विद्यालय की सारी समस्याओं को एक चिट्ठी में लिखकर मुख्यमंत्री जी को सौंप देंगे. वैसे भी, चरवाहा विद्यालय की स्थापना करके शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर  दुनिया भर को हैरान करने वाले के समक्ष इन छोटी-मोटी समस्याओं  की क्या बिसात ?अब काहे की देर, लग गया पूरा विद्यालय बढ़िया से बढ़िया कंटेंट वाली चिट्ठी लिखने में. २-३ दिन के अंदर एक लम्बा- सा शिकायती पत्र भी बना लिया गया.  टूटी हुई छप्परों, बेंचों की कमी , प्रयोगशाला और पुस्तकालय  का अभाव, पीने का पानी और शौचालय के न होने से उत्पन्न परेशानियों का उल्लेख कर, दया-दृष्टि फेरने का आग्रह कर दिया गया. भव्य स्वागत के लिए एक स्वागत गान  गाने की योजना बनी. बस, सारा स्कूल तैयारी में जुट गया. कई स्वागत गानों में से एक स्वागत  गान का चुनाव किया गया और धुआंधार प्रैक्टिस शुरू हो गई। साथ ही, रोज पत्र का आकलन भी किया जाता, कुछ शिकायतें काटी जाती, कुछ जोड़ी जाती। महामहिम के आतिथ्य-सत्कार में कोई कमी न रह जाए, इस पर पूरा ध्यान दिया जा रहा था☺ हालिया सर्वेक्षण के हिसाब से शिक्षा के स्तर में गिरावट के समाचार मिले हैं, और कितनी गिरावट, अंदाज लगाना मुश्किल है.
खैर, जैसे राम का स्पर्श पा देवी अहिल्या वर्षों के श्राप से मुक्त हो पायी थी, वैसे ही कुछ चमत्कार की आशा बांधे हमसब उस पावन दिन का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे.
आ ही गया वो दिन। एक-डेढ़ घंटे के ही बिलम्व के बाद ही हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट ने दूर से ही उनके आने की सूचना दी और लोगों का हुजुम उनकी जय-जयकार करते दौड़ पड़ा मुख्मंत्रीजी की झलक पाने।
तेज कदमों के साथ अपने सहयोगियों से घिरे मुख्यमंत्री महोदय जी मंच पर पहुंचे। माला वगैरह पहनने की औपचारिकताओं के पश्चात स्वागत गान के साथ उनका स्वागत किया गया. तत्पश्चात बारी आई, कई दिनों की मेहनत के बाद लिखेहुए शिकायती पत्र उनके हाथों में थमा देने की. उनके एक सहयोगी ने अपने हाथ में लेकर पत्र के साथ-साथ हमारी आशाओं को भी कहीं बगल में सरका दिया था. किन बातों को कितनी गम्भीरता से ली जाए, इतनी समझ बच्चों में कहाँ ? तमाम औपचारिकताओं की सम्पन्नता के बाद मुख्यमंत्रीजी ने चिरपरिचित अंदाज में बोलना शुरू किया. हमारी समझ से परे मगर लोटपोट कर देने वाला भाषण था, ढेर सारी  तालियां मिली, खूब मनोरंजन हुआ। मंच पर एक व्यक्ति को इशारे से बुलाकर उसकी पसलियां गिनने लगे, लगा कि अपनी पैनी नजर से उस बेचारे गरीब के सारे दुख दर्द ताड़ गए हों! कुछ उम्मीदें बंधाई, कुछ  वादे किये।अब समय हो चला था, अपने हेलीकॉप्टर में बैठ कर चल पड़े किसी और सभा को सम्बोधित करने ..






Saturday, 3 February 2018

थिएटर :एक छोटी चर्चा



मुंबई की शान है सिनेमा और इसमें थिएटर को भी जोड़ दें, तब कोई अतिशयोक्ति न होगी। हाँ,थिएटर सिनेमा जैसा लोकप्रिय नहीं। जबकि कई लोगों का मानना है कि उस समय चल रहे थिएटरों ने ही मुंबई में सिनेमा जगत की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 आज भले थिएटर की चमक फीकी पड़ी है, परन्तु आजादी के लिए लोगों के मन में उद्वेलित करने से लेकर वर्तमान सामजिक -राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न कर लोगों को जागरूक बनाने में इनके योगदान को कम नहीं आँका जा सकता. कभी गंभीरता से या कभी हलके फुल्के अंदाज में, कभी धारदार व्यंग्य के रूप में मंचित नाटकों द्वारा जिंदगी के हर पहलू की विवेचना की जा सकती है. सम-सामायिक मुद्दों, रिश्तों की जटिलता, आपसी द्वन्द, आम लोगों की शंकाएं तथा सामाजिक कुरीतियों को नाटकों के जरिये पेश किया जाता है. कभी-कभी तो थिएटर महज ज़िन्दगी के किस्से को ही दिखाने में सक्षम नहीं होता वरन कई सवाल उठाकर हमें सोचने पर मजबूर करता है. एक ऐसा ही उदहारण है, चेकोस्लोवाकिया के नाटककार 'कारेल कापेक' द्वारा लिखे नाटक 'रोसम्स यूनिवर्सल रोबोट्स' में सर्वप्रथम इस्तेमाल किया गया रोबोट शब्द, वर्तमान दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण देन कही जायेगी।  

विगत रविवार को मुंबई स्थित हरकत स्टूडियो में पञ्चतन्त्र नाटक का मंचन हुआ. पंचतंत्र की  दो प्रसिद्ध कहानियाँ, रंगा सियार तथा बन्दर और मगरमच्छ की दोस्ती, मंचन के लिए चुनी गयी थीं. पढ़ी हुई कहानियों को  नाटक के रूप मे देखने की कल्पना एक अलग ही उत्सुकता  जगाती है ! नाटक के शुरुआत में ढोलक और हारमोनियम पर बैठे कलाकारों की तीखी नोक-झोक ने सबको गुदगुदाया। मनोरंजन के साथ-साथ दर्शकों को इस माहौल में सहज होने में सहायता मिली. नोक-झोक के दौरान ही हमें पंचतंत्र के पांच अध्यायों से  अवगत कराया गया. वे हैं , मित्रभेद (मित्रों में मनमुटाव एवं अलगाव),मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ),काकोलुकीयम् (कौवे एवं उल्लुओं की कथा ),लब्धप्रणाश (मृत्यु या विनाश के आने पर; यदि जान पर आ बने तो क्या?) एवं अपरीक्षित कारक (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें; हड़बड़ी में क़दम न उठायें) . मूल रूप से संस्कृत में लिखी गयी और बाद में विश्व की लगभग हर भाषा में अनुवादित इन कथाओं के द्वारा हमें मनोविज्ञान, व्यावहारिकता और राजनीतिके सिद्धांतोका परिचय होता है. ८७ कहानियों के माध्यम से इस ग्रन्थ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा  जी ने मानव समाज को उचित-अनुचित का ज्ञान दिया है. 

 जानवरों  का अभिनय करना एक चुनौती भरा काम है, जिसे सफल बनाया रुपेश टिल्लू के निर्देशन और चार अन्य कलाकारों के दमदार अभिनय ने.  कहानियों के प्रदर्शन के बीच में हारमोनियम और ढोलक से उठती आवाजों  ने इन कथाओं को मंच पर जीवंत करने में शानदार भूमिका निभाई। कलाकारों का  गीदड़, हाथी, शेर, बन्दर और कभी मगरमच्छ बनकर तरह- तरह की आवाजें निकालना, गुस्सा, घमंड, भय, ईर्ष्या, लालच, आश्चर्य जैसे भावों को शारीरिक मुद्राएं बनाकर दर्शाना, उछलना -कूदना, भागना जैसी सहज प्रस्तुति  दर्शकों को बांधने में कामयाब रही. हालांकि नाटक के मंचन के दौरान कई बार मुझे महसूस हुआ कि इस नाटक को केवल बच्चों को ध्यान में रखकर नहीं लिखा गया था. तथापि नाटक  के बीच-बीच में तालियों की गड़गड़ाहट और बच्चों की जोरदार हँसी सुनकर तसल्ली हुई  कि कम -से -कम  कलाकारों के सहज अभिनय ने सबका भरपूर मनोरंजन किया. खासकर नाटक के अंत में  होली के  गाये गए गीत और संगीत वाद्यों की मनमोहक आवाजों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।    
वर्तमान समय में बॉलीवुड की चमक -धमक के आगे भले ही रंगमंचों की चमक फीकी लगे,पर थिएटर जगत के लोग इसके भविष्य को लेकर आशावान हैं एवं दर्शकों को अपनी ओर खींच लाने की कोाशिश में लगे हैं. मनोरंजन की दृष्टि के अलावा शिक्षा की दृष्टि से भी रंगमंच की उपयोगिता को लेकर बहसें हो रही है. नाटकों में नए-नए  प्रयोग कर दुनिया भर में इस माध्यम को लोकप्रिय बनाने की कवायद जारी है, ताकि रंगमंच  उच्च मध्यमवर्गीय या बड़े शहरों में न सिमट कर आम जनता और छोटे -छोटे शहरों तक अपनी पैठ बनाने में कामयाब हो.

Saturday, 27 January 2018

साउथ मुंबई की वाकिंग ट्रिप


 साउथ मुंबई की वाकिंग ट्रिप 

गेटवे ऑफ़ इंडिया, टाउन हॉल, टेलीग्राफ ऑफिस,सिद्धि विनायक मंदिर, राजाभाई क्लॉक टावर , मणि भवन, अगस्त क्रांति मैदान, हाजी अली दरगाह, माउंट मैरी चर्च, मरीन ड्राइव, फिल्मसिटी, ग्लोबल विपासना पगोडा आदि मुंबई में कई  ऐसी जगहें हैं, जिसे देखने भारी संख्या में लोग दूर -दूर से पहुंचते हैं.  पर, यहाँ के बाजारों की भीड़-भाड़, चहल -पहल और शोर-गुल को देखे बिना मुंबई को समझना मुश्किल है. बस, मुंबई के इस महत्वपूर्ण हिस्से को देखने की योजना हमने भी बना डाली और एक ट्रैवल एजेंसी की मदद से निकल पड़े उन गलियों और बाजारों को छानने। कई विकल्पों में से हमने क्रॉफर्ड मार्केट, झवेरी बाजार, मंगलदास मार्केट, फ्लॉवर्स मार्केट और पिंजरापोल गोशाला वाली वाकिंग ट्रिप का चुनाव किया। हाँ, २६ जनवरी  की वजह से काफी दुकानें बंद मिली और गाइड के कहेनुसार वह भीड़ नहीं दिखी जो अमूमन यहाँ रहती है. यह हमारे लिए राहत की बात भी थी और अफसोस की भी। उस नज़ारे को देखने से हम चूक गए जो यहाँ को खास बनाती है. बहरहाल, उस दिन की भीड़ देखकर अन्य सामान्य दिनों की व्यस्तता के बारे में अंदाजा लग गया! शादी और अन्य त्योहारों के वक्त की भीड़-भाड़ की कल्पनामात्र से ही घबराहट होने लगी! 

इस ट्रिप में हमारे साथ थीं, दो कनाडा से आई महिलायें और दो ऑस्ट्रेलियाई महिलायें। रीगल  सिनेमा के सामने से शुरू हुआ हमारा सफर. पहला पड़ाव, क्राफर्ड मार्किट तक हमें टैक्सी से ले जाया  गया. रास्ते में जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट और सी एस टी देखने को मिला।  गाइड ने हमें बताया कि वी टी स्टेशन, जिसका नाम बदलकर अब सी एस टी कर दिया गया है , के बाहर महारानी विक्टोरिया  की प्रतिमा स्थापित थी जिसे वापिस लंदन भेज दिया गया है जो अब वहां किसी संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है.

अब हम पहुंचे, क्रॉफर्ड मार्केट। विशेष रूप से फलों,सब्जियों, मांस-मछली, ड्राई फ्रूट, मसालों के होलसेल और रिटेल बाजार  के तौर पर जाने जाने वाले इस मार्केट में  प्लास्टिक के सामान, कपडे, खिलौनों की भी दुकानें  दिखीं। दुकानों के दिखाने के क्रम में गाइड ने बारगेन यानि मोलजोल करने की कला के बारे में हमें विस्तार से बताया☺.  क्रॉफर्ड मार्किट का नामकरण मुंबई शहर के पहले  म्युनिसिपल कमिश्नर 'आर्थर क्रॉफर्ड' के नाम पर किया गया था जिसे सन १९९५ में शिवसेना द्वारा नामों के बदलने के राज्यव्यापी अभियान के तहत महात्मा ज्योतिबा फूले  कर दिया गया है. हालांकि लोगों की जुबान पर अभी भी यही नाम चढ़ा है. कई बातें १८६९ में निर्मित क्राफर्ड मार्केट को विशेष बनाती है जैसे मार्केट में अवस्थित एक फाउंटेन जो प्रसिद्ध कलाकार जॉन लॉकवुड किपलिंग और  प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग  ( द  जंगल बुक के लेखक)के पिता द्वारा निर्मित है।  हालांकि, फाउंटेन बहुत अच्छी हालत में नहीं दिखा, जाहिर है इसके रख- रखाव पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया गया है. इसके अलावा यह जानकर भी हैरत हुई कि भारत में विद्युतीकरण के आगाज के लिए भी इसी बाजार को चुना गया था. जी हाँ, सन  १८८२ में भारत की यही इमारत सर्वप्रथम बिजली से रौशन हुई.

इसके बाद हमने रूख किया मंगलदास मार्केट यानि फैब्रिक मार्केट की तरफ. परन्तु छुट्टी की वजह से अधिकतर दुकानें  बंद मिली। कपड़ों की विभिन्न किस्मों की सस्ते दामों में उपलब्धता के लिए विख्यात यह बाज़ार लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है. हम तो चूक गए, फिर कभी..

हाँ , झवेरी बाज़ार की तरफ जाने वाली सड़क के दोनों तरफ बैठकर दूकान लगाने वाले विक्रेता ग्राहकों के साथ व्यस्त  दिखे. खरीदने वालों की भी अच्छी खासी भीड़ दिखी. गाइड ने बताया कि दुकानदारों की कमाई अच्छी -खासी है और ये टैक्स भी भरते हैं।  सब कुछ प्रशासन की मंजूरी से है, शायद मुंबई की इस अनूठी वाइब को कायम रख लेने की कवायद का हिस्सा है ये । मॉल की नयी नवेली संस्कृति को झूठलाती इस मार्किट की चहल पहल थोड़ी अचंभित ही करती है.

झवेरी बाजार हमारा अगला पड़ाव था. यह बाजार जैसा नाम से ही विदित है, सोने चांदी एवं हीरों  के आभूषणों के लिए मशहूर है.  इसके अलावा इमिटेशन जूलरी और रत्नों और कीमती पत्थरों की भी खरीददारी यहाँ से की जा सकती है.  इस बाजार की महत्ता इस आंकड़ें से मापी जा सकती है कि भारत में हो रहे सोने के कुल कारोबार के ६५ प्रतिशत कारोबार के लिए यहाँ अवस्थित सैंकड़ों दुकानें ही जिम्मेदार हैं.  हर कुछ अंतराल पर  हमें गुजराती समाज की व्यापार कुशलता  के बारे में गाइड के माध्यम से जानकारी मिलती रही☺ बात सही भी है, प्रत्यक्षं  किं प्रमाणम।

इसके बाद हमने जामा मस्जिद और मुम्बा आई मंदिर को बाहर से देखा. . सड़क के एक छोर पर मस्जिद और दूसरे छोर पर मंदिर भारत के सांप्रदायिक विविधता को दर्शाता दिखा. ब्रिटिश शासकों ने शहर के विस्तार के मद्देनजर  वी टी स्टेशन के पास से हटाकर मुम्बा आई मंदिर को झवेरी बाजार के पास पुनर्स्थापित किया.  मुंबई के मूल निवासी, कोली समाज की आराध्य देवी हैं, मुम्बा माता। मुंबई शहर का नामकरण भी इन्हीं देवी के नाम पर किया गया है. मंदिर में प्रतिदिन छह बार आरती होती है। मंगलवार के शुभ माने जाने के कारण श्रद्धालुुओं की काफी भीड़ रहती है. मन्नत माँगने के लिए लोग यहाँ रखे लकड़ी पर सिक्कों को कीलों से ठोंकते हैं.

फ्लावर्स मार्किट हमारा अगला पड़ाव था. यूँ कहिये एक पतली सी गली. दोनों तरफ फूलों  से सजे स्टॉल और  लकड़ी की तख्तों पर बैठकर माला गूंथते लोग दिखे. फूलों की कई किस्मों के अलावा पूजा में प्रयुक्त होने वाले अन्य सामानों को भी यहाँ से ख़रीदा जा सकता है यथा तुलसी, आम के पत्ते, दूब, उपले आदि. हालाँकि दादर का फ्लावर मार्केट मुंबई की सबसे बड़ी फ्लावर मंडी है। पर, सुबह के वक्त इस बाजार में भी काफी रौनक रहती है.
फूलों की गली होते हुए हम पहुंचे हमारे अंतिम पड़ाव पर, पिंजरापोाल  गौशाला। हिन्दू धर्म में, गोसेवा की महत्ता से  सभी परिचित हैं. सड़कों पर खुले में विचरती और कचरा खाती गायों से इतर अच्छी तरह से देखभाल पा रही इन गायों को देखना सुखद अहसास रहा. सभी ने बड़े प्यार से गायों को चारा खिलाया।  कुछ लोग कबूतरों को दाना खिलाते भी दिखे. यहाँ की ३५० गायों की देखभाल के लिए चंदा देनेवालों की कमी नहीं।

मुंबई के इस हिस्से को देखकर शहर के अलग रूप से वाकिफ होना अच्छी अनुभूति रही. महज २ घंटे का यह ट्रिप  इस महानगर से संबंधित कई ऐतिहासिक और वर्तमान के व्यापारिक गतिविधियों के बारे में ज्ञानवर्धन करने वाला  साबित हुआ.